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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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आप उनसे राजापने के भाव से न मिलिये। मान लीजिये, वे विषयी ही हैं तो आपकी तो वे कुछ हानि नहीं कर सकते। उलटे उनका ही उद्धार हो जायगा। आपकी कृपा से संसारी लोगों का संसार-बन्धन छूट जाता है।’
महाप्रभु ने कहा- ‘भट्टाचार्य महाशय ! यह बात नहीं है-
आकारादपि भेतव्यं स्त्रीणां विषयिणामपि।
यथाऽहेर्मनस: क्षोभस्तथा तस्याकृतेरपि।
(त्यागी पुरुष को) स्त्रियों की और विषयी पुरुषों की आकृति से भी डरना चाहिये; क्योंकि साँप से जिस प्रकार चित्त में क्षोभ होता है उसी प्रकार उसकी आकृति से भी होता है।’ फिर उनके साथ वार्तालाप और संसर्ग करना तो दूर रहा।
इस उत्तर को सुनकर भट्टाचार्य चुप हो गये, फिर उन्होंने प्रभु से इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा। वे विषण्ण मन से अपने घर लौट गये और सोचने लगे कि राजा को क्या उत्तर लिखूँ। इसी सोच-विचार में वे दो-तीन दिन पड़े रहे। उन्होंने राजा को कुछ भी उत्तर नहीं लिखा।
इसी बीच में राय रामानन्द जी विद्यानगर से कटक होते हुए पुरी में प्रभु के दर्शन के निमित्त आये। प्रभु उन्हें देखते ही एकदम खिल उठे और भूमि में पड़े हुए राय रामानन्द जी को उठाकर उनका गाढ़ालिंगन किया। बार बार छाती से लगाते हुए प्रभु कहने लगे- ‘मुझे राम ही नहीं मिले, आनन्द के सहित राम मिले हैं। अब मेरे आनन्द की सीमा नहीं रही। अब मैं निरन्तर आनन्द सागर में ही गोते लगाता रहूँगा।
रामानन्द के प्रति प्रभु के ऐसे प्रगाढ़ प्रेम को देखकर सभी भक्त विस्मित हो गये, वे रामानन्द के भाग्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। स्वस्थ होकर बैठ जाने पर राय महाशय ने कहा- ‘प्रभो ! आपके आज्ञानुसार राजकाज से अवकाश ग्रहण करने के निमित्त मैंने महाराज से निवदेन किया था। मैंने स्पष्ट कह दिया कि मुझे अब इस कार्य से छुट्टी मिलनी चाहिये। अब मैं पुरी में निवास करके श्रीचैतन्य-चरणों का सेवन करूँगा। मेरे मुख से आपका नाम सुनकर महाराज परम प्रसन्न हुए। उन्होंने उठकर मेरा आलिंगन किया और समीप में बैठाकर आपके सम्बन्ध में वे बहुत-सी बातें पूछते रहे। आपके चरणों में उनके ऐसे दृढ़ अनुराग को देखकर मैं विस्मित हो गया। जो पहले मुझसे सीधी तरह से बोलते भी नहीं थे, वे ही आपके सेवक होने के नाते मुझसे बराबर के मित्र की भाँति मिले और मेरा इतना अधिक सत्कार किया।
प्रभु ने कहा- ‘राय महाशय ! आपके ऊपर भगवान की कृपा है, आप श्रीकृष्ण के किंकर हैं, भगवदनुचरों का सभी लोग आदर करते हैं।’ इस प्रकार परस्पर में बहुत देर तक इसी प्रकार की प्रेमवार्ता होती रही। राय महाशय ने पुरी, भारती नित्यानन्द जी आदि उपस्थित सभी साधु महात्माओं की चरणा-वन्दना की और फिर वे प्रभु से आज्ञा लेकर भगवान के दर्शन के लिये चले गये।
उसी समय कटकाधिप महाराज प्रतापरुद्र भगवान की रथयात्रा के निमित्त से पुरी पधारे! उन्होंने सार्वभौम भट्टाचार्य को बुलवाकर उनसे पूछा- ‘भट्टाचार्य महाशय ! आपने महाप्रभु से मेरे सम्बन्ध में पूछा था?’
भट्टाचार्य ने कहा- ‘मैंने बार बार प्रार्थना की, किन्तु उन्होंने आपसे मिलना स्वीकार ही नहीं किया।’
महाराज ने कहा- ‘जब वे सर्वसमर्थ होकर मुझ जैसे पापियों से इतनी घृणा करते हैं, तो मुझ-जैसे अधमों का उद्धार कैसे होगा।?’
भट्टाचार्य ने कहा- ‘उनकी तो ऐसी प्रतिज्ञा है कि वे राजा के दर्शन नहीं करते।’
महाराज के अत्यन्त ही वेदना के स्वर में कहा- ‘यदि उनकी ऐसी प्रतिज्ञा है, तो मेरी भी यह प्रतिज्ञा है कि या तो प्रभु की पूर्ण कृपा प्राप्ति करूँगा या इस शरीर का ही परित्याग कर दूँगा।’
महाराज के ऐसे दृढ़ अनुराग को देखकर सार्वभौम भट्टाचार्य बहुत ही विस्मित हुए और महाराज को सान्त्वना देते हुए कहने लगे- ‘महाराज, आप इतने अधीर न हों। मेरा हृदय कह रहा है कि प्रभु आपके ऊपर अवश्य कृपा करेंगे। कल राय रामानन्द जी ने प्रभु के सम्मुख आपकी बहुत ही प्रशंसा की थी, उसका प्रभाव मुझे प्रत्यक्ष ही दृष्टिगोचर हुआ। प्रभु का मन आपकी ओर से बहुत ही अधिक कोमल हो गया है। अब आप एक काम कीजिये। राजवेष से तो उनसे मिलना ठीक नहीं है। रथयात्रा के समय जब प्रभु भक्तों के सहित जगन्नाथ जी के रथ के आगे आगे नृत्य करते हुए चलेंगे, तब आप साधारण वेष में जाकर उनके सामने कोई भक्तिपूर्ण श्लोक पढ़ने लगियेगा। प्रभु भक्त समझकर आपका दृढ़ आलिंगन करेंगे। तभी आपकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जायँगी।’
सार्वभौम भट्टाचार्य का बताया हुआ यह उपाय महाराज को पसंद आया और उन्होंने भट्टाचार्य से पूछा- ‘रथयात्रा किस दिन होगी?’ भट्टाचार्य ने हिसाब करके बताया- ‘आज से तीसरे दिन रथयात्रा होगी। तभी हम सब मिलकर उद्योग करेंगे।’ यह सुनने से महाराज को संतोष हुआ और भट्टाचार्य महाराज की अनुमति लेकर अपने स्थान को चले आये।
गौर भक्तों का पुरी में अपूर्व सम्मिलन….
वाञ्छाकल्पतरुभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नम:।
अहा ! कितना सुखद संवाद है, हृदय को प्रफुल्लित कर देने वाला यह कैसा मनोहारी वृत्तान्त है। आपने प्रिय के सम्मिलन-सुख को सुनकर ऐसा कौन हृदयहीन जड बुद्धि पुरुष होगा, जिसका मन कमल लिख न उठता हो। नीतिकारों ने ठीक ही कहा है- ‘अमृतं प्रियदर्शनम्।’
इस संसार में अपने प्यारे से भेंट होना ही सर्वोत्तम अमृत है। जो इस अमृत का निरन्तर पान करते रहते हैं, ऐसे भक्तों के चरणों में हमारा बारम्बार प्रणाम है।
महाप्रभु के पुरी पधारने का समाचार सुनते ही गौर-भक्तों के आनन्द की सीमा नहीं रही। बहुत से भक्त तो प्रभु के साथ संकीर्तन सुख का आनन्द अनुभव कर चुके थे। बहुत से ऐसे भी थे, जिन्होंने अभी तक महाप्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन ही नहीं किये थे। उन्होंने प्रभु के बिना दर्शन किये ही उन्हें आत्मसमर्पण कर दिया था। आज उनके आनन्द का कहना ही क्या है, सभी भक्त प्रभु के दर्शन की खुशी में अपने आप को भूले हुए हैं। सभी ने पुरी में चलकर प्रभु के दर्शनों का निश्चय किया। सभी भक्तों के अग्रणी आचार्य अद्वैत ही थे। उनकी सम्मति हुई कि हम लोगों को पुरी के लिये शीघ्र ही प्रस्थान कर देना चाहिये, जिससे आषाढ़ में होने वाली भगवान की रथयात्रा में भी सम्मिलित हो सकें और बरसात के चार महीने प्रभु के समीप ही बितावें। यह सम्मति सबको पसंद आयी।
क्रमशः
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