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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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उस स्थान का नाम पहले से ही गम्भीरा था या प्रभु के गम्भीरा भाव से रहने के कारण उसको लोग गम्भीरा कहने लगे, इसका ठीक ठीक पता नहीं।अनुमान ऐसा ही लगाया जाता है कि प्रभु के अन्त:पुर के समान उसमें अपने अन्तरंग भक्तों के साथ रागमय ऐकान्तिक जीवन बिताने के ही कारण इस स्थान को भक्त ‘गम्भीरा’ के नाम से पुकारने लगे होंगे। प्रभु ने गम्भीरा मन्दिर में रहकर जो बारह वर्ष बिताये और उस अवस्था में जो उन्होंने लीलाएँ कीं उन्हें भक्त ‘गम्भीरालीला’ के नाम से जानते और कहते हैं। गौड़ीय वैष्णवग्रन्थों में सर्वत्र ‘गम्भीरालीला’ शब्द का व्यवहार मिलता है।
इन बारह वर्षो में प्रभु के शरीर में जो-जो प्रेम के भाव उत्पन्न हुए, उनकी जैसी-तैसी अलौकिक दशाएँ हुईं वह किसी भी महापुरुष के शरीर में प्रत्यक्ष रीति से प्रकट नहीं हुईं। उन्होंने प्रेम की पराकाष्ठा करके दिखा दी, मधुर रस का आस्वादन किस प्रकार किया जाता है, इसका उन्होंने साकार स्वरूप दिखला दिया।उन दिनों स्वरूपदामोदर और राय रामानन्द, ये ही प्रभु के उस भाव के प्रधान ज्ञाता थे। महाप्रभु निरन्तर वियोगिनी श्री राधिका जी के भाव में भावान्वित रहते। स्वरूपगोस्वामी और राय रामानन्द जी को वे अपनी ललिता और विशाखा सखी समझते। बस, इन्हीं के कारण उन्हें थोड़ी बहुत शान्ति होती।
वास्तव में मधुरभाव के मर्मज्ञ ये दोनों महानुभाव ललिता और विशाखा की भाँति प्रभु की विरह वेदना को कम करने में सब भाँति से उनकी सहायता करते और सदा प्रभु की सेवा-शुश्रुषा में ही तत्पर रहते। स्वरूपगोस्वामी का गला बड़ा ही कोमल था। वे अपनी सुरीली तान से मधुर भाव के पद गा-गाकर प्रभु को सुनाया करते थे।
महाप्रभु को श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध का गोपीगीत, श्री जयदेव का गीतगोविन्द और चण्डीदास तथा विद्यापति ठाकुर के पद बहुत ही प्रिय थे। स्वरूपगोस्वामी अपने सुन्दर सुरीले स्वर से इन्हीं सबको सुनाया करते थे। राय रामानन्द जी कृष्ण कथा कहा करते थे, इसी प्रकार रसास्वादन करते-करते रात्रि बीत जाती और सूर्य उदय होने पर पता चलता कि अब प्रात:काल हो गया है।उस समय प्रभु की जो भी दशा होती उसे स्वरूपदामोदर जी अपने ‘कड़चा’ में लिखते जाते थे। सचमुच उन्हीं महानुभाव की कृपा से तो आज संसार श्री चैतन्य देव के प्रेम की अलौकिक दशाओं को समझ सका है, नहीं तो वे भाव प्रत्यक्ष रूप से संसार में अप्रकट ही बने रहते। ये भाव मानवीय भाषा में व्यक्त किये ही नहीं जाते। इन भावों को व्यक्त करने की तो भाषा ही दूसरी है और उसका नाम ‘मूकभाषा’ है। कोई परम रसमर्मज्ञ लोकातीत भाव वाला पुरुष यत्किंचित उसका वर्णन कर सकता है। इसलिये स्वरूप दामोदर जी ने संसार के ऊपर उपकार करके उसका थोडा बहुत वर्णन किया।
वास्तव में चैतन्य के भावों को वे ही ठीक ठीक वर्णन कर भी सकते थे। उस समय प्रभु सदा शरीर ज्ञान शून्य से बने रहते। उनके अन्तरंग भक्त ही उनके शरीर की रेख देख और सेवा शुश्रुषा करते थे। उनमें गोविन्द जगदानन्द रघुनाथदास, स्वरूपदामोदर और राय रामानन्द जी ये ही मुख्य थे।स्वरूपगोस्वामी जी जो कुछ लिखते थे उसे रघुनाथ जी कण्ठस्थ करते जाते थे। इस प्रकार स्वरूप दामोदर जी का कड़चा रघुनाथदास जी के गले का सर्वोत्तम हार बन गया। महाप्रभु और स्वरूपदामोदर जी के तिरोभाव के अनन्तर रघुनाथदास जी पुरी छोड़कर श्री वृन्दावन को चले गये और वहीं एकान्त में वास करने लगे।
‘श्रीचैतन्य चरितामृत’ के लेखक गोस्वामी कृष्णदास कविराज उनके परमप्रिय शिष्य थे, इसलिये ‘स्वरूपगोस्वामी का कड़चा’ उनसे कविराज जी को प्राप्त हुआ। कविराज महाशय ने उसी कड़चा के आधार पर अपने परम प्रसिद्ध ‘श्रीचैतन्य चरितामृत’ नामक ग्रन्थ के अन्तिम सात अध्याय लिखे हैं।
इसलिये अब ‘स्वरूपदामोदर जी का कड़चा’ नामक कोई अलग ग्रन्थ तो मिलता नहीं। इन सात अध्यायों को ही उसका सार समझना चाहिये। उन महापुरुष ने उस अलौकिक दिव्य ग्रन्थ का जनता में क्यों नहीं प्रचार और प्रसार होने दिया, इसे तो वे ही जानें।हम पामर प्राणी भला इस सम्बन्ध में क्या समझ सकते हैं? संसार को उन्होंने इस इतने अधिक दिव्यरस का अनधिकारी समझा होगा। प्राय: देखने में भी आता है कि महापुरुष अपना सम्पूर्ण प्रेम किसी पर प्रकट नहीं करते। यदि दुर्बल जीव पर वे अपना अमोघ प्रेम एक साथ ही प्रकट कर दें तो उसका हृदय फट जाय, साधारण लोग महापुरुषों के प्रेम को सहन नहीं कर सकते। इसीलिये महापुरुष धीरे धीरे पात्र जितने जितने प्रेम अधिकारी बनता जाता है उतना ही उतना प्रेम उसके प्रति प्रदर्शित करते हैं, क्योंकि वे प्रेम की अमोघ शक्ति से पूर्णरीत्या परिचित होते हैं।
गोस्वामी कृष्णदास कविराज कवि हृदय के प्रेममर्मज्ञ और उच्चकोटि के रसमर्मज्ञ थे, उन्होंने अपने बंगला भाषा के ‘पयार’ नामक छन्दों में जिस खूबी के साथ महाप्रभु के इन अन्तिम भावों का वर्णन किया है उसे पढ़कर ऐसा कौन सहृदय रसिक पुरुष होगा जो बिना रोये एक भी पयार को पढ़ सके।उस अमर कवि की लेखनी से प्रेम का जैसा सजीव, सुन्दर और बोलता-चलता वर्णन हुआ है वैसा वर्णन अन्य साधारण कवियों की लेखनी से होना एकदम असम्भव है। प्रेम का प्रसंग एक तो वैसा ही जटिल है फिर उसे मानवीय भाषा की कविता में वर्णन करना तो सचमुच ही महान प्रतिभा और घोर साहस का काम है। कविराज महाशय स्वयं कहते हैं –
प्रेमार विकार वर्णिते चाहे पेइ जन,
चांद धरिते चाहे पेन हय्या वामन।
वायु जैछे सिंधु-जलेर हरे एक ‘कण’,
कृष्णप्रेम-कण तैछे जोवेर स्पर्शन।
क्षणे क्षणे उठे प्रेमार तरंग अनंत,
जीव छार काहां तार पाइबेक अंत।
श्रीकृष्णचैतन्य याहा करेन आस्वादन,
सबे एक जाने ताहा स्वरूपादि ‘गण’।
अर्थात -
‘जो पुरुष प्रेम के विकार को वर्णन करने का प्रयत्न करता है, उसका प्रयत्न उसी बौने (बावन)– के समान है जो सबसे छोटा होने पर भी आकाश में स्थित चन्द्रमा को पकड़ना चाहता है। जिस प्रकार अनन्त-अथाह महासागर में से वायु एक कण को उड़ा लाती है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण–प्रेमार्णवपय का एक कण जीवों को स्पर्श कैसे पा सकता है?
श्रीकृष्ण-चैतन्य महाप्रभु जिस प्रेम रस का आस्वादन करते हैं, उसे तो उनके परम प्रियगण श्रीस्वरूप दामोदर तथा रामानन्द राय आदि ही जान सकते हैं।’ ऐसा कहकर उन्होंने अपने को भी प्रेम-तत्त्व के वर्णन करने का अनधिकारी साबित कर दिया है।
क्रमशः
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