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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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फिर पुष्पों से फूली हुई लताओं की ओर देखकर मानो अपने साथ की सखियों से कह रहे हैं–
पूछो री इन लतनि फूलि रहिं फूलनि जोई।
सुन्दर पियके परस बिना अस फूल न होई।
प्यारी सखियो ! अवश्य ही प्यारे ने अपनी प्रिय सखी को प्रसन्न करने के निमित्त इन पर से फूल तोड़े हैं, तभी तो ये इतनी प्रसन्न हैं। प्यारे के स्पर्श बिना इतनी प्रसन्नता आ ही नही सकती। यह कह कर आप उनकी ओर हाथ उठा-उठाकर कहने लगे–
हे चम्पक ! हे कुसुम ! तुम्हैं छबि सबसों न्यारी।
नेंक बताय जु देहु जहाँ हरि कुंज बिहारी।।
इतने में कुछ मृग उधर से दौड़ते हुए आ निकले। उन्हें देख-देखकर जल्दी कहने लगे–
हे सखि ! हे मृगवधू ! इन्हें किन पूछहू अनुसरि।
डहडहे इनके नैन अबहिं कहुँ देखे हैं हरि।
इस प्रकार महाप्रभु गोपीभवन में अधीर से बने चारों ओर भटक रहे थे, उन्हें शरीर का होश नहीं था। आँखों से दो अश्रुधाराएँ बह रही थीं। उसी समय आप पृथ्वी पर बैठ गये और पैर अँगूठे के नख से पृथ्वी को कुरेदन लगे। उसी समय आप फिर उसी तरह कहने लगे–
हे अवनी ! नवनीत-चारे, चितचोर हमारे।
राखे कतहुँ दुराय बता देउ प्रान पियारे।
वहीं पास में एक तुलसी का वृक्ष खड़ा था, उसे देखकर बड़े ही आह्लाद के साथ आलिंगन करते हुए कहने लगे–
हे तुलसी ! कल्यानि ! सदा गोविंद-पद-प्यारी।
क्यों न कहौ तुम नन्द–सुवन सों बिथा हमारी।
इतना कहकर आप जोरों से समुद्र की ओर दौड़ने लगे और समुद्र के जल को यमुना समझकर कहने लगे–
हे जमुना ! सबजानि बूझि तुम हठहिं गहत हो।
जो जल जग उद्धार ताहि तुम प्रकट बहुत हो।।
थोड़ी देर में उन्हें मालूम हुआ कि करोड़ों कामदेवों के सौन्दर्य को फीका बनाने वाले श्रीकृष्ण कदम्ब के नीचे खड़े मुरली बजा रहे हैं। उन्हें देखते ही प्रभु उनकी ओर जल्दी से दौड़े। बीच में ही मूर्छा आने से बेहोश होकर गिर पड़े। उसी समय राय रामानन्द, स्वरूप गोस्वामी, शंकर, गदाधर पण्डित और जगदानन्द आदि वहाँ आ पहुँचे। प्रभु अब अर्धबाह्य दशा में थे।वे आँखे फाड़-फाड़कर चारों आरे कृष्ण की खोज कर रहे थे और स्वरूप गोस्वामी के गले को पड़कर रोते-रोते कह रहे थे– ‘अभी तो थे, अभी इसी क्षण तो मैंने उनके दर्शन किये थे। इतनी ही देर में वे मुझे ठगकर कहाँ चले गये। मैं अब प्राण धारण न करूँगी। प्यारे के विरह में मर जाऊँगी। हाय ! दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोडता। पाये हुए को भी मैं गँवा बैठी।’
राय रामानन्दजी भाँति-भाँति की कथाएँ कहने लगे। स्वरूप गोस्वामी प्रभु ने कोई पद गाने के लिये कहा। स्वरूप गोस्वामी अपनी उसी पुरानी सुरीली तान से गीतगोविन्द के इस पद को गाने लगे–
ललितलवंगलतापरिशीलनकोमलमलयसमीरे।
मधुकर निकरकरम्बितकोकिलकूजितकुंजकुटीरे।
विहरति हरिरिह सरसवसन्ते।
नृत्यति युवतिजनेन समं सखि विरहिजनस्य जुरन्ते।
उन्मदमदनमनोरथपथिकवधूजनजनितविलापे ।
अलिकुलसंकुलकुसुमसमुहनिराकुलवकुलकलापे।
इस पद को सुनते ही प्रभु के सभी अंग-प्रत्यंग फड़कने लगे। वे सिर हिलाते हुए कहने लगे– ‘अहा, विहरति हरिरिह सरसवसन्ते!’ ठीक है, स्वरूप ! आगे सुनाओ। मेरे कर्णों में इस अमृत को चुआ दो। तुम चुप क्यों हो गये? इस अनुपम रस से मेरे हृदय को भर दो, कानों में होकर बहने लगे, और कहो, और कहो। आगे सुनाओ, फिर क्या हुआ। स्वरूप पद को गाने लगे–
मृगमदसौरभरभसवशंवदनवदलमालतमाले।
युवजनहृदयविदारणमनसिजनखरुचिकिंशुकजाले।
मदनमहीपतिकनकदण्डरुचिकेसरकुसुमविकासे।
मिलितशिलीमुखपाटलपटलकृतस्मरतूणविलासे।
महाप्रभु ने कहा– ‘अहा! धन्य है, रुको मत, आगे बढो। हाँ– ‘स्मरतूणविलासे’ ठीक है, फिर ?’ स्वरूप गोस्वामी गाने लगे–
विगलितलज्जितजगदवलोकनतरुणवरुणकृतहासे।
विरहिनिकृन्तनकुन्तमुखाकृतिकेतकिदन्तुरिताशे।
माधविकापरिमिलललिते नवमालतिजातिसुगन्धौ।
मुनिमनसामपि मोहनकारिणि तरुणा कारणबन्धौ।
महाप्रभु कहने लगे– ‘धन्य, धन्य‘ ‘अकारणबन्धौ’ सचमुच वसन्त युवक युवतियों का अकृत्रिम सखा है। आगे कहो, आगे–स्वरूप उसी स्वर में मस्त होकर गाने लगे–
स्फुरदतिमुक्तलतापरिरम्भणमुकुलितपुलकितचूते।
वृन्दावनविपिने परिसरपरिगतयमुनाजलपूते।
श्रीजयदेवभणितमिदमुदयति हरिचरणस्मृतिसारम्।
सरसवसन्तसमयवनवर्णनमनुगतमदनविकारम्।
महाप्रभु इस पद को सुनते ही नृत्य करने लगे। उन्हें फिर आत्मविस्मृति हो गयी। वे बार-बार स्वरूप गोस्वामी का हाथ पकड़कर उनसे पुन:-पुन: पद-पाठ करने का आग्रह कर रहे थे। प्रभु की ऐसी उन्मत्तावस्था को देखकर सभी विस्मृति से बन गये। स्वरूप गोस्वामी प्रभु की ऐसी दशा देखकर पद गाना नहीं चाहते थे, प्रभु उनसे बार-बार आग्रह कर रहे थे।जैसे-तैसे रामानन्द जी ने उन्हें बिठाया, उनके ऊपर जल छिड़का और वे अपने वस्त्र से वायु करने लगे। प्रभु को कुछ कुछ चेत हुआ। तब राय महाशय सभी भक्तों के साथ प्रभु को समुद्रतट पर ले गये। वहाँ जाकर सबने प्रभु को स्नान कराया। स्नान कराके सभी भक्त प्रभु को उनके निवास स्थान पर ले गये। अब प्रभु को कुछ-कुछ बाह्य ज्ञान हुआ। तब सभी भक्त अपने-अपने घरों को चले गये।
उन्मादावस्था की अदभुत आकृति….
महाप्रभु की दिव्योन्मादावस्था बड़ी ही अद्भुत थी। उन्हें शरीर का जब होश नहीं था, तब शरीर को स्वस्थ रखने की परवाह तो रह ही कैसे सकती है? अपने को शरीर से एकदम पृथक समझकर सभी चेष्टाएं किया करते थे। उनकी हृदय को हिला देने वाली अपूर्व बातों को सुनकर ही हम शरीराध्यासियों के तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।क्या एक शरीरधारी प्राणी इस प्रकार की सुधि भुलाकर ऐसा भयंकर व्यापार कर सकता है, जिसके श्रवण से ही भय मालूम पड़ता हो, किन्तु चैतन्यदेव ने तो ये सभी चेष्टाएँ की थीं और श्री रघुनाथ दास गोस्वामी ने प्रत्यक्ष अपनी आँखों से उन्हें देखा था। इतने पर भी कोई अविश्वास करे तो करता रहे। महाप्रभु की गम्भीरा की दशा वर्णन करते हुए कविराज गोस्वामी कहते हैं–
गम्भीरा-भितरे रात्रे नाहि निद्रा-लव,
भित्ते मुख-शिर घषे क्षत हय सब।
तीन द्वारे कपाट प्रभु यायेन बाहिरे,
कभू सिंहद्वारे पड़े, कभू सिन्धु नीरे।
अर्थात
‘गम्भीरा मन्दिर के भीतर महाप्रभु एक क्षण के लिये भी नहीं सोते थे। कभी मुख और सिर को दीवारों से रगड़ने लगते। इस कारण रक्त की धारा बहने लगती और सम्पूर्ण मुख क्षत-विक्षत हो जाता। कभी द्वारों के बंद रहने पर भी बाहर आ जाते, कभी सिंहद्वार पर जाकर पड़े रहते तो कभी समुद्र के जल में कूद पडते।’
कैसा दिल को दहला देने वाला हृदयविदारक वर्णन है।कभी-कभी बड़े ही करुण स्वर में जोरों से रुदन करने लगते, उस करुणाक्रन्दन को सुनकर पत्थर भी पसीजने लगते और वृक्ष भी रोते हुए से दिखायी पड़ते। वे बड़े ही करुणापूर्ण शब्दों में रोते रोते कहते–
कहाँ मोर प्राणनाथ मुरलीवदन
काहाँ करों काहाँ पाओं व्रजेन्द्रनन्दन।
काहारे कहिब केवा जाने मोर दु-ख,
ब्रजेन्द्रनन्दन बिना फाटे मोर बुक।
क्रमशः
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