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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रभु जब काशी पधारे थे तभी इन्‍होंने प्रभु को आत्‍म समर्पण कर दिया था। प्रभु के पुरी आ जाने पर इनकी पुन: प्रभु के पादपद्मों के दर्शनों की इच्‍छा हुई। अत: ये काशी जी से गौड़ होते हुए नीलाचंल की ओर चल दिये। रास्‍ते इन्‍हें रामदास विश्‍वास नामक एक कायस्‍थ महाशय मिले। ये गोड़ेश्‍वर के दरबार में मुनीम थे। रामानन्‍दी सम्‍प्रदाय के थे, वैसे बड़े भारी पण्डित, विनयी और ब्रह्मण्‍य थे। वे भी जगन्‍नाथ जी के दर्शनों को जा रहे थे।रघुनाथ जी को देखकर उन्होंने प्रणाम किया और इतने योग्य साथी को पाकर वे परम प्रसन्न हुए। उन्होंने रघुनाथ जी की पुटली जबरदस्‍ती ले ली तथा और भी उनकी विविध प्रकार से सेवा करने लगे। रघुनाथ जी इससे कुछ संकुचित होते और कहते– ‘आप इतने बड़े पण्डित हैं, इतने भारी प्रतिष्ठित पुरुष हैं, आपको मेरी इस प्रकार सेवा करना शोभा नहीं देता।’
वे विनीतभाव से उत्‍तर देते– ‘मैं नीच, अधम, छोटी जाति में उत्‍पन्‍न होने वाला भला आपकी सेवा कर ही क्‍या सकता हूँ फिर भी जो मुझसे हो सकती है, उससे आप मुझे वंचित न रखिये। साधु ब्राह्मणों की सेवा करना तो हमारा कर्तव्‍य है। हम तो इसके दास हैं।’ इस प्रकार दोनों ही बड़े आनन्‍द के साथ प्रेमपूर्वक पुरी पहुँचे।पुरी में प्रभु के स्‍थान का पता लगाकर रघुनाथ जी वहाँ पहुँचे और उन्‍होंने प्रभु के पादपद्मों में श्रद्धा-भक्ति के सहित साष्‍टांग प्रणाम किया। प्रभु इन्हें देखकर अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न हुए और इनका आलिंगन करके तपन मिश्र तथा चन्‍द्रशेखर आदि भक्‍तों की कुशल-क्षेम पूछने लगे। रघुनाथ जी सभी की सुनायी और उनके प्रणाम भी निवेदन किये।प्रभु ने उस दिन रघुनाथ अपने पास ही प्रसाद पवाया और उनके रहने के लिये अपने ही स्‍थान में एक सुन्‍दर सा स्‍थान दिया।आठ महीनों तक रघुनाथ भट्ट प्रभु के चरणों के समीप रहे। भोजन बनाने में तो वे बड़े ही प्रवीण थे। प्रभु को वे अपने यहाँ भिक्षा कराया करते थे और उनके उच्छिष्‍ट प्रसाद को पाकर अपने को कृतकृत्‍य समझते। महाप्रभु इनके बनाये हुए व्‍यंजनों को बहुत ही आनन्‍द के साथ इनकी प्रशंसा करते हुए पाते थे।आठ महीने के अनन्‍तर प्रभु ने इन्‍हें आज्ञा दी– ‘देखो, तुम्‍हारे माता-पिता वृद्ध हैं, तुम्‍हीं उनकी एकमात्र सन्‍तान हो। उनकी स्‍वाभाविक इच्‍छा तुम्‍हें गृहस्‍थी बनाने की होगी ही, किन्‍तु तुम गृहस्‍थी के झंझट में कभी मत पड़ना। इसी प्रकार ब्रह्मचारी रहना और विवाह न करना।वृद्ध माता-पिता की सेवा करना तो तुम्‍हारा कर्तव्‍य ही है, क्‍योंकि उनके दूसरा कोई पुत्र नहीं है। जब वे परलोकवासी हो जायँ तो तुम विरक्‍त भाव से भगवद्भजन में ही अपना समय बिताना। एक बार पुरी आकर मुझसे फिर मिल जाना।’ 
इतना कहकर उन्‍होंने इन्‍हें विदा किया। ये भी प्रभु से विदा होकर प्रभु के वियोग में रोते-रोते काशी जी को चले गये।चार पांच वर्ष में इनके माता तथा पिता दोनों ही परलोकवासी हो गये। शास्‍त्रीय विधि के अनुसार उनकी क्रिया कर्म करके ये पुनः पुरी पधारे और प्रभु से सभी बातें जाकर निवेदन की।प्रभु ने इन्‍हें आठ महीने फिर अपने पास रखकर भक्तितत्त्व की शिक्षा दी और अन्‍त में इन्‍हें वृन्‍दावन में रूपसनातन के समीप रहने की आज्ञा दी। प्रभु की आज्ञा को शिरोधार्य करके ये वृन्‍दावन की ओर चलने के लिये तैयार हुए।पूरी के सभी भक्‍तों की पदधूलि इन्‍होंने अपने मस्‍तक पर चढ़ायी। तब ये हाथ जोड़े हुए प्रभु के समीप खड़े हो गये। प्रभु ने इन्‍हें बार बार आलिंगन किया और जगन्‍नाथ जी की प्रसादी चौदह हाथ लम्‍बी तुलसी की माला और बिना कत्‍था चूना लगा हुआ प्रसादी पान इन्‍हें दिया।महाप्रभु की दी हुई उन दोनों प्रसादी वस्‍तुओं को इन्‍होंने श्रद्धापूर्वक मस्‍तक पर चढ़ाया और डबडबायी आँखों से पृथ्‍वी की ओर देखते हुए चुपचाप खड़े रहे।

प्रभु इन्‍हें उपदेश करने लगे– ‘देखो, श्रीवृन्‍दावन की पवित्र भूमि को त्‍यागकर कहीं अन्‍यत्र न जाना। वैराग्‍य युक्‍त होकर निरन्‍तर श्रीमद्भागवत का पाठ किया करना। रूप-सनातन इन दोनों को अपना बडा समझना। जो कोई शंका हुआ करे इन्‍हें से पूछ लिया करना।निरन्‍तर नाम-जप करते रहोगे तो कृपालु श्रीकृष्‍ण कभी न कभी तो कृपा करेंगे ही। मंगलमय भगवान तुम्‍हारा मंगल करें, तुम्‍हें शीघ्र ही कृष्‍ण प्रेम की प्राप्ति हो। अब जाओ, सभी वृन्‍दावन वासी भक्‍तों को मेरा स्‍मरण दिलाना।’ 
इस प्रकार महाप्रभु के शुभाशीर्वाद को पाकर वे काशी, प्रयाग होते हुए श्री वृन्‍दावन धाम में पहुँचे। वहाँ रूप और सनातन इन दोनों भाइयों ने इनका बड़ा भारी सत्‍कार किया और अपने पास ही रखा। ये रूप गोस्‍वामी की सत्‍संगसभा में श्रीमद्भागवत का पाठ किया करते थे। इनका गला बड़ा ही सुरीला था। भागवत के श्‍लोकों को इतनी तान के साथ ये कहते कि सुनने वाले राने लगते।एक ही श्‍लोक का को कई प्रकार से कहते। कहते-कहते स्‍वयं भी हिचकियाँ भर भरकर रोने लगे। इनका प्रेम अद्भुत था। ये सदा वृन्‍दावन विहारी के प्रेम में छके से रहते थे।हृदय में श्रीगोविन्‍द का ध्‍यान था, जिह्वा सदा हरि रस का पान करती रहती थी। साधुओं का सत्‍संग और ब्रह्मचर्य पूर्वक जीवन बिताना इससे बढ़कर संसार में सुखकर जीवन और हो ही क्‍या सकता है? मनीषियों ने संसार की सभी वस्‍तुओं को भयप्रद बताकर केवल एक वैराग्‍य को ही भयरहित माना है। ऐसा जीवन बिताना ही सर्वश्रेष्‍ठ वैराग्‍य है जैसा कि राजर्षियोगिराज भर्तृहरि ने कहा है–

भक्तिर्भवे मरणजन्‍मभयं हृदिस्‍थं 
स्‍नेहो न बन्‍धुषु न मन्‍मथा विकारा:।
संसर्गदोषरहिता विजना वनान्‍ता 
वैराग्‍यमस्ति किमत: परमर्थनीयम।
अर्थात -
‘भक्‍त भयहारी भगवान के पादपद्मों में प्रीति हो। इस शरीर को नाशवान समझकर इसके प्रति अप्रीति हो। संसारी भाई, बन्‍धु तथा कुटुम्बियों में ममता न हो और हृदय में कामजन्‍य वासना का अभवा हो, कामिनी के कमनीय कलेवर को देखकर उसमें आसक्ति न होती हो, तथा संसारी लोगों के संसर्गजन्‍य दोष से रहित पवित्र और शान्‍त–विजन वन में निवास हो तो इससे बढ़कर वांछनीय वैराग्‍य और हो क्‍या सकता है?

सचमुच जो स्‍त्री संसर्ग से रहित होकर एकान्‍त स्‍थान में ब्रह्मचर्य पूर्वक वृन्‍दावन विहारी का ध्‍यान करता हुआ अपने समय को बिता रहा है, वह देवताओं  का भी वन्‍दनीय है, उसकी पदधूलि इस समस्‍त पृथ्वी को पावन बना देती है, वह नररूप में साक्षात नारायण है, शरीर धारी ब्रह्म है और वैकुण्‍ठ पति का परम प्रिय प्रधान पार्षद है।
क्रमशः

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