344
श्री श्री चैतन्य चरितावली
344
वे आठ विकार हैं– स्तम्भ, कम्प, स्वेद, वैवर्ण्य, अश्रु, स्वरभंग, पुलक और प्रलय। ये भय, शोक, विस्मय, क्रोध और हर्ष की अवस्था में उत्पन्न होती हैं। प्रेम के लिये ही इन भावों को ‘सात्त्विक विकार’ कहा गया है।
स्तम्भ– शरीर का स्तब्ध हो जाना। मन और इन्द्रियाँ जब चेष्टारहित होकर निश्चल हो जाती हैं, उस अवस्था को स्तम्भ कहते हैं।
कम्प– शरीर में कँपकँपी पैदा हो जाय उसे ‘वेपथु’ या ‘कम्प‘ कहते हैं। अर्जुन की युद्ध के अभाव में भये के कारण ऐसी दशा हुई थी। उन्होंने स्वयं कहा है– ‘वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते’। अर्थात ‘मुझे कँपकँपी छूट रही है, रोंगटे खडे हो गये हैं।’
स्वेद– शरीर में से पसीना छूटना या पसीने में ‘लथपथ’ हो जाना इसे ‘स्वेद’ कहते हैं।
अश्रु– बिना प्रयत्न किये शोक, विस्मय, क्रोध अथवा हर्ष के कारण आँखों में से जो जल निकलता है उसे अश्रु कहते हैं। हर्ष में जो अश्रु निकलते हैं वे ठण्डे होते हैं और वे प्राय: आँखों की कोर से नीचे को बहते हैं। शोक के अश्रु गरम होते हैं और वे बीच से ही बहते हैं।
स्वरभंग– मुख से अक्षर स्पष्ट उच्चारण न हो सके तो उसे ‘स्वरभेद’, ‘गद्गद’ या ‘स्वरभंग’ कहते हैं।
वैवर्ण्य– उपर्युक्त कारणों से मुख पर जो एक प्रकार की उदासी, पीलापन या फीकापन आ जाता है उसे ‘वैवर्ण्य’ कहते हैं। उसका असली स्वरूप है, आकृति का बदल जाना।
पुलक– शरीर के सम्पूर्ण रोम खड़े, हो जायँ उसे ‘पुलक’ या ‘रोमांच’ कहते हैं।
प्रलय– जहाँ शरीर का तथा भले बुरे का ज्ञान ही न रह जाय उसे ‘प्रलय’ कहते हैं। इन्हीं सब कारणों से बेहोशी हो जाती है। इस अवस्था में प्राय: लोग पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। बेहोश होकर धड़ाम से पृथ्वी पर गिर पड़ने का नाम ‘प्रलय’ है।
ये उपर्युक्त भाव हर्ष, विस्मय, क्रोध, शोक आदि सभी कारणों से होते हैं किन्तु प्रेम के पक्ष में ही ये प्रशंसनीय हैं। पूर्वराग मिलन और वियोग अथवा विछोह– ये तीन अवस्थाएँ प्रेम की हैं।
पूर्वराग– प्यारे से साक्षात्कार तो हुआ नहीं है, किन्तु चित्त उसके लिये तड़प रहा है, इसे ही संक्षेप में पूर्वराग कह सकते हैं। दिन रात उसी का ध्यान, उसी का चिन्तन और उसी के सम्बन्ध का ज्ञान बना रहे। मिलने की उत्तरोत्तर इच्छा बढ़ती ही जाय इसी का नाम पूर्वराग है। इस दशा में शरीर से, घर-द्वार तथा जीवन से भी एकदम वैराग्य हो जाता है।
मिलन– यह विषय वर्णनातीत है। सम्मिलन में क्या सुख है, यह बात तो अनुभवगम्य है, इसे तो प्रेमी और प्रेम पात्र के सिवा दूसरा कोई जान ही नहीं सकता। इसीलिये कवियों ने इसका विशेष वर्णन नहीं किया है। सम्मिलन सुख को तो दो ही एक होकर जान सकते हैं। वे स्वयं उसका वर्णन करने में असमर्थ होते हैं, फिर कोई वर्णन करे भी तो कैसे करे? अनुभव होने पर वर्णन करने की शक्ति नहीं रहती और बिना अनुभव के वर्णन व्यर्थ है। इसलिये इस विषय में सभी कवि उदासीन से ही दीख पड़ते हैं। श्रीमद्भागवतादि में वर्णन है, किन्तु वह आटे में नमक के ही समान प्रसंगवश यत्किंचित है।सभी ने विरह के वर्णन में ही अपना पाण्डित्य प्रदर्शित किया है। और यदि कुछ वर्णन हो सकता है तो यत्किंचित विरह का ही हो सकता है। उसी के वर्णन में मजा है। सम्मिलन सुख को तो वे दोनों ही लूटते हैं। रसिक रसखान जी ने दूर खड़े होकर इस सम्मिलन का बहुत ही थोड़ा वर्णन किया है किन्तु वर्णन करने में कमाल कर दिया है। दो प्रेमियों के सम्मिलन का इतना सजीव और जीता-जागता चित्र शायद ही किसी अन्य कवि की कविता में मिले। एक सखी दूसरी सखी से श्रीराधिका जी और श्रीकृष्ण के सम्मिलन का वर्णन कर रही है। सखी कहती है–
ऐ री आज काल्हि सब लोकलाज त्यागि दोऊ,
सीखे हैं सबै बिधि सनेह सरसायबो।
यह रसखन दिन द्वैमें बात फैलि जैहैं
कहाँ लौं सयानी ! चंद हाथन छिपायबो।।
आज हौं निहारयो बीर, निकट कालिंदी तीर
दोउन को दोउनसौं मुख मुसकायबो।
दोउ परैं पैयाँ दोउ लेत हैं बलैयाँ उन्हें,
भूल गईं गैयां, इन्हें गागर उठायबो।।
कैसा सजीव वर्णन है ! वह भी कालिन्दी कूल पर एकान्त में हुआ था, इसलिये छिपकर सखी ने देख भी लिया, कहीं अन्त:पुर में होता तो फिर वहाँ उसकी पहुँच कहाँ?
विरह- इन तीनों में उत्तरोत्तर एक दूसरी से श्रेष्ठ है। पूर्वानुरागी की अपेक्षा मिलन श्रेष्ठ है और मिलन की अपेक्षा विरह श्रेष्ठ है, प्रेमरूपी दूध का विरह ही मक्खन है। इसीलिये कबीरदास जी ने कहा है–
बिरहा बिरहा मत कहौ, बिरहा है सुलतान।
जेहि घट बिरह न संचरै, सो घट जान मसान।
विरह के तीन भेद हैं– भविष्य विरह, वर्तमान विरह और भूत विरह। इनमें भी परस्पर उत्तरोत्तर उत्कृष्टता है। भावी विरह बड़ा ही करुणोत्पादक है, उससे भी दु:खभरा वर्तमान विरह। भूत विरह तो दु:ख सुख की पराकाष्ठा से परे ही है।
भावी विरह- ‘प्यारा कल चला जायगा,’ बस, इस भाव के उदय होते ही जो कलेजे में एक प्रकार की ऐंठन सी होने लगती है, उसी ऐंठन का नाम ‘भावी विरह’ है। इसका उदय नायिका के ही हृदय में उत्पन्न होता हो, से बात नहीं है। अपने प्यारे के विछोह में सभी हृदय में यह विरह-वेदना उत्पन्न हो सकती है।
जिस कन्या को आज पन्द्रह-बीस वर्षों से पुत्री की तरह लाड़ प्यार किया था, वही शकुन्तला आश्रम त्यागकर अपने पति के घर जायगी, इस बात के स्मरण से ही शकुन्तला के धर्मपिता भगवान कण्व ऋषि का कलेजा कांपने लगा ! हाय ! अब शकुन्तला फिर देखने को न मिलेगी? इस विचार से वे शोकयुक्त हुए बैठे हैं।वे कैसे भी सहृदय क्यों न थे, किन्तु थे तो ज्ञानोपासक। चिन्ता में एकदम रागमार्गीय गोपिकाओं की भाँति अपने को भूल नहीं गये। ये उस अन्त:करण की स्वाभाविक प्रवृत्ति पर विचार करते करते कहने लगे। ऋषि के इन वाक्यों में कितनी करुणा है, कैसी वेदना है, पुत्री-विरह का यह संस्कृत-भाषा में सर्वोत्कृष्ट श्लोक कहा जा सकता है। ऋषि सोच रहे है–
यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया
कण्ठ: स्तम्भितवाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमपि स्नेहादरण्यौकस:
पीड्यन्ते गृहिण: कथं न तनयाविश्लेषदु:खैर्नवै:।
‘शकुन्तला आज चली जायगी, इस विचार के आते ही मेरे हृदय में एक प्रकार की कँपकँपी सी हो रही है।क्रमशः
Comments
Post a Comment