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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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इसलिये उस दिन से शंकर जी सदा प्रभु के पादपद्मों को अपने वक्ष:स्थल पर धारण करके सोया करते थे। प्रभु इधर से उधर करवट भी लेते, तभी उनकी आँखें खुल जातीं और वे सचेष्ट हो जाते। रात्रि-रात्रिभर जाकर प्रभु के चरणों को दबाते रहते थे। इस भये से प्रभु अब बाहर नहीं भाग सकते थे। उसी दिन से शंकर जी का नाम पड़ गया ‘प्रभुपादोपाधान’। सचमुच वे प्रभु के पैरों के तकिया ही थे। उन तकिया लगाने वाले महाराज के और तकिया बने हुए सेवक के चरणों में हमारा बार-बार प्रणाम हैं।
शारदीय निशीथ में दिव्य गन्ध का अनुसरण….
विरहव्यथा से व्यथित व्यक्तियों के लिये प्रकृति के यावत् सौन्दर्यपूर्ण समान हैं वे ही अत्यन्त दु:खदायी प्रतीत होते हैं। सम्पूर्ण ऋतुओं में श्रेष्ठ वसन्त ऋतु, शुक्ल पक्ष का प्रवृद्ध चन्द्र, शीतल, मन्द, सुगन्धित मलय मारुत, मेघ की घनघोर गर्जना, अशोक, तमाल, कमल, मृणाल आदि शोकनाशक और शीतलता प्रदान करने वाले वृक्ष तथा उनके नवपल्लव, मधुकर, हंस, चकोर, कृष्णसागर, सारंग, मयूर, कोकिल, शुक, सारिका आदि सुहावने सुन्दर और सुमधुर वचन बोलने वाले पक्षी ये सभी विरह की अग्नि को और अधिक बढ़ाते हैं सभी उसे रुलाते हैं।सभी को विरहिणी के खिझाने में ही आनन्द आता है। पपीहा पी-पी कहकर उसके कलेजे में कसक पैदा करता है, वसन्त उसे उन्मादी बनाता है। फूले हुए वृक्ष उसकी हँसी करते हैं और मलयाचल का मन्दवाही मारुत उसकी मीठी-मीठी चुटकियां लेता है।मानों ये सब प्रपंच विधाता ने विरहिणी को ही खिझाने के लिये रचे हों। बेचारी सबकी सहती है, दिन-रात रोती है और इन्हीं सबसे अपने प्रियतम का पता पूछती है, कैसी बेवशी है। क्यों है न? सहृदय पाठक अनुभव तो करते ही होंगे।
वैशाखी पूर्णिमा थी, निशानाथ अपनी सहचरी निशादेवी के साथ खिलखिला कर हँस रहे थे। उनका सुमधुर श्वेत हास्य का प्रकाश दिशा-विदिशाओं में व्याप्त था। प्रकृति इन पति पत्नियों के सम्मेलन को दूर से देखकर मन्द-मन्द मुसकरा रही थी। पवन धीरे धीरे पैरों की आहट बचाकर चल रहा था। शोभा सजीव होकर प्रकृति का आलिंगन कर रही थी। समुद्रतट के जगन्नाथवल्लभ नाम के उद्यान में प्रभु विरहिणी की अवस्था में विचरण कर रहे थे। स्वरूप दामोदर, राम रामानन्द प्रभृति अन्तरंग भक्त उनके साथ थे। महाप्रभु के दोनों नेत्रों से निरन्तर अश्रु प्रवाहित हो रहे थे। मुख कुछ कुछ म्लान था। चन्द्रमा की चमकीली किरणें उनके श्रीमुख को धीरे-धीरे चुम्बन कर रही थीं। अनजाने के उस चुम्बनसुख से उनके अरुरण रंग के अधर श्वेतवर्ण के प्रकाश के साथ और भी द्युतिमान होकर शोभा की भी शोभा को बढ़ा रहे थे।महाप्रभु का वही उन्माद, वही बेकली, वही छटपटाहट, उसी प्रकार रोना, उसी तरह की प्रार्थना करना था, इसी प्रकार घूम-घूमकर वे अपने प्रियतम की खोज कर रहे थे। प्यारे को खोजते-खोजते वे अत्यन्त ही करुणस्वर से इस श्लोक को पढ़ते जाते थे–
तच्छैशवं त्रिभुवनाद्भुतमित्यवेहि
मच्चापलंच तव वा मम वाधिगम्यम्।
तत् किं करोमि विरलं मुरलीविलासि
मुग्धं मुखाम्बुजमुदीक्षितमीक्षणाभ्याम्।
हे प्यारे, मुरलीविहारी ! तुम्हारा शैशवावस्था का मनोहर, माधुर्य-त्रिभुवनविख्यात है। संसार में उसकी मधुरिमा सर्वत्र व्याप्त है, उससे प्यारी वस्तु कोई विश्व में है ही नहीं और मेरी चपलता, चंचलता, उच्छ्रंखलता तुम पर विदित ही है। तुम ही मेरी चपलता से पूर्णरीत्या परिचित हो। बस मेरे और तुम्हारे सिवा तीसरा कोई उसे नहीं जानता।प्यारे ! बस, एक ही अभिलाषा है, इसी अभिलाषा से अभी तक इन प्राणों को धारण किये हुए हूँ। वह यह कि जिस मनोहर मुखकमल को देखकर व्रजवधू भूली-सी, भटकी-सी, सर्वस्व गंवाई-सी बन जाती हैं, उसी कमलमुख को अपनी दोनों आँखें फाड-फाड़कर एकान्त में देखना चाहती हूँ। हृदयरमण ! क्या कभी देख सकूँगी? प्राणवल्लभ ! क्या कभी ऐसा सुयोग प्राप्त हो सकेगा?
बस, इसी प्रकार प्रेम-प्रलाप करते हुए प्रभु जगन्नाथवल्लभ नामक उद्यान में परिभ्रमण कर रहे थे। वे प्रत्येक वृक्ष को आलिंगन करते, उससे अपने प्यारे का पता पूछते और फिर आगे बढ़ जाते। प्रेम से लताओं की भाँति वृक्षों से लिपट जाते, कभी मूर्च्छित होकर गिर पड़ते, कभी फिर उठकर उसी ओर दौड़ने लगते।उसी समय वे क्या देखते हैं कि अशोक के वृक्ष के नीचे खड़े होकर वे ही मुरलीमनोहर अपनी मदमाती मुरली की मन्द मन्द मुस्कान के साथ बजा रहे हैं।वे मुरली में ही कोई सुन्दर-सा मनोहारी गीत गा रहे हैं, न उनके साथ कोई सखा है, न पास में कोई गोपिका ही। अकेले ही वे अपने स्वाभाविक टेढ़ेपन से ललित त्रिभंगी गति से खड़े हैं। बांस की वह पूर्वजन्म की परम तपस्विनी मुरली अरुण रंग के अधरों का धीरे-धीरे अमृत पान कर रही है।
महाप्रभु उसे मनोहर मूर्ति को देखकर उसी की ओर दौड़े । प्यारे को आलिंगन दान देने के लिये वे शीघ्रता से बढ़े। हा सर्वनाश ! प्रलय हो गया ! प्यारा तो गायब ! अब उसका कुछ भी पता नहीं ! महाप्रभु वहीं मूर्च्छित होकर गिर पड़े।थोड़ी देर में इधर उधर सूँ सूँ करके कुछ सूँघने लगे ! उन्हें श्रीकृष्ण के शरीर की दिव्य गन्ध तो आ रही थी। गन्ध तो आ ही रही थी, किन्तु श्रीकृष्ण दिखायी नहीं देते थे। इसीलिये उसी गन्ध के सहारे-सहारे वे श्रीकृष्ण की खोज करने के लिये फिर चल पड़े।
अहा ! प्यारे के शरीर की दिव्य गन्ध कैसी मनोहारिणी होगी, इसे तो कोई रतिसुख की प्रवीणा नायिका ही समझ सकती है, हम अरसिकों का उसमें प्रवेश कहाँ? हाय रे ! प्यारे के शरीर की दिव्य गन्ध घोर मादकता पैदा करने वाली है, जैसे मद्यपीकी आँख से ओझल बहुत ही उत्तम गन्धयुक्त सुरा रखी हो, किन्तु वह उसे दीखती न हो। जिस प्रकार वह उस आसव के लिये विकल होकर तड़पता है, उसी प्रकार प्रभु उस गन्ध को सूँघकर तड़प रहे थे। उस गन्ध की उन्मादकता का वर्णन कविराज गोस्वामी के शब्दों में सुनिये
सेहे गन्ध वश नासा, सदा करने गन्धेर आशा।
कभू पाय कभू ना पाय।।
पाइले पिया पेट भरे, पिड. पिड. तवू करे।
ना पाइल तृष्णाय मरिजाय।।
मदन मोहन नाट, पसारि चांदेर हाट।
जगन्नारी-ग्राहक लोभाय।।
विना-मूल्य देय गन्ध, गन्ध दिया करे अन्ध।
धर याइते पथ नाहि पाय।।
एइ मत गौरहरि, गन्धे कैल मन चुरि।
भृंग प्राय इति उति धाय।।
जाय वृक्ष लता पाशे, कृष्ण-स्फुरे सेइ आशे।
गन्ध न पाय, गन्ध मात्र पाय।
क्रमशः
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