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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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‘हाय ! मेरे प्राणनाथ कहाँ हैं ? जिनके मुख पर मनोहर मुरली विराजमान है ऐसे मेरे मनमोहन मुरलीधर कहाँ हैं ? अरी, मैं क्‍या करूँ? कहाँ जाऊँ ? मैं अपने प्‍यारे व्रजेन्‍द्रनन्‍दन को कहाँ पा सकूँगा ? मैं अपनी विरह-वेदन को किससे कहूँ? कहूँ भी तो मेरे दु:ख को जानेगा ही कौन? परायी पीर को समझने की सामर्थ्‍य ही किसमें है? उन प्‍यारे व्रजेन्‍द्रनन्‍दन प्राणधन के बिना मेरा हृदय फटा जा रहा है।’

इस प्रकार वे सदा तड़पते से रहते। मछली जैसे कीचड़ में छटपटाती है, सिर कटने पर बकरे का सिर जिस प्रकार थोड़ी देर तक इधर-उधर छटपटाता सा रहता है उसी प्रकार वे दिन-रात छटपटाते रहते। रात्रि में उनकी विरह-वेदना और भी अधिक बढ़ जाती। उसी वेदना में वे स्‍थान को छोड़कर इधर-उधर भाग जाते और जहाँ भी बेहोश होकर गिर पड़ते वहीं पड़े रहते। एक दिन की एक अद्भुत घटना सुनिये–

नियमानुसार स्‍वरूप गोस्‍वामी और राय रामानन्‍द जी प्रभु को कृष्‍ण कथा और विरह के पद सुनाते रहे। सुनाते-सुनाते अर्धरात्रि हो गयी। राय महाशय अपने घर चले गये, स्‍वरूप गोस्‍वामी अपनी कुटिया में पड़े रहे।गोविन्‍द का महाप्रभु के प्रति वात्‍सल्‍यभाव था। उसे प्रभु की ऐसी दयनीय दशा असह्य थी। जिस प्रकार वृद्धा माता अपने एकमात्र पुत्र को पागल देखकर सदा उसके शोक में उद्विग्‍न सी रहती है, उसी प्रकार गोविन्‍द सदा उद्विग्‍न बना रहता। प्रभु कृष्‍ण  विरह में दु:खी रहते और गोविन्‍द प्रभु की विरहावस्‍था के कारण सदा खिन्‍न-सा बना रहता।वह प्रभु को छोड़कर पलभर भी इधर-उधर नहीं जाता। प्रभु को भीतर सुलाकर आप गम्‍भीरा के दरवाजे पर सोता। महाप्रभु रात्रिभर जोरों से करुणा के साथ पुकारते रहते–

श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे ! 
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

ये शब्‍द गोविन्‍द के कानों में भर गये थे, इसलिये जब भी ये बंद हो जाते तभी उसकी नींद खुल जाती और वह प्रभु की खोज करने लगता। स्‍वरूप गोस्‍वामी और राय महाशय के चले जाने पर प्रभु जोरों से रोते-रोते श्रीकृष्‍ण के नामों का कीर्तन करते रहे। गोविन्‍द द्वार पर ही सो रहा था। रात्रि में सहसा उसकी आँखे अपने आप ही खुल गयीं। गोविन्‍द शंकित तो सदा बना ही रहता था, वह जल्‍दी से उठकर बैठ गया।उसे प्रभु की आवाज नहीं सुनायी दी। घबड़ाया सा काँपता हुआ वह गम्‍भीरा के भीतर गया। जल्‍दी से चकमक जलाकर उसने दीपक को जलाया। वहाँ उसने जो कुछ देखा, उसे देखकर वह सन्‍न रह गया। महाप्रभु का बिस्‍तरा ज्‍यों का त्‍यों ही पड़ा है, महाप्रभु वहाँ नहीं हैं। गोविन्‍द को मानो लाखों बिच्‍छुओं ने एक साथ काट लिया हो। 
उसने जोरों से स्‍वरूप गोस्‍वामी को आवाज दी। गुसाईं-गुसाईं ! प्रलय हो गया, हाय, मेरा भाग्‍य फूट गया। गुसाईं ! जल्‍दी दौड़ो । महाप्रभु का कुछ पता नहीं।’
गोविन्‍द के करुणाक्रन्‍दन को सुनकर स्‍वरूप गोस्‍वामी जल्‍दी से उतरकर नीचे आये। दोनों के हाथ कांप रहे थे। काँपते हुए हाथों से उन्‍होंने उस विशाल भवन के कोने-कोने में प्रभु को ढूँढा।प्रभु का कुछ पता नहीं। उस किले के समान भवन के तीन परकोटा थे, उनके तीनों दरवाजे ज्‍यों के त्‍यों ही बन्‍द थे। अब भक्‍तों को आश्‍चर्य इस बात का हुआ कि प्रभु गये किधर से। आकाश में उड़कर तो कहीं चले नहीं गये। सम्‍भव है यहीं कहीं पड़े हों। घबडाया हुआ आदमी पागल ही हो जाता है।बावला गोविन्‍द सुई की तरह जमीन में हाथ से टटोल-टटोलकर प्रभु को ढूँढने लगा। स्‍वरूप गोस्‍वामी ने कुछ प्रेम की भर्त्‍सना के साथ कहा– ‘गोविन्‍द ! क्‍या तू भी पागल हो गया ? अरे ! महाप्रभु कोई सुई तो हो ही नहीं गये जो इस तरह हाथ से टटोल रहा है, जल्‍दी से मशाल जला। समुद्रतट पर चलें, सम्‍भव है वहीं पड़े होंगे।इस विचार को छोड़ दे कि किवाड़ें बंद होने पर वे बाहर कैसे गये। कैसे भी गये हों, बाहर ही होंगे’। 
कांपते-कांपते गोविन्‍द ने जल्‍दी से मशाल में तेल डाला, उसे दीपक से जलाकर वह स्‍वरूप गोस्‍वामी के साथ जाने को तैयार हुआ।जगदानन्‍द, वक्रेश्‍वर पण्डित, रघुनाथदास आदि सभी भक्‍त मिलकर प्रभु को खोजने चले। सबसे पहले मन्दिर में ही भक्त  खोजते थे। इसलिये सिंहद्वार की ही ओर सब चले। वहाँ उन्‍होंने बहुत सी मोटी-मोटी तैलंगी गौओं को खड़े देखा। पगला गोविन्‍द जोरों से से चिल्‍ला उठा– ‘यहीं होंगे।’ किसी ने उसकी बात पर ध्‍यान नहीं दिया। भला गौओं के बीच में प्रभु कहां, सब आगे बढ़ने लगे किन्‍तु विक्षिप्‍त गोविन्‍द गौओं के भीतर घुसकर देखने लगा।वहाँ उसने जो कुछ देखा उसे देखकर वह डर गया। जोरों से चिल्‍ला उठा– ‘गुसाईं ! यहाँ आओ देखो, यह क्‍या पड़ा है, गौएं उसे बडे‌‌ ही स्‍नेह से चाट रही हैं। गोविन्‍द मशाल को उसके समीप ले गया और जोरों से चिल्‍ला उठा–‘महाप्रभु हैं।’ भक्‍तों ने भी ध्‍यान से देखा सचमुच महाप्रभु ही हैं। उस समय उनकी आकृति कैसी बन गयी थी उसे कविराज गोस्‍वामी के शब्‍दों में सुनिये–

पेटेर भितर हस्‍त–पाद कूर्मेर आकार। 
मुखे फेन, पुलकांग नेत्रे अश्रुधार।।
अचेतन पड़िया छेन येन कूष्‍माण्‍डफल। 
बाहिरे जड़िमा अन्‍तरे आनन्‍दविह्वल।।
गाभि सब चौदिके शुके प्रभुर श्रीअंग। 
दूर कैले नाहि छाड़े प्रभुर अंग संग।।
अर्थात 
'महाप्रभु के हाथ-पैर पेट के भीतर धँसे हुए थे। उनकी आकृति कछुए की सी बन गयी थी। मुख से निरन्‍तर फेन निकल रहा था, सम्‍पूर्ण अंग के रोम खड़े हुए थे। दोनों नेत्रों से अश्रुधारा बह रही थी। वे कूष्‍माण्‍ड-फल की भाँति अचेतन पड़े हुए थे।
बाहर से तो जड़ता प्रतीत होती थी,किन्‍तु भीतर ही भीतर वे आनन्‍द में विह्वल हो रहे थे। गौएं चारों ओर खडी होकर प्रभु के श्रीअंग को सूँघ रही थीं। उन्‍हें बार-बार हटाते थे, किन्‍तु वे प्रभु के अंग के संग को छोडना ही नहीं चाहती थीं। फिर वहीं आ जाती थीं।’
अस्‍तु, भक्‍तों ने मिलकर संकीर्तन किया। कानों में जोरों से हरिनाम सुनाया, जल छिड़का, वायु की तथा और भी भाँति-भाँति के उपाय किये, किन्‍तु प्रभु को चेतना नहीं हुई। तब विवश होकर भक्‍तवृन्‍द उन्‍हें उसी दशा में उठाकर निवास स्‍थान की ओर ले चले। वहाँ पहुँचने पर प्रभु को कुछ-कुछ होश होने लगा। उनके हाथ पैर धीरे-धीरे पेट में से निकलकर सीधे होने लगे। शरीर में कुछ-कुछ रक्‍त का संचार सा होता हुआ प्रतीत होने लगा।क्रमशः

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