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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रसाद पाते-पाते प्रभु कहते जाते थे- 'अहा, हमारा कैसा सौभाग्य है; श्रीपाद जी के लाये हुए चावल, गदाधर के हाथ से बनाये हुए फिर गोपीनाथभगवान का महाप्रसाद। इस प्रसाद से श्रीकृष्ण-प्रेम की प्राप्ति होती है। इन चावलों की सुन्दर सुगन्धि ही भक्ति को बढ़ाने वाली है।' महाप्रभु के इस प्रकार प्रसाद पाने से सभी को परम प्रसन्नता प्राप्त हुई।'

रथयात्रा के समय नियमानुसार तीसरी बार भक्तों के आने का समय हुआ। अबके भक्त अपनी स्त्रियों को भी साथ लेकर आये थे। भक्तों की विदाई के समय नित्यानन्द जी को एकान्त में बुलाकर महाप्रभु ने उनसे कहा- 'श्रीपाद! आपके लिये विधि-निषेध क्या! आप तो वृन्दावन विहारी गोपकृष्ण के उपासक हैं। बेचारे गँवार ग्वालबाल विधि-निषेध क्या जानें? अब आप एक काम करें, अपना विवाह कर लें और आदर्श गृहस्थ बनकर लोगों के सम्मुख एक सुन्दर आदर्श उपस्थित करें कि गृहस्थ में रहकर भी किस प्रकार भजन, कीर्तन  और परमार्थ-चिन्तन किया जाता है।'

गद्गदकण्ठ से अश्रुविमोचन करते हुए नित्यानन्द जी ने कहा- 'प्रभो! आप तो घर में सन्तानहीन युवती विष्णुप्रिया जी को छोड़कर संन्यासी बन गये हैं ओर मुझे संन्यासी गृहस्थ बनने का उपदेश कर रहे हैं, आपकी लीला जानी नहीं जाती।’
महाप्रभु ने कहा- 'श्रीपाद! मैं अब गृहस्थी भोगने के योग्य नहीं रहा। मेरी अवस्था एकदम पागलों की-सी हो गयी है। मुझसे अब किसी भी काम की आशा करना व्यर्थ है। अब सम्पूर्ण गौड़-देश का भार आपके ऊपर है और यह काम आपके गृहस्थ बन जाने पर ही हो सकेगा।'
नित्यानन्द जी ने कहा- 'प्रभो! मैं आपकी आज्ञा के सम्मुख लोकनिन्दा और शास्त्र-मर्यादा की भी परवा नहीं करता। लोग मेरी निन्दा तो खूब करेंगे कि संन्यासी से अब गृहस्थ बन गया, किन्तु आपकी आज्ञा के सम्मुख मैं इन निन्दा-वाक्यों को अति तुच्छ समझता हूँ। आप जैसी आज्ञा देंगे वैसा ही मैं करूँगा।'

महाप्रभु तो सबके मन की बातें जानते थे, किससे कौन-सा काम कराना उचित होगा, इसका उन्हें ही ज्ञान था। कहाँ तो अपने अंतरंग विरक्त भक्तों को स्त्री-दर्शन करना भी पाप बताते थे और कहा करते थे- 'हा हन्त हन्त विषभक्षणतोअप्यसाधु'  'स्त्रियों का और स्त्रियों से संसर्ग रखने वाले विषयी पुरुषों का दर्शन भी विषभक्षण से भी बुरा है।' और कहाँ आज वे ही अवधूत नित्यानन्द जी को गृहस्थ बनने की आज्ञा दे रहे हैं।

नित्यानन्द जी ने महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य की और वे फिर पुरी से लौटकर पानीहाटी में राघव पण्डित के ही यहाँ आकर ठहरे। इस प्रान्त में नित्यानन्द जी का प्रभाव पहले से ही अत्यधिक था। सभी लोग श्रीगौरांग का दूसरा ही विग्रह समझते थे। इसलिये ये भक्तों को साथ लेकर खूब धूम-धाम से संकीर्तन का प्रचार करने लगे। पाठकों को स्मरण होगा; अम्बिका नगर के सूर्यदास पण्डित के यहाँ नित्यानन्द जी पहले भी ठहरे थे और वे इनके चरणों में भक्ति भी बहुत अधिक रखते थे, उन्हीं के यहाँ जाकर फिर ठहरे। उन्होंने परिवार सहित इनका तथा इनके साथियों को खूब आदर-सत्कार किया। उनकी वसुधा और जाह्नवी नामकी दो सुन्दरी और सुशीला कन्याएँ थीं। इन्हीं दोनों कन्याओं का नित्यानन्द जी के साथ विवाह हुआ।इस प्रकार दो विवाह करके नित्यानन्द जी भगवती भागीरथी के किनारे खड़दा नामक ग्राम में रहने लगे।
भक्तवृन्द इनका बहुत अधिक मान करते थे। यहीं वसुधा के गर्भ से परम तेजस्वी वैष्णव-सम्प्रदाय के प्रवर्तक श्रीवीरचन्द्र जी का जन्म हुआ। उन्होंने नित्यानन्द जी के तिरोभाव के अनन्तर अपना एक अलग ही वैष्णव-सम्प्रदाय बनाया। इनके पश्चात् इनकी पत्नी जाह्नवी देवी भी भक्ति का खूब प्रचार करती रहीं। इस प्रकार नित्यानन्द जी द्वारा गुरुकुल की स्थापना हुई जो किसी-न-किसी रूप में अद्यावधि विद्यमान हैं।

नित्यानन्द जी महाप्रभु के अनन्य उपासक थे, उन्होंने उनकी आज्ञा मानकर लोक-निन्दा सहकर भी विवाह किया और स्त्री-बच्चों में रहकर लोगों को दिखा दिया कि इस प्रकार निर्लिप्त-भाव से रहकर गृहस्थी में भगवद-भजन किया जाता है। वे गृहस्थ होने पर सदा उदासीन ही बने रहते थे। उन्होंने प्रवृत्ति-मार्ग में भी निवृत्ति-मार्ग का आचरण करना बता दिया, निवृत्ति-प्रवृत्ति ये ही दो मार्ग हैं। निवृत्ति-मार्ग का तो कोई लाखों में से एक-आध आचरण कर सकता है। इसीलिये तो भगवान ने 'कमयोगो विशिष्यते' कहकर निष्काम मार्ग की स्तुति की है। प्रवृत्ति-मार्ग दो प्रकार का होता है- एक सकाम, दूसरा निष्काम। आजकल इन्द्रिय-भोगों को भोगते हुए जो गृहस्थ केवल पेट-पालन को ही मुख्य समझते हैं, उनका धर्म न निष्काम है और न सकाम। यह तो पशु-धर्म है; परस्पर के संसर्ग से स्वतः ही सन्तानें बढ़ती रहती हैं। सकाम कर्म वे हैं जो वेदोक्त रीति से स्वर्गादि सुखों की इच्छा से किये जायँ। निष्काम कर्म वे हैं, जो भगवत-प्रीति के ही लिये बिना किसी सांसारिक इच्छा के कर्तव्य समझकर किये जायँ, प्रभु-प्रसन्नता ही जिनका एकमात्र लक्ष्य हो। निष्काम कर्म करने वाले कुल दो प्रकार के होते हैं- एक तो वीर्यजन्य कुल और दूसर शब्दजन्य कुल। जो वंशपरम्परा से उत्पन्न होते हैं, वे वीर्यजन्य कुल कहलाते हैं और जो शिष्य परम्परा से शाखा चलती है, वह शब्दजन्य कुल कहलाते है। आजकल की महन्ती उसी कुलका विकृत और गिरा हुआ स्वरूप है। नित्यानन्द जी द्वारा इन दोनों ही कुलों की सृष्टि हुई। उनके वंशज भी गोस्वामी और वैष्णवों के गुरु हुए और उनकी शिष्य-परम्परा भी अद्यावधि विद्यमान है।

नित्यानन्द जी का गोड़-देश में भगवन्नाम-वितरण…. 

उस समय बंगाल में सुवर्णवणिक् जाति के लोग अत्यन्त ही नीचे समझे जाते थे। उनके हाथ का जल पीना तो दूर रहा, बड़े-बड़े पण्डित विद्वान उन्हें स्पर्श करने में घृणा करते थे। नित्यानन्द जीने सबसे पहले इन्हीं लोगों को अपनाया। ये लोग सम्पत्तिशाली थे, इस बात के लिये बड़े लालायित बने हुए थे कि किसी प्रकार हमारा भी परमार्थ-पथ में प्रवेश हो सके। नित्यानन्द जी ने इनके अछूतपने को एकदम हटा दिया। वे उद्धरण दत्त नामक एक धनी स्वर्णवणिक्के घर पर जाकर ठहरे और सभी स्वर्णवणिकों को भगवद्भक्ति का उपदेश देने लगे। इनके प्रभाव से स्वर्णवणिकों में बड़ी भारी जागृति हो उठी। यह इनके लिये बड़े ही साहस का काम था। इस बात से उच्च जाति के लोग इन्हें भाँति-भाँति से धिक्कारने लगे, किन्तु इन्होंने किसी की परवा नहीं की।
क्रमशः

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