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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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यदि राजपुत्र आना चाहे तो उसे आप प्रसन्नतापूर्वक ला सकते हैं।’
प्रभु की आज्ञा पाकर रामानन्द जी उसी समय महाराज के निवास स्थान में गये। उस समय महाराज सपरिवार पुरी में ठहर हुए थे। स्नान यात्रा के तीन दिन पूर्व महाराज को पुरी आ जाना पड़ता है और रथयात्रापर्यन्त वे वहाँ रहते हैं, इसीलिये महाराज आये हुए थे। राय रामानन्द जी की कहीं भी जाने की रोक टोक नहीं थी, वे भीतर चले गये और राजपुत्र से प्रभु के दर्शनों के लिये कहा। राजपुत्र की पहले से ही इच्छा थी। महाराज तथा महारानी की भी आन्तरिक इच्छा थी। इसलिये रामानन्द जी ने राजपुत्र को खूब सजाया। राजपुत्र एक तो वैसे ही बहुत अधिक सुन्दर था। फिर कवि हृदय रामानन्द जी ने अपने हाथों से उसका श्रृंगार किया। राजपुत्र के कमल के समान सुन्दर बड़े बड़े नेत्र थे, माथा चौड़ा था और दोनों भृकुटियाँ कमान के समान चढ़ाव-उतार की थीं। रामानन्द जी ने राजपुत्र के दोनों कानों में मोतियों से युक्त बड़े बड़े कुण्डल पहनाये। गले में मोतियों का हार पहनाया तथा शरीर पर बहुत ही बढ़ियाँ पीले रंग के वस्त्र पहनाये। कामदारी बहुमूल्य पीताम्बर को ओढ़कर राजपुत्र की अपूर्व ही शोभा बन गयी। राय ने राजपुत्र के घुंघराले काले-काले बालों को अपने हाथों से व्यवस्थित करके उनके ऊपर एक छोटा सा मुकुट बाँध दिया। इस प्रकार उसे खूब सजाकर वे अपने साथ प्रभु के दर्शन के लिये ले गये।
महाप्रभु राजपुत्र को देखते ही प्रेम में अधीर हो उठे। उन्हें भान होने लगा, मानो साक्षात श्रीकृष्ण ही उनके समीप आ गये हैं। प्रभु राजपुत्र को देखते ही जल्दी से उठे और श्रीकृष्ण के सखा के भावावेश में उन्होंने जोरों से राजपुत्र का आलिंगन किया। महाप्रभु का प्रेमालिंगन पाते ही राजपुत्र आनन्द में विभोर होकर ‘श्रीकृष्ण, श्रीकृष्ण’ कहकर जोरों से नृत्य करने लगा। उसके सम्पूर्ण शरीर में प्रेम के सभी सात्त्विक भाव एक साथ हो उदित हो उठे। रामानन्द जी ने उसे संभाला। महाप्रभु उससे बहुत देरतक बालकों की भाँति बातें करते रहे। अन्त में फिर आने के लिये बार-बार कहकर प्रभु ने विदा किया। महाराज तथा महारानी ने पुत्र को गोद में बिठाकर स्वयं महाप्रभु के स्नेह का अनुभव किया। उस दिन से राजपुत्र प्राय: प्रभु के दर्शनों के लिये रोज ही आता था। उसकी गणना प्रभु के अन्तरंग भक्त में होने लगी।
गुण्टिचा (उद्यान मन्दिर) मार्जन……
संसार में असंख्यों घटनाएं रोज घटित होती हैं। माता से छिपकर मिट्टी प्राय: सभी बच्चे खाते हैं, सभी गोपालों के बालक गौएं चराने जाते हैं और अपने हाथों में दही-भात और टैंटी (कैर) का अचार रखकर वहीं खाते हैं। गोपियों की भाँति न जाने कितनी प्रेमिकाएँ अपने प्रियतमों के लिये रोती रहती होंगी। सुदामा के समान धनहीन बहुत से मित्र अपने धनिक मित्रों से मान सम्मान तथा धन पाते होंगे; किन्तु उनका नाम कोई भी नहीं जानता। कारण, उनमें प्रेम की वह पराकाष्ठा नहीं है। भगवान तो प्रेम के सजीव विग्रह थे। प्रेम के संसर्ग होने से ये सभी घटनाएँ अमर हो गयीं और प्रेमी भक्तों के प्रेमवर्धन करने की सर्वोत्तम सामग्री बन गयीं। असल में प्रेम ही सत्य है, प्रेमपूर्वक किये जाने वाले सभी काम प्रेम की ही भाँति अजर-अमर और अमिट होते हैं। प्रेम के साथ प्राणों का भी परित्याग करने पड़े तो वह भी सुखकर प्रतीत होता है। अपने प्रेमी के साथ मरने में मीठा मीठा मजा आता है। प्रेम के सामने दु:ख कैसा। सन्ताप का वहाँ नाम नहीं; थकान, आलस्य या विषण्णता का एकदम अभाव होता है। यदि एक ही उद्देश्य के एक से ही मनवाले दस बीस पचास प्रेमी बन्धु हों तो फिर बैकुण्ठ के सुख का अनुभव करने के लिये अन्यत्र जाने की आवश्यकता नहीं होती। वैकुण्ठ का सुख उनकी संगति में ही मिल जाता है। उनके साथ प्रेमपूर्वक मिलकर जो भी कार्य किया जाता है, वही प्रेममय होने के कारण आनन्दमय और हर्षमय ही होता है।
महाप्रभु गौड़ीय भक्तों के साथ नित्य नयी नयी क्रीड़ाएँ करते थे। उनका भोजन, भजन, स्नान, संकीर्तन तथा हास-परिहास सभी प्रेममय ही होता था। सभी भक्त क्रमश: नित्य प्रति महाप्रभु को अपने अपने यहाँ भिक्षा कराते। महाप्रभु भी एक-एक दिन में भक्तों की प्रसन्नता के निमित्त तीन तीन, चार-चार स्थानों में थोड़ा-थोड़ा भोजन कर लेते। वे भक्तों को साथ लेकर ही मन्दिर में जाते, उनके साथ ही स्नान करते और सबको पास बिठाकर ही प्रसाद पाते।
इस प्रकार धीरे धीरे रथयात्रा का समय समीप आने लगा। पंद्रह दिनों तक एकान्त में महालक्ष्मी के साथ एकान्तवास करने पर अनन्तर जगन्नाथ जी के पट खुलने का समय भी सन्निकट ही आ पहुँचा। नेत्रोत्सव के एक दिन पूर्व महाप्रभु ने एक प्रेम कुतूहल करने का निश्चय किया।
श्रीजगन्नाथ जी के मन्दिर से एक कोस की दूरी पर गुण्टिचा नामका एक उद्यान मन्दिर है। रथ-यात्रा के समय भगवान की सवारी यहीं आकर ठहरती है और एक सप्ताह के लगभग भगवान यहीं निवास करते हैं, फिर लौटकर मन्दिर में आ जाते हैं, इसी का नाम रथ यात्रा है। रथ यात्रा के पूर्व नेत्रोत्सव होता है, उस दिन पंद्रह दिनों के पश्चात कमल नयन भगवान के लोगों को दर्शन होते हैं। नेत्रोत्सव के एक दिन पूर्व ही प्रभु ने गुण्टिचा भवन को मार्जन करने का विचार किया। गुण्टिचा उद्यान मन्दिर का आंगन लगभग डेढ़ सौ गज लंबा है। उसमें मूल मन्दिर के अतिरिक्त एक दूसरा नृसिंह भगवान का मन्दिर भी है। दोनों लगभग पंद्रह-पंद्रह सोलह-सोलह गज लम्बे चौड़े होंगे। महाप्रभु ने काशी मिश्र तथा सार्वभौम भट्टाचार्य को बुलाकर उन पर अपना मनोगत भाव प्रकट किया। सभी को सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ।
काशी मिश्र ने कहा- ‘प्रभु ! गुण्टिचा भवन तो साफ होती ही है, उस काम को करके आप क्या करेंगे, आप तो संकीर्तन ही करें।’
प्रभु ने कहा- ‘मिश्र जी ! आप विद्वान भक्त और जगन्नाथ जी के भक्त होकर ऐसी बात कहते हैं? भगवान की सेवा में कोई भी काम छोटा नहीं है। इन हाथों से भगवान की तुच्छ-से-तुच्छ सेवा का भी सौभाग्य प्राप्त हो सके तो हम अपने जीवन को धन्य समझेंगे। भगवान की सेवा में छोटे-बड़े का ध्यान न आना चाहिये। जो भी काम मिल जाय, उसे ही श्रद्धा-भक्ति के साथ करना चाहिये।
क्रमशः
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