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श्री श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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गम्‍भीरा-मन्दिर में श्री गौरांग …..

प्रेम नामक अद्भुत पदार्थ किसके कर्णगोचर हो सकता था? नाम की महिमा को कौन जान सकता था? वृन्‍दावन की माधुरी में किसका प्रवेश हो सकता था? उत्‍तम रस श्रंगार के चमत्‍कारपूर्ण माधुर्य की सीमा राधा को कौन जान पाता?  एक श्रीचैतन्‍यचन्‍द्र महाप्रभु ने अपनी स्‍वाभाविक परम करुणा के द्वारा इन सभी बातों को पृथ्वी पर प्रकट कर दिया।महाप्रभु गौरांगदेव चौबीस वर्ष की अल्‍पावस्‍था में कठोर संन्‍यास धर्म की दीक्षा लेकर पुरी पधारे। पहले छ: वर्षों में तो वे भारतवर्ष के विविध तीर्थों  में भ्रमण करते रहे और सबसे अन्‍त में आपने श्री वृन्‍दावन धाम की यात्रा की। महाप्रभु की यही अन्तिम यात्रा थी। वृन्‍दावन से लौटकर अन्‍त के अठारहों वर्षों तक आप अविच्छिन्‍न भाव से सचल जगन्‍नाथ के रूप में पुरी अथवा नीलाचंल में ही अवस्थित रहे। फिर आपने पुरी की पावन पृथ्वी का परित्‍याग करके कहीं को भी पैर नहीं बढ़ाया।
गौड़ देश से रथ यात्रा के समय प्रतिवर्ष बहुत से भक्‍त आया करते थे और वे बरसात के चार महीनों तक प्रभु के पादपद्मों के सन्निकट रहकर अपने-अपने स्थानों को चले जाया करते थे। छ: वर्षों तक तो प्रभु उनके साथ उसी प्रकार क्रीड़ा, उत्‍सव और संकीर्तन करते रहे।अन्त में आपका प्रेमोन्‍माद साधारण सीमा का उल्‍लंघन करके पराकाष्‍ठा तक पहुँच गया, उसमें फिर भला इस प्राकृतिक शरीर का होश कहाँ, ये तो प्रकृति के परे की बात है। सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणों का वहाँ प्रवेश नहीं, यह सब तो त्रिगुणातीत विषय है। उसमें मिलना-जुलना, बातचीत करना, खाना-पीना तथा अन्‍यान्‍य कार्यों का सम्‍पादन करना हो ही नहीं सकता।शरीर स्‍वयं ही यंत्र के समान इन कार्यों को आवश्‍यकतानुसार करता रहता है। चित्त से इन कामों का कोई सम्‍बन्‍ध नहीं, चित्त तो अविच्छिन्‍न भाव से उसी प्रियतम की रूपमाधुरी का पान करता रहता है। महाप्रभु का चित्त भी बारह वर्षों तक शरीर को छोड़कर वृन्‍दावन के किसी काले रंग के ग्‍वाल-बालक के साथ चला गया थउनका बेमन का शरीर पुरी में काशी मिश्र के विशाल घर के एक निर्जन गम्‍भीरा मन्दिर में पड़ा रहता था। इससे पूर्व कि हम महाप्रभु की उस दिव्‍योन्‍मादकारी प्रेमावस्‍था के सम्‍बन्‍ध में कुछ कहें, यह जान लेना आवश्‍यक है कि वह गम्‍भीरा-मन्दिर वास्‍तव में क्‍या है?

श्री जगन्‍नाथ जी के मन्दिर के समीप ही उड़ीसाधिप महाराज प्रतापरुद्र जी के कुल गुरु पण्डित काशी मिश्र जी के विशाल घर में प्रभु निवास करते थे। मिश्र जी का वह भवन बहुत ही बड़ा था। अनुमान से जाना जाता है कि उसमें तीन परकोटे रहे होंगे और सैकड़ों मनुष्‍य उसमें सुखपूर्वक रह सकते होंगे।तभी तो गौड़ देश से आये हुए प्राय: सभी भक्त चार महीनों तक वहीं निवास करते थे। महाप्रभु उसी भवन में रहते थे। अन्‍यान्‍य दूसरे मकानों में परमानन्‍द पुरी, ब्रह्मानन्‍द भारती, स्‍वरूपदामोदर, रघुनाथदास, जगदानन्‍द, वक्रेश्‍वर पण्डित तथा अन्‍यान्‍य विरक्‍त भक्‍त रहते थे।महाप्रभु सदा से ही एकान्‍तप्रिय थे, उन्‍हें भीड़-भाड़ में विशेष रहना अरुचिकर था। उसी भवन में एकान्‍त में एक गुफा की तरह छोटा सा स्‍थान था, वह कोलाहल शून्‍य, एकदम निभृत और नीरव मन्दिर था। महाप्रभु जब सबसे पृथक होकर एकान्‍त की इच्‍छा करते तब उस निभृत मन्दिर में जाकर विश्राम करते।उसका दरवाजा इतना छोटा था कि एक आदमी ही उसमें संकोच के साथ घुस सकता था। महाप्रभु जब थक जाते या भीड़ भाड़ से ऊब जाते तो उसमें जाकर सो जाते।
महाप्रभु जैसे भक्‍तवत्‍सल और कृपालु स्‍वामी थे उसी प्रकार का सच्‍चा स्‍वामिभक्‍त उन्‍हें गोविन्‍द नामक सेवक भी प्राप्‍त हुआ था। गोविन्‍द का महाप्रभु के प्रति वात्‍सल्‍यभाव था, वह नि:स्‍वार्थ भाव से बड़ी ही तत्‍परता के साथ प्रभु के शरीर की खूब ही देख रेख रखता। एक दिन महाप्रभु संकीर्तन से श्रान्‍त होकर गम्‍भीरा के दरवाजे पर पड़कर सो रहे।
नियमानुसार गोविन्‍द आया और उसने कहा– ‘प्रभो ! मैं शरीर की मालिश करूँगा, मुझे भीतर आने दीजिये।’ 
प्रभु तो भावावेश में बेहोश पड़े थे। उन्‍हें शरीर मर्दन का क्‍या ध्‍यान? दो चार बार प्रार्थना करने पर आपने पड़े ही पड़े कह दिया– ‘आज नहीं, जाओ सो रहो।’
गोविन्‍द ने विनीत भाव से कहा- ‘प्रभो ! मेरा नित्‍य का नियम है, मुझे आज सेवा से वंचित न कीजिये।’
प्रभु ने झुँझलाकर कहा– ‘नहीं, यह सब कुछ नहीं, शरीर में बड़ी पीड़ा हो रही है मुझसे उठा नहीं जाता, जाकर सो रहो।’
गोविन्‍द ने फिर अत्‍यन्‍त ही विनीत भाव से कहा– ‘प्रभो ! थोडे हट जायँ, बस मैं एक पैर देकर ही भीतर आ जाऊँगा, मुझे नींद न आवेगी।’
प्रभु ने अत्‍यन्‍त ही स्‍नेह से कहा– ‘भैया गोविन्‍द ! मुझमें हिलने की भी सामर्थ्‍य नहीं।’ 
सेवापरायण स्‍वामिभक्‍त सेवक क्‍या करता? सेवा करना उसका प्रधान कर्तव्‍य है। प्रभु को लाँघकर जाना पाप है, किन्‍तु उनकी सेवा न करना यह उससे भी अधिक पाप है। इसलिये वह सोचकर कि चाहे मुझे नरक ही क्‍यों न भोगना पड़े, मैं सेवा में प्रमाद नहीं करूँगा।यह सोचकर वह प्रभु को लांघकर ही चला गया और वहाँ जाकर उसने प्रभु की चरण सेवा की तथा सम्‍पूर्ण शरीर को धीरे-धीरे दबाया। बहुत देर हो जाने पर प्रभु को चैतन्‍यता प्राप्‍त हुई। तब आपने गोविन्‍द को पास ही बैठा देखकर पूछा– ‘अरे गोविन्‍द ! तू अभी तक बैठा ही है, सोने क्‍यों नहीं गया?
उसने कहा– ‘प्रभु ! सोने कैसे जाता, आप तो दरवाजे को घेरकर शयन कर रहे हैं।’
प्रभु ने पूछा–‘तब तू आया कैसे था?’
गोविन्‍द ने कुछ लज्जित स्‍वर में कहा– ‘प्रभो ! मैं आपके श्री अंग को लांघ करके ही आया था, इसके लिये मुझे जितने दिनों तक भी नरक भोगना पड़े उतने दिनों तक सहर्ष नरक भोग सकता हूँ। आपके शरीर की सेवा के निमित्त मैं सब कुछ कर सकता हूँ, किन्‍तु अपने सोने के लिये मैं ऐसा पाप नहीं कर सकता।’ 
उसकी ऐसी निष्‍ठा देखकर प्रभु ने उसे छाती से लगाया और उसे श्रीकृष्‍ण-प्रेम प्राप्ति का आशीर्वाद दिया।

इस घटना से भी जाना जाता है कि गम्‍भीरा मन्दिर बहुत ही छोटा होगा। पहले तो महाप्रभु यदा कदा ही उसमें शयन करते रहे, ज्‍यों-ज्‍यों उनकी एकान्‍तनिष्‍ठा बढ़ती गयी और प्रेमोन्‍माद बढ़ता गया, त्‍यों ही त्‍यों वे गम्‍भीरा मन्दिर में अपना अधिक समय बिताने लगे। अन्‍त के बारह वर्ष तो आपके गम्‍भीरा मन्दिर में ही बीते।
क्रमशः

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