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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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शरीर पसीने से लथपथ हो गया है। शरीर में कँपकँपी ऐसे उठती हैं मानो समुद्र से तरंगें उठ रही हों।’
ऐसी दशा होने पर प्रभु और आगे न बढ़ सके। वे थर-थर कांपते हुए एकदम भूमि पर गिर पड़े । गोविन्द पीछे दौडा आ रहा था, उसने प्रभु को इस दशा में पड़े हुए देखकर उनके मुख में जल डाला और अपने वस्त्र से वायु करने लगा। इतने में ही जगदानन्द पण्डित, गदाधर गोस्वामी, रमाई, नदाई तथा स्वरूप दामोदर आदि भक्त पहुँच गये। प्रभु की ऐसी विचित्र दशा देखकर सभी को परम विस्मय हुआ।
सभी प्रभु को चारों ओर से घेरकर उच्च स्वर से संकीर्तन करने लगे। अब प्रभु को कुछ-कुछ होश आया। वे हुंकार मारकर उठ बैठे और और अपने चारों ओर भूल-से, भटके-से, कुछ गँवाये-से इधर-उधर देखने लगे और स्वरूप गोस्वामी से रोते-रोते कहने लगे– ‘अरे ! हमें यहाँ कौन ले आया? गोवर्धन पर से यहाँ हमें कौन उठा लाया? अहा ! वह कैसी दिव्य छटा थी, गोवर्धन की नीरव निकुंज में नन्दलाल ने अपनी वही बांस की वंशी बजायी। उसकी मीठी ध्वनि सुनकर मैं भी उसी ओर उठ धायी। राधारानी भी अपनी सखी-सहेलियों के साथ उसी स्थान पर आयीं।अहा ! उस सांवरे की कैसी सुन्दर मन्द मुस्कान थी ! उसकी हँसी में जादू था। सभी गोपिकाएँ अकी-सी, जकी-सी, भूली-सी, भटकी-सी उसी को लक्ष्य करके दौड़ी आ रही थीं। सहसा वह सांवला अपनी सर्वश्रेष्ठ सखी श्रीराधिका जी को साथ लेकर न जाने किधर चला गया। तब क्या हुआ कुद पता नहीं।
यहाँ मुझे कौन उठा लाया? इतना कहकर प्रभु बड़े ही जोरों से हा कृष्ण ! हा प्राणवल्लभ ! हा हृदयरमण ! कहकर जोरों से रुदन करने लगे। प्रभु की इस अद्भुत दशा का समाचार सुनकर श्री परमानन्द जी पुरी और ब्रह्मानन्द जी भारती भी दौड़े आये।
अब प्रभु की एकदम बाह्य दशा हो गयी थी, अत: उन्होंने श्रद्धा पूर्वक इन दोनों पूज्य संन्यासियों को प्रणाम किया और संकोच के साथ कहने लगे– ‘आपने क्यों कष्ट किया? व्यर्थ ही इतनी दूर आये।’ पुरी गोस्वामी ने हँसकर कहा– ‘हम भी चले आये कि चलकर तुम्हारा नृत्य ही देखें।’ इतना सुनते ही प्रभु लज्जित-से हो गये। भक्तवृन्द महाप्रभु को साथ लेकर उनके निवास स्थान पर आये।
श्री कृष्णान्वेषण…..
समुद्र तट के सुन्दर उपवन को देखकर प्रभु को बार-बार वृन्दावन की निभृत निकुंज याद आने लगी। उसी अनुपम अरण्य के स्मरणमात्र से ही प्रभु प्रेमविवश हो गये। उन भक्तिरसिक श्रीगौरांग की चंचल रसना निरन्तर ‘कृष्ण-कृष्ण’ इन नामों की आवृत्ति करने लगी। ऐसे वे श्री गौरांग फिर कभी हमारे दृष्टिगोचर होंगे क्या?
महाप्रभु एक दिन समुद्र की ओर स्नान करने के निमित्त जा रहे थे। दूर से ही समुद्र तट की शोभा देखकर वे मुग्ध हो गये। वे खड़े होकर उस अद्भुत छटा को निहारने लगे। अनन्त जलराशि से पूर्ण सरितापति सागर अपने नीलरंग के जल से अठखेलियाँ करता हुआ कुछ गम्भीर-सा शब्द कर रहा है।समुद्र के किनारे पर खजूर, ताड, नारियल और अन्य विविध प्रकार के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष अपने लम्बे-लम्बे पल्लवरूपी हाथों से पथिकों को अपनी ओर बुला-से रहे हैं। वृक्षों के अंगों का जोरों से आलिंगन किये हुए उनकी प्राणप्यारी लताएँ धीरे-धीरे अपने कोमल करों को हिला-हिलाकर संकेत से उन्हें कुछ समझा रही हैं।नीचे एक प्रकार की नीली-नीली घास अपने हरे-पीले-लाल तथा भाँति-भाँति के रंग वाले पुष्पों से उस वन्यस्थली की शोभा को और भी अधिक बढ़ाये हुए हैं। मानो श्रीकृष्ण की गोपियों के साथ होने वाली रासक्रीडा के निमित्त नीले रंग के विविध चित्रों से चित्रित कालीन बिछ रही हो। महाप्रभु उस मनमोहिनी दिव्य छटा को देखकर आत्मविस्मृत से बन गये वे अपने को प्रत्यक्ष वृन्दावन में ही खड़ा हुआ समझने लगे।समुद्र का नीला जल उन्हें यमुना जल ही दिखायी देने लगा। उस क्रीडा स्थली में सखियों के साथ श्रीकृष्ण को क्रीड़ा करते देखकर उन्हें रास में भगवान के अन्तर्धान होने की लीला स्मरण हो उठी। बस, फिर क्या था, लगे वक्षों से श्रीकृष्ण का पता पूछने। वे अपने को गोपी समझकर वृक्षों के समीप जाकर बडे ही करुणस्वर में उन्हें सम्बोधन करके पूछने लगे –
हे कदम्ब ! हे निम्ब ! अंब ! क्यों रहे मौन गहि।
हे बट ! उतँग सुरग वीर कहु तुम इत उत लहि।
हे अशोक ! हरि-सोक लोकमनि पियहि बतावहु।
अहो पनस ! सुभ सरस मरत-तिय अमिय पियावहु।
इतना कहकर फिर आप-ही-आप कहने लगे– ‘अरी सखियो ! ये पुरुष-जाति के वृक्ष तो उस सांवले के संगी-साथी हैं। पुरुष जाति तो निर्दयी होती है। ये परायी पीर को क्या जाने। चलो, लताओं से पूछें। स्त्री-जाति होने उनका चित्त दयामय और कोमल होता है, वे हमें अवश्य ही प्यारे का पता बतावेंगी।सखि! इन लताओं से पूछो। देखे, ये क्या कहती है?’ यह कहकर आप लताओं को सम्बोधन करके उसी प्रकार अश्रुविमोचन करते हुए गद्गद कण्ठ से करुणा के साथ पूछने लगे–
हे मालति ! हे जाति ! जूथके ! सुनि हित दे चित।
मन-हरन मन-हरन लाल गिरिधरन लखे इत।
हे केतकि ! इततें कितहूँ चितये पिय रूसे।
कै नँदनन्दन मन्द मुसुकि तुमरे मन मूसे।
फिर स्वत: ही कहने लगे– ‘अरी सखियों ! ये तो कुछ भी उत्तर नहीं देतीं। चलो, किसी और से ही पूछें।’ यह कहकर आगे बढने लगे। आगे फलों के भार से नवे हुए बहुत-से वृक्ष दिखायी दिये। उन्हें देखकर कहने लगे–‘सखि! ये वृक्ष तो अन्य वृक्षों की भाँति निर्दयी नहीं जान पडते। देखो, सम्पत्तिशाली होकर भी कितने नम्र हैं।इन्होंने इधर से जाने वाले प्यारे का अवश्य ही सत्कार किया होगा। क्योंकि जो सम्पत्ति पाकर भी नम्र होते हैं, उन्हें कैसा भी अतिथि क्यों न हो, प्राणों से भी अधिक प्रिय होता है। इनसे प्यारे का पता अवश्यक लग जायगा। हाँ, तो मैं ही पूछती हूँ’। यह कहकर वे वृक्षों से कहने लगे–
हे मुक्ताफल ! बेल धरे मुत्ताफल माला।
देखे नैन-बिसाल मोहना नँदके लाला।
हे मन्दार ! उदार बीर करबीर ! महामति।
देखे कहूँ बलवीर धीर मन-हरन धीरगति।
फिर चन्दन की ओर देखकर कहने लगे– ‘यह बिना ही मांगे सबको शीतलता और सुगन्ध प्रदान करता है, यह हमारे ऊपर अवश्य दया करेगा, इसलिये कहते है–
हे चन्दन ! दुखदन्दन ! सबकी जरन जुडावहु।
नँदनन्दन, जगबन्दन, चन्दन ! हमहि बतावहु।
क्रमशः
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