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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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एक प्रकार की विचित्र उत्‍कण्‍ठा सी प्रतीत होती है। गला अपने आप रुद्ध सा हो रहा है, अश्रु स्‍वत: ही निकल पडते हैं, एक प्रकार की जड़ता का अनुभव कर रहा हूँ।जाने क्‍यों दिल में घबड़ाहट सी हो रही है। जब वनवासी वीतराग मुझ मुनि की ही ऐसी दशा है, तो गृहस्‍थाश्रम के मोह में फँसे हुए गृहस्थियों की तो पुत्री-वियोग के समय न जाने क्‍या दशा होती होगी?’
इन वाक्‍यों में भगवान कण्‍व की छिपी हुई भावी वेदना है। वे अपने भारी ज्ञान के प्रभाव से उसे छिपाना चाहते हैं, किन्‍तु श्रीकृष्‍ण के मथुरा गमन का समाचार सुनकर गोपिकाओं को जो भावी विरह-वेदना हुई वह तो कुछ बात ही दूसरी है। वैसे तो सभी का विरह उत्‍कृष्‍ट है, किन्‍तु राधिका जी के विरह को ही सर्वोत्‍कृष्‍ट माना गया है।एक सखी इस हृदय को हिला देने वाले समाचार को लेकर श्रीमती जी के समीप जाती है। उसे सुनते ही राधिका जी  किंकर्तव्‍यविमूढ़ सी होकर प्रलाप करने लगती हैं। उनके प्रलाप को मिथिला के अमर कवि श्री विद्यापति ठाकुर के शब्‍दों में सुनिये। अहा ! कितना बढ़िया वर्णन है। राधिका जी कह रही हैं–

कि करिब, कोथा याब, सोयाय ना हय। 
ना याय कठिन प्राण किबा लागि रय।।
पियार लागिया हाम कोन देशे याब। 
रजनी प्रभात हैले कार मुख चाब।।
बन्‍धु याबे दूर देशे मरिब आमि शोके।
सागरे त्‍यजिब प्राण नाहि देखे लोके।।
नहेत पियार गलार माला ये करिया। 
देशे देशे भरमिब योगिनी हइया।।
विद्यापति क‍बि इह दु:ख गान। 
राजा शिवसिंह लछिमा परमान।।

‘मैं क्‍या करूँ? कहाँ जाऊँ? कुछ अच्‍छा नहीं लगता। अरे ! ये निष्‍ठुर प्राण भी तो नहीं निकलते। प्रियतम के लिये मैं किस देश में जाऊँ, रजनी बीतने पर प्रात:काल किसके कमलमुख की आरे निहारूँगी? प्‍यारे तो दूर देश में जा रहे हैं, मैं उनके विरह-शोक में मर जाऊँगी।समुद्र में कूदकर प्राण गँवा दूँगी जिससे लोगों की दृष्टि से ओझल रह सकूँ। नहीं तो प्‍यारे को गले की माला बनाकर देश-विदेशों में योगिनी बनकर घूमती रहूँगी। कवि विद्यापति इस दु:खपूर्ण गान को गाता है, इसमें लछिमा औरा राजा शिवसिंह प्रमाण हैं।’ यह भावी विरह का उदाहरण है। 

वर्तमान विरह– जो अब तक अपने साथ रहा, जिसके साथ रहकर भाँति भाँति के सुख भोगे, विविध प्रकार के आनन्‍द का अनुभव किया, वही जाने के लिये एकदम तैयार खड़ा है। उस समय जो दिल में एक प्रकार की धड़कन होती है, सीने में कोई मानो साथ ही सैकड़ौं सुइयाँ चुभो रहा हो, उसी प्रकार की सी कुछ-कुछ दशा होती है उसे ही ‘वर्तमान विरह’ कहते है।
शकुन्‍तला अपने धर्म पिता भगवान कण्‍व के पैर छूकर और पियम्‍बदा आदि सखियों से मिल-जुलकर पास की कुटियों में से धीरे धीरे निकलकर भगवान कण्‍व की हवन वेदी वाले चबूतरे के नीचे एक पेड़ के सहारे से खड़ी हो गयी है। सभी शिष्‍य वर्ग शोक से सिर नीचा किये इधर-उधर खड़े हैं।शकुन्‍तला की सखियां सुबकियां भर रही हैं। साथ जाने वाले शिष्‍य वल्‍कल वस्‍त्रों की पुटलियों को बगल में दाबे एक ओर खड़े हैं।ऋषि कण्‍व का कलेजा फटा सा जा रहा है, मानो उसे बलात कोई खींच रहा हो। इतने बड़े कुलपति होकर अपनी विरह-वेदना को किस पर प्रकट करें। जो सुनेगा वहीं हँसेगा कि इतने बड़े ज्ञानी महर्षि ये कैसी भूली-भूली मोह की सी बातें कर रहे हैं। इस भय से वे और किसी से न कहकर वृक्षों से कह रहे हैं–

पातुं न प्रथमं व्‍यवस्‍यति जलं युस्‍मास्‍वपीतेषु या
नादत्ते प्रियमण्‍डनापि भवतां स्‍नेहेन या पल्‍लवम्।
आदौ व: कुसुमप्रसूतिसमये यस्‍या भवत्‍युत्‍सव:
सेयं याति शकुन्‍तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्।

*य‘वृक्षो ! यह शकुन्‍तला अपने पति के घर जा रही है। देखो, तुम्‍हारे प्रति तो इसका अत्‍यन्‍त ही स्‍नेह था। जब तक यह तुम्‍हें पानी नहीं पिला लेती थी तब तक स्‍वयं भी पानी नहीं पीती थी। इसे गहने पहनने का यद्यपि बड़ा भारी शौक था, फिर भी यह तुम्‍हारे स्‍नेह के कारण तुम्‍हारे पत्तों को नहीं तोड़ती थी।वसन्‍त में जब तुम पर नये ही नये फूल आते थे तब यह उस खुशी में बड़ा भारी उत्‍सव मनाती थी। हाय ! वही तुम सब लोगों की रक्षा करने वाली शकुन्‍तला अब जा रही है, तुम सब मिलकर इसे आज्ञा दो।’
महर्षि के एक-एक शब्‍द में करुणा फूट-फूटकर निकल रही है। मूक वृक्षों के प्रति अपनी वेदना प्रकट करके ऋषि ने उसे और भी अधिक हृदयग्राही बना दिया है। किन्‍तु इसमें भाव को छिपाने की चेष्‍टा की गयी है, लोक लाज की परवा की है। ‘प्रेम में नेम कहाँ? वहाँ तो सब कुछ छोड़ना होता है। इस प्रकार की गम्‍भीरता और वाकचातुरी राजमार्ग में दूषण ही समझा जाता है, इन भावों के प्रेम की न्‍यूनता ही समझी जाती है। इसीलिये तो कवियों ने नायिकाओं के ही द्वारा ये भाव प्रकट कराये हैं।सचमुच ये भाव सरस नारी हृदय में ही पूर्णरीत्‍या प्रकट हो सकते हैं। गोपिकाओं के बिना इस विरह-वेदना का अधिकारी दूसरा हो ही कौन सकता है? रथ पर बैठकर मथुरा जाने वाले श्रीकृष्‍ण के विरह में व्रजांगनाओं की क्‍या दशा हुई, इसे भगवान व्‍यासदेव की ही अमर वाणी में सुनिये। उनके बिना इस अनुभवगम्‍य विषय का वर्णन कर ही कौन सकता है?

एवं बुवाणा विरहातुरा भृशं 
व्रजस्त्रिय: कृष्‍णविषक्‍तमानसा:।
विसृज्‍य लज्‍जां रुरुदु: स्‍म सुस्‍वरे 
गोविन्‍द दामोदर माधवेति।।

श्रीशुकदेव जी राजा परीक्षित  से कह रहे हैं– ‘राजन ! जिनके चित्‍त श्रीकृष्‍ण में अत्‍यन्‍त ही आसक्‍त हो रहे हैं, जो भविष्‍य में हाने वाले विरह-दु:ख को स्‍मरण करके घबड़ायी हुई नाना भाँति के आर्तवचनों को कहती हुई और लोक लाज आदि बात की भी परवा न करती हुई वे व्रज की स्त्रियां ऊँचे स्‍वर से चिल्‍ला-चिल्‍लाकर हा गोविन्‍द ! हा माधव ! ! हा दामोदर ! ! ! कह-कहकर रुदन करने लगीं।’ यही वर्तमान विरह का सर्वोत्‍तम उदाहरण है।

प्‍यारे चले गये, अब उनसे फिर भेंट होगी या नहीं इसी द्विविध का नाम ‘भूत विरह’ है। इसमें आशा निराशा दोनों का सम्मिश्रण है। यदि मिलन की एकदम आशा ही न रहे तो फिर जीवन का काम ही क्‍या? फिर तो क्षणभर में इस शरीर को भस्‍म कर दें। प्‍यारे के मिलन की आशा तो अवश्‍य है, किन्‍तु पता नहीं वह आशा कब पूरी होगी।
क्रमशः

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