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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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पूरी होगी भी या नहीं, इसका भी कोई निश्चय नहीं। बस, प्यारे एक ही बार, दूर से ही थोडी ही देर के लिये क्यों न हो, दर्शन हो जायँ। बस, इसी एक लालसा से वियोगिनी अपने शरीर को धारण किये रहती है। उस समय उसकी दशा विचित्र होती है। सारधारणतया उस विरह की दस दशाएं बतायी गयी हैं। वे ये हैं–
चिन्ता, जागरण, उद्वेग, कृशता, मलिनता, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, मोह और मृत्यु- ये ही विरह की दश दशाएँ हैं।
चिन्ता– अपने प्यारे के ही विषय में सोते जागते, उठते बैठते हर समय सोचते रहने का नाम चिन्ता है। मन में दूसरे विचारों के लिये स्थान ही न रहे। व्रजभाषा गगन के परम प्रकाशमान ‘सूर’ ने चिन्ता का कैसा सजीव वर्णन किया है–
नाहिन रह्यो मन में ठौर।
नंद-नंदन अछत कैसे आनिये उर और।
चलत चितवत दिवस जागत, सुपन सोवत रात।
हृदयतें वह स्याम मूरति छिन न इत उत जात।।
स्याम गात सरोज आनन ललित-गति मृदु-हास।
‘सूर’ ऐसे रूप कारन मरत लोचन-प्यास।
प्यासे फिर नींद कहां? नींद तो आँखों में ही आती है आँखें ही रूप की प्यासी हैं, ऐसी अवस्था में नींद वहाँ आ ही नहीं सकती। इसलिये विरह की दूसरी दशा ‘जागरण’ है।
जागरण– न सोने का ही नाम ‘जागरण’ है। यदि विरहिणी को क्षणभर के लिये निद्रा आ जाय तो वह स्वप्न में तो प्रियतम के दर्शन-सुख का आनन्द उठा ले। किन्तु उसकी आँखों में नींद कहाँ? राधिका जी अपनी एक प्रिय सखी से कह रही हैं–
या: पश्यन्ति प्रियं स्वप्ने धन्यास्ता: सखि योषित:।
अस्माकं तु गते कृष्णे गता निद्रापि वैरिणी।।[पद्यावली]
‘प्यारी सखी ! वे स्त्रियां धन्य हैं जो प्रियतम के दर्शन स्वप्न में तो कर लेती हैं। मुझ दु:खिनी के भाग्य में तो यह सुख भी नहीं बदा है। मेरी तो वैरिणी निद्रा भी श्रीकृष्ण के साथ ही साथ मथुरा को चली गयी। वह मेरे पास आती ही नहीं’। धन्य है, निद्रा आवे कहाँ? आँखों में तो प्यारे रूप ने अड्डा जमा लिया है। एक म्यान में दो तलवार समा ही कैसे सकती हैं? उद्वेग-हृदय में जो एक प्रकार की हलचलजन्य बेकली-सी होती है उसी का नाम उद्वेग है। भारतेन्दु हरश्चिन्द्र ने उद्वेग का कितना सुन्दर वर्णन किया है–
व्याकुलही तडपौं बिनु प्रीतम,
कोऊ तौ नेकु या उर लाओ,
प्यासी तजौं तुन रूप-सुधा बिनु,
पानिय पीको पपीहै पिआओ।।
जीयमें हौस कहूँ रहि जाय न,
हा ! ‘हरिचंद’ कोऊ उठि धाओ।।
आवै न आवै पियारो अरे !
कोउ हाल तौ जाइकै मेरो सुनाओ।
पागलपन की हद हो गयी न ! भला कोई जाकर हाल ही सुना देता तो इससे क्या हो जाता? चौथी दशा कृशता है।
कृशता– प्यारे की याद में बिना खाये पीये दिन रात्रि चिन्ता करने के कारण जो शरीर दुबला हो जाता है उसे ‘कृशता’ या ‘तनाव’ कहते हैं। इसका उदारण लीजिये। गोपियों की दशा देखकर ऊधोजी मथुरा लौटकर आ गये हैं और बड़े ही करुणस्वर से राधिका जी की दशा का वर्णन कर रहे हैं। अन्धे सूर ने इस वर्णन में कमाल कर दिया है, सुनिये–
चित दै सुनौ स्याम प्रबीन।
हरि ! तुम्हारे बिरह राधा, मैं जु देखी छीन।।
तज्यो तेल तमोल भूषन, अंग बसन मलीन।
कंकना कर बाम राख्यो, गाढ़ भुज गहि लीन।।
जब सँदेसो कहन सुन्दरि, गमन मोतनकीन।
सखि मुद्रावलि चरन अरुझी, गिरि धरनिबलहीन।।
कंठ बचन न बोल आवै, हृदय आंसुनि भीन।
नैन जल भरि रोइ दीनों, ग्रसित आपद दीन।।
उठी बहुरि सँभारि भट ज्यों, परम साहस कीन।
‘सूर’ प्रभु कल्यान ऐसे, जियहि आसा लीन।।
यदि इसी एक अद्वितीय पद को विरह की सभी दशाओं के लिये उद्धृत कर दें तो सम्पूर्ण विरह-वेदना के चित्र को खींचने में पर्याप्त होगा। विरहिणी राधा की ‘कृशता’, ‘मलिनता’, ‘चिन्ता’, ‘उद्वेग’, ‘व्याधि’, ‘मोह’ और मृत्यु तक की दसों दशाओं का वर्णन इसी एक पद में कर दिया है। मृत्यु को शास्त्रकारों ने साक्षात मृत्यु न बताकर ‘मृत्युतुल्य अवस्था’ ही बताया है। राधिका जी की इससे बढ़कर और मृत्युतुल्य अवस्था हो ही क्या सकती है?
मलिनांगता– शरीर की सुधि न होने से शरीर पर मैल जमा जाता है, बाल चिकट जाते हैं, वस्त्र गंदे हो जाते हैं इसे ही ‘मलिनता’ या मालिनांगता कहते हैं। ऊपर पद में राधिका जी के लिये आया ही है–
तज्यो तेल तमोल भूषन अंग बसन मलीन।
प्रलाप– शोक के आवेश में अपने पराये को भूलकर जो पागलों की तहर भूली-भूली बातें करने लगते हैं उनका नाम प्रलाप है। सीता जी की खोज में लक्ष्मण जी के साथ रामचन्द्र जी वनों में फिर रहे हैं। हृदय में भारी विरह है, अपने पराये का ज्ञान नहीं, शरीर का होश नहीं, वे चौंककर खड़े हो जाते हैं और प्रलाप करने लगते हैं–
कोऽहं ब्रूहि सखे स्वयं स भगवानार्य: स को राघव:
के यूयं बत नाथ नाथ किमिदं दासोऽस्मि ते लक्ष्मण:।
कान्तारे किमिहास्महे बत सखे देव्या गतिर्मृग्यते
का देवी जनकारिधराजतनया हा जानकि क्वासि हा।
भगवान लक्ष्मण जी से चौंककर पूछते हैं– ‘भैया ! मैं कौन हूँ, मुझे बताओ तो सही।’
लक्ष्मण कहते हैं– ‘प्रभो ! आप साक्षात भगवान हैं।’
फिर पूछते हैं– ‘कौन भगवान?
लक्ष्मण कहते हैं– ‘रघु महाराज के वंश में उत्पन्न होने वाले श्री राम।’
फिर चारों ओर देखकर पूछते हैं- 'अच्छा तुम कौन हो?'
यह सुनकर अत्यन्त ही अधीर होकर लक्ष्मण जी दीनता के साथ कहते हैं– ‘हे स्वामिन ! हे दयालो ! यह आप कैसी बातें कर रहे हैं। मैं आपका चरण सेवक लक्ष्मण हूँ’।
भगवान फिर उसी प्रकार कहते हैं– ‘तब फिर हम यहाँ जंगलों में क्यों घूम रहे हैं?’ शान्ति के साथ धीरे से लक्ष्मण जी कहते हैं– ‘हम देवी की खोज कर रहे हैं।’
चौंककर भगवान पूछते हैं– ‘कौन देवी?’
लक्ष्मण जी कहते हैं– ‘जगद्वन्दिनी, जनकनन्दिनी, श्री सीता जी।’
बस, सीता जी का नाम सुनते ही ‘हा सीते ! हा जानकी ! तू कहाँ चली गयी’ कहते-कहते भगवान मूर्च्छित हो जाते हैं। इन बेसिर पैर की बातों का ही नाम ‘प्रलाप’ है –
व्याधि– शरीर में किसी कारण से जो वेदना होती है उसे ‘व्याधि’ कहते हैं और मन की वेदना को ‘आधि’ कहते हैं। विरह की ‘व्याधि’ भी एक दशा है। उदाहरण लीजिये। श्रीराधा जी अपनी प्रिय सखी ललिता से कह रही हैं –
उत्तापी पुटपाकतोऽपि गरलग्रामादपि क्षोभणो।
दम्भोलेरपि दु:सह: कटुरलं हृन्मग्नशल्यादपि।
क्रमशः
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