240
श्री श्री चैतन्य चरितावली
240
यदि हीरा-मोती कंकड़ पत्थरों की भाँति सर्वत्र मिलने लगें, यदि सुवर्ण मिट्टी की भाँति वैसे ही बिना परिश्रम के खोदने से मिल जाया करे तो न तो जनता में इन वस्तुओं का इतना अधिक आदर होगा और न ये बहुमूल्य ही समझी जायँगी। इसीलिये मैं बार बार लोगों से कहता हूँ, अपने को मूल्यवान बनाना चाहते हो तो किसी भी काम में घोर परिश्रम करो, सर्वसाधारण लोगों से अपने को ऊँचा उठा लो, विश्व से प्रेम करना सीखो, तुम मुल्यवान हो जाओगे। संसार में सर्वश्रेष्ठ समझे जाने वाले राजे महाराजे ने तुम्हारे चरणों में लोटेंगे और तुम उनके मान सम्मान की कुछ भी परवा न करोगे।
महाप्रभु ज्यों ज्यों राजा से न मिलने की इच्छा प्रकट करने लगे। त्यों ही त्यों कटकाधिप महाराज प्रतापरुद्र जी की प्रभु दर्शन की उत्सुकता अधिकाधिक बढ़ती गयी। अब वे सोते-जागते प्रभु के ही सम्बन्ध में सोचने लगे। जब सार्वभौम भट्टाचार्य ने कह दिया कि प्रभु स्वयं मिलने के लिये सहमत नहीं हैं, तब महाराज ने सार्वभौम के द्वारा प्रभु के अन्तरंग भक्तों के समीप प्रार्थना की कि वे प्रभु के चित्त को हमारी ओर आकर्षित करें। इसीलिये उन्होंने अत्यन्त स्नेह प्रकट करके राय रामानन्द जी को प्रभु के पास भेजा था। राय महाशय प्रभु के परम अन्तरंग भक्त बन चुके थे। उन्होंने प्रभु से कई बार निवदेन किया, किन्तु प्रभु ने राजा से मिलने की कभी सम्मति नहीं दी।
तब एक दिन नित्यानन्द जी, सार्वभौम, राय रामानन्द तथा अन्य कई अत्यन्त ही समीपी भक्त प्रभु के समीप पहुँचे। प्रभु के पास पहुँचकर किसी को भी साहस नहीं हुआ कि वे महाराज के दर्शन देने की सिफारिश कर सकें। एक दूसरे की ओर आँखों ही आँखों में संकेत करने लगे। तब कुछ साहस करके नित्यानन्द ने कहा- ‘प्रभो! हम कुछ निवदेन करना चाहते हैं। वैसे तो कहने में संकोच होता है, किन्तु जब आपसे ही अपने मनोगत भावों को न कहेंगे तो फिर और किससे कहेंगे, इसलिये आज्ञा हो तो कहें?’
प्रभु ने कहा- ‘श्रीपाद ! आपको संकोच करने की कौन सी बात है, आप जो कहना चाहते हों, निर्भय होकर कहिये।‘
नित्यानन्द जी ने धीरे से कहा- ‘महाराज प्रतापरुद्र जी आपके दर्शन के लिये बड़े ही उत्कण्ठित हो रहे हैं, उन्हें आप दर्शन देने से क्यों मना करते हैं। वे जगन्नाथ जी के भक्त हैं, उनके ऊपर कृपा होनी चाहिये।’
महाप्रभु ने कुछ गम्भीरता के साथ कहा- ‘श्रीपाद ! आपकी तो न जाने मेरे प्रति कैसी धारणा हो गयी है। आप चाहते हैं, मैं जैसे भी हो खूब ख्याति लाभ करूँ। कटक जाकर महाराज से मिलूँ। मुझसे यही नहीं होने का।’
नित्यानन्द जी ने कहा- ‘आपसे कटक जाने को कौन कहता है? यहीं महाराज ठहरे हुए हैं, मन्दिर में ही उन्हें दर्शन दीजिये या वे यहाँ भी आ सकते हैं।’
महाप्रभु ने स्नेह प्रकट करते हुए कहा- ‘मुझे ऐसी आवश्यकता ही क्या है कि उन्हें यहाँ बुलाऊँ। मैं ठहरा भिक्षुक संन्यासी। वे ठहरे महाराजा। मेरा उनका सम्बन्ध ही क्या?’
नित्यानन्द जी ने कहा- ‘वे राजापने से मिलना नहीं चाहते हैं, वे तो आपके भक्त हैं। जैसे सब दर्शन करते हैं। उसी प्रकार उन्हें भी आज्ञा दे दीजिये।’
महाप्रभु ने कुछ हँसकर कहा- ‘आप यह सब बातें कह रहे हैं। पता नहीं, आपको यह क्या नयी बात सूझी है। सचमुच वे बड़े महाभाग हैं, जिनके कल्याण के लिये आप सभी इतने अधिक चिन्तित हैं। किन्तु मैं संन्यासधर्म के विरुद्ध आचरण कैसे करूँ? लोग चाहे दिनभर असंख्यों बुरे बुरे काम करते रहें, किन्तु संन्यासी होकर कोई एक भी बुरा काम करता है तो लोग उसकी बड़ी भारी आलोचना करते हैं। स्वच्छ वस्त्र पर छोटा सा दाग भी स्पष्ट दीखने लगता है। राज दर्शन से लोक परलोक दोनों की ही हानि होती है। लोग भाँति-भाँति की आलोचना करने लगेंगे। और लोगों की बात तो जाने दिजिये, ये हमारे गुरु महाराज दामोदर पण्डित ही हमें खूब डांटेंगे। अच्छा, जाने दीजिये सब बातों को, दामोदर पण्डित आज्ञा दे दें तो मैं राजा से मिल सकता हूँ।’ इतना कहकर महाप्रभु मन्द मुस्कान के साथ दामोदर पण्डित की ओर देखने लगे। दामोदर पण्डित ने अपनी दृष्टि नीची कर ली और वे कुछ भी नहीं बोले। तब महाप्रभु ने कहा- ‘दामोदर जी ! बोलिये, क्या कहते हैं?’
नीची दृष्टि किये हुए धीरे-धीरे दामोदर पण्डित कहने लगे- ‘आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, जो चाहे सो करें, मुझसे इस विषय में पूछने की क्या बात है। मैं आपको सम्मत्ति ही क्या दे सकता हूँ।’
महाप्रभु ने बात को टालते हुए कहा- ‘भाई ! जाने दिजिये इनकी सम्मति नहीं है।’ नित्यानन्द जी तथा अन्य सभी भक्त समझ तो गये कि प्रभु का हृदय महाराज के गुणों से पिघल गया है और अब उनका महाराज के प्रति स्नेह भी हो गया है, किन्तु बात को यहीं समाप्त होते देखकर नित्यानन्द जी कहने लगे- ‘अच्छा, यदि उन्हें दर्शन की आज्ञा आप नहीं देते हैं तो अपने शरीर का स्पर्श किया हुआ एक वस्त्र ही उन्हें देकर कृतार्थ कीजिये। उसी से उन्हें सन्तोष हो जायगा।’
महाप्रभु ने स्नेह के स्वर में कहा- ‘बाबा ! आपको जो अच्छा लगे वही करें। मैं तो आपके हाथ की कठपुतली हूँ, जैसे नचायेंगे नाचूँगा। आपकी इच्छा के विरुद्ध कर ही क्या सकता हूँ?’ महाप्रभु की इस प्रकार अनुमति पाकर नित्यानन्द जी ने गोविन्द से प्रभु के ओढ़ने का एक बर्हिवास लेकर सार्वभौम भट्टाचार्य के हाथों महाराज के पास पहुँचा दिया। प्रभु के अंग के वस्त्र को पाकर महाराज को बड़ी प्रसन्नता हुई और वे बड़े ही सम्मान के साथ अपने पास रखने लगे।
एक दिन रामानन्द राय ने कहा- ‘प्रभो ! राजपुत्र तो आकर आपके दर्शन कर सकते है?’
प्रभु ने कहा- ‘जैसी आपकी इच्छा, मैं इस सम्बन्ध में आपसे क्या कहूँ, आप स्वतन्त्र हैं जो चाहें सो करें। दोष तो किसी के भी आने में नहीं है, किन्तु अभिमानी के सामने स्वयं भी अभिमान के भाव जाग्रत हो उठते हैं। इसीलिये संन्यासी को राजदरबार में जाना निषेध बताया है। कैसी भी प्रकृति क्यों न हो, मान सम्मान की जगह जाने से कुछ न कुछ तमोगुण आ ही जाता है। बच्चे तो सरल होते हैं, उन्हें मान सम्मान या आदर शिष्टाचार का ध्यान ही नहीं होता। इसीलिये उनसे मिलने में किसी का उद्वेग नहीं होता।
क्रमशः
Comments
Post a Comment