343
श्री श्री चैतन्य चरितावली
343-
आप उसी का समर्थन करते हुए स्पष्ट स्वीकार भी करते हैं।
लिख्यते श्रीलगौरेन्दोरत्यद्भुतमलौकिकम्।
यैर्दृष्टं तन्मुखच्छ्रुत्वा दिव्योन्मादविचेष्टितम्।।[श्रीचैतन्य. 17।1]
अर्थात
‘श्रीगौरांग महाप्रभु की अत्यद्भुत अलौकिक दिव्योन्मादकारक चेष्टाओं को– जिन्होंने (श्रीरघुनाथदास जी ने) अपनी आँखों से उन चेष्टाओं को प्रत्यक्ष देखा है, उन्हीं के मुख से सुनकर मैं लिखता हूँ।’
इस बात से तो अब सन्देह के लिये कोई स्थान ही नहीं रह जाता।यदि कोई साधारण मनुष्य उनसे इस बात को कहता तो वे उसका विश्वास भी न करते, किन्तु जब साक्षात रघुनाथ जी ही उनसे कह रहे हैं जो कि निरन्तर बाहर वर्षों तक प्रभु के समीप ही रहे थे तब तो उन्हें भी विश्वास करना ही पड़ा, इस बात को वे स्वयं कहते हैं–
शास्त्रलोकातीत येइ येइ भाव हय,
इतर लोकेर ताते ना हय निश्चय।
रघुनाथदासेर सदा प्रभु के संगे स्थिति,
तार मुखे सुनि लिखि करिया प्रतीति।
अर्थात
‘महाप्रभु के इन दिव्योन्मादकारी भावों को यदि कोई इतर पुरुष कहता तो सम्भवतया निश्चय भी न होता, किन्तु सदा प्रभु के संग रहने वाले रघुनाथ जी ने अपने मुख से इन भावों को मुझे बताया तब मैंने इन्हें अपने ग्रन्थों में लिख दिया।इसमें अब शंका के लिये स्थान ही नहीं।’
इस प्रकार स्थान-स्थान पर उन्होंने इन भावों को अवर्णनीय बताया है और सात अध्यायों में बडी सुन्दरता से वर्णन करके अन्त में कह दिया है–
प्रभुर गंभीरा लीला ना पारि बूझिते।
बुद्धि प्रवेश नाहि ताते ना पारि वर्णिते।
अर्थात-
‘महाप्रभु की गम्भीरा लीला कुछ जानी नहीं जा सकती, बुद्धि का तो वहाँ प्रवेश ही नही, फिर वर्णन कैसे हो सकता है?’
जिस प्रेमोन्मादकारी लीला को वर्णन करने में प्रेम के एकमात्र उपासक, गौर कृपा के पूर्ण पात्र तथा आयु भर वृन्दावन में ही वास करके प्रेम की साधना करने वाले कविराज गोस्वामी अपनी वृद्धावस्था से काँपती हुई लेखनी को ही असमर्थ बताते हैं तो हम कल-परसों के छोकरे जिनका कि प्रेम मार्ग में प्रवेश तो क्या झुकाव भी नहीं हुआ है, ऐसे साधारण कोटि के जीव उसका वर्णन ही क्या कर सकते हैं? हमारे लिये तो सबसे सरल उपाय यही है कि इस प्रसंग को छोड़ ही दें किन्तु इस प्रसंग को छोडना उसी प्रकार होगा जिस प्रकार दूध को दुहकर, औटाकर, जमाकर और उसका दही बनाकर दिनभर मथते रहे और जब मक्खन निकलने का समय आया तभी उसे छोड़ बैठे। महाप्रभु के जीवन का यही तो सार है, यहीं पर तो प्रेम की पराकाष्ठा होती है, यही तो उनका जीवों के लिये अन्तिम उपदेश है, इसी को तो ध्रुव लक्ष्य बनाकर साधक आगे बढ़ सकते हैं। इसलिये इसे छोड़ देना मानों इतने सब किये-कराये को बिना सार समझे छोड़ देना है।इसलिये हम इसका अपनी क्षुद्र बुद्धि के अनुसार उन्हीं कविराज गोस्वामी के चरण-चिह्नों का अनुसरण करते हुए वर्णन करते हैं। अन्य स्थानों में तो हमने अपने स्वाभाविक स्वतंत्रता से काम लिया है, किन्तु इस विषय में हम जहाँ तक हो सकेगा, इन्हीं पूर्व पुरुषों की प्रणाली का ही अनुकरण करेंगे।अक्षरों का अनुवाद कर देना तो हमारी प्रकृति के प्रतिकूल है, इसके लिये तो हम मजबूर हैं किन्तु कैसे भी क्यों न करें इन्हीं महानुभावों के आश्रय से इस दुर्गम पथ को पार कर सकेंगे। इसलिये श्री चैतन्य देव के दिव्योन्माद के वर्णन करने के पूर्व अति संक्षेप में हम पाठकों को यह बता देना आवश्यक समझते हैं कि ये प्रेम के भाव, महाभाव तथा विरह की दशा कितनी होती है और इनका वास्तविक स्वरूप क्या है? इस विषय पर मधुर रति के उपासक वैष्णवों ने अनेक ग्रन्थ लिखे है और विस्तार के साथ इन सभी विषयों का विशदरूप से वर्णन किया गया है, उन सबको यहाँ बताने के लिये न तो इतना स्थान ही है और न हममें इतनी योग्यता ही है।हम तो विषय को समझने के लिये बहुत ही संक्षेप में इन बातों का दिग्दर्शन करा देना चाहते हैं जिससे पाठकों को महाप्रभु की प्रेमोन्दमादकारी दशा को समझाने में सुगमता हो। वैसे इन दशाओं को समझकर कोई प्रेमी थोड़े ही बन सकता है, जिसके हृदय में प्रेम उत्पन्न होता है उसकी दशा अपने आप ही ऐसी हो जाती है।पिंगल पढ़कर कोई कवि नहीं बन सकता। स्वाभाविक कवि की कविता अपने आप ही पिंगल के अनुसार बन जाती है। इसलिये इन बातों का वर्णन प्रेम प्राप्त करने के निमित्त नही, किंतु प्रेम की दशा समझने के लिये करते हैं।
प्रेम की अवस्थाओं का संक्षिप्त परिचय…..
श्री रूपगोस्वामी कहते है–
भुक्तिमुक्तिस्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते।
तावद् भक्तिसुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत्।
अर्थात-
जब तक भुक्ति और मुक्ति की इच्छारूपिणी पिशाची हृदय में बैठी हुई है तब तक वहाँ भक्ति सुख की उत्पत्ति कैसे हो सकती है?’
लोक मर्यादा को मेटकर मोहन से मन लगाने को मनीषियों ने प्रेम कहा है। प्रेम के लक्षण में इतना ही कहना यथेष्ट है कि–
प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्।
अर्थात-
‘गोपियों के शुद्ध प्रेम को ही ‘काम’ के नाम से पुकारने की परिपाटी पड़ गयी है।’ इससे यही तात्पर्य निकला कि प्रेम में इन्द्रियसुख की इच्छाओं को एकदम अभाव होता है। क्योंकि गोपिकाओं के काम में किसी प्रकार के अपने शरीर सुख की इच्छा नहीं थी।वे जो कुछ करती थीं केवल श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के निमित्त। इसलिये शुद्ध प्रेम इन्द्रिय और उनके धर्मों से परे की वस्तु है। इसी को ‘राग’ के नाम से भी पुकारते हैं। इस ‘काम’, ‘प्रेम’ अथवा राग के तीन भेद हो सकते हैं– पूर्वराग, मिलन और विछोह या विरह।जिसके हृदय में प्रेम उत्पन्न हो जाता है उसे घर-द्वार, कुटुम्ब-परिवार, संसारी विषय-भोग कुछ भी नहीं सुहाते। सदा अपने प्यारे का ही चिन्तन बना रहता है। प्रेमी की दशा उस पुरुष की सी हो जाती है जिसे अपने प्राणों से अत्यन्त ही मोह हो और उसे फांसी के लिये कारावास के फाँसी घर में बन्द कर रखा हो; जिस प्रकार प्राणों के भय से उसकी क्रियाएँ और चेष्टाएँ होती हैं, उसी प्रकार चेष्टाएँ रागी की अथवा प्रेमी की भी होती हैं। रागमार्ग के उपासक वैष्णवों ने अपने ग्रन्थों में इन सब दशाओं का बड़े विस्तार के साथ वर्णन किया है। इस सम्बन्ध में अष्ट सात्त्विक विकारों का बहुत उल्लेख आता है और वे ही अत्यन्त प्रसिद्ध भी हैं, अत: यहाँ बहुत ही संक्षेप में पहले उन्हीं आठ विकारों का वर्णन करते हैं।
क्रमशः
Comments
Post a Comment