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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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श्रीकृष्ण के अंग की उस दिव्य गन्ध के वश में नासिका हो गयी है, वह सदा उसी गन्ध की आशा करती रहती है। कभी तो उस गन्ध को पा जाती है और कभी नहीं भी पाती है। जब पा लेती है तब पेट भरकर खूब पीती है और फिर भी ‘पीऊँ और पीऊँ’ इसी प्रकार कहती रहती है। नहीं पाती तो प्यास से मर जाती है।इस नटवर मदनमोहन ने रूप की हाट लगा रखी है। ग्राहकरूपी जो जगत की स्त्रियां हैं उन्हें लुभाता है। यह ऐसा विचित्र व्यापारी है कि बिना ही मूल्य वैसे ही उस दिव्य गन्ध को दे देता है और गन्ध को देकर अन्धा बना देता है। जिससे वे बेचारी स्त्रियों अपने घर का रास्ता भूल जाती हैं।
इस प्रकार गन्ध के द्वारा जिनका मन चुराया गया है, ऐसे गौरहरि भ्रमर की भाँति इधर-उधर दौड़ रहे थे। वे वृक्ष और लताओं के समीप जाते हैं कि कहीं श्रीकृष्ण मिल जायँ किन्तु वहाँ श्रीकृष्ण नहीं मिलते, केवल उनके शरीर की दिव्य गन्ध ही मिलती हैं।इस प्रकार श्रीकृष्ण की गंध के पीछे घूमते-घूमते सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत हो गयी। निशा अपने प्राणनाथ के वियोगदु:ख के स्मरण से कुछ म्लान-सी हो गयी। उसके मुख का तेज फीका पडने लगा। भगवान भुवनभास्कर के आगमन के भय से निशानाथ भी धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर जाने लगे। स्वरूप गोस्वामी और राय रामानन्द प्रभु को उनके निवास स्थान पर ले गये।
श्री अद्वैताचार्य जी की पहेली…
मातृभक्त श्रीगौरांग उन्मादावस्था में भी अपनी स्नेहमयी जननी को एकदम नहीं भूले थे। जब वे अन्तर्दशा से कभी कभी बाह्य दशा में आ जाते तो अपने प्रिय भक्तों की और प्रेममयी माता की कुशल क्षेम पूछते और उनके समाचार जानने के निमित्त जगदानन्द जी को प्रतिवर्ष गौड़ भेजते थे।जगदानन्द जी गौड़ में जाकर सभी भक्तों से मिलते, उनसे प्रभु की सभी बातें कहते, उनकी दशा बताते और सभी का कुशल-क्षेम लेकर लौट आते। शचीमाता के लिये प्रभु प्रतिवर्ष जगन्नाथ जी का प्रसाद भेजते और भाँति-भाँति के आश्वासनों द्वारा माता को प्रेम-सन्देश पठाते। प्रभु के सन्देश को कविराज गोस्वामी के शब्दों में सुनिये–
तोमार सेवा छांड़ि आमि करिनूँ संन्यास।
‘बाउल हय्या आमि कैलूँ धर्म नाश।।
एइ अपराध तुमि ना लइह आमार।
तोमार अधीन आमि-पुत्र से तोमार।।
नीलाचले आछि आमि तोमार आज्ञाते।
यावत् जीव तावत् आमि नारिब छाड़िते।
अर्थात
हे माता ! मैंने तुम्हारी सेवा छोड़कर पागल होकर संन्यास धारण कर लिया है, यह मैंने धर्म के विरुद्ध आचरण किया है, मेरे इस अपराध को तुम चित्त में मत लाना। मैं अब भी तुम्हारे अधीन ही हूँ। निमाई अब भी तुम्हारा पुराना ही पुत्र है। नीलाचल में मैं तुम्हारी ही आज्ञा से रह रहा हूँ और जब तक जीऊँगा तब तक नीलाचल को नहीं छोड़ूँगा। इस प्रकार प्रतिवर्ष प्रेम-सन्देश और प्रसाद भेजते।
एक बार जगदानन्द पण्डित प्रभु की आज्ञा से नवद्वीप गये। वहाँ जाकर उन्होंने शचीमाता को प्रसाद दिया, प्रभु का कुशल-समाचार बताया और उनका प्रेम-सन्देश भी कह सुनाया। निमाई को ही सर्वस्व समझने वाली माँ अपने प्यारे पुत्र की ऐसी दयनीय दशा सुनकर फूट-फूटकर रोने लगी।उसके अतिक्षीण शरीर में अब अधिक दिनों तक जीवित रहने की सामर्थ्य नहीं रही थी। जो कुछ थोड़ी-बहुत सामर्थ्य थी भी सो निमाई की ऐसी भयंकर दशा सुनकर उसके शोक के कारण विलीन हो गयी। माता अब अपने जीवन से निराश हो बैठी, निमाई का चन्द्रवदन अब जीवन में फिर देखने को न मिल सकेगा, इस बात से माता की निराशा और बढ़ गयी।वह अब इस विषमय जीवनभार को बहुत दिनों तक ढोते रहने में असमर्थ-सी हो गयी।*
माता ने पुत्र को रोते-रोते आशीर्वाद पठाया और जगदानन्द जी को प्रेमपूर्वक विदा किया। जगदानन्द जी वहाँ से अन्यान्य भक्तों के यहाँ होते हेुए श्री अद्वैताचार्यजी के घर गये। आचार्य ने उनका अत्यधिक स्वागत-सत्कार किया और प्रभु के सभी समाचार पूछे। आचार्य का शरीर भी अब बहुत वृद्ध हो गया था। उनकी अवस्था 90 से ऊपर पहुँच गयी थी। खाल लटक गयी थी, अब वे घर से बाहर बहुत ही कम निकलते थे।जगदानन्द को देखकर मानों फिर उनके शरीर में नवयौवन का संचार हो गया और वे एक-एक करके सभी विरक्त भक्तों का समाचार पूछने लगे। जगदानन्द जी दो-चार दिन आचार्य के यहाँ रहे। जब उन्होंने प्रभु के पास जने के लिये अत्यधिक आग्रह किया तब आचार्य ने उन्हें जाने की आज्ञा दे दी और प्रभु के लिये एक पहेली युक्त पत्र भी लिखकर दिया। जगदानन्दजी उस पत्र को लेकर प्रभु के पास पहुँचे।महाप्रभु जब बाह्य दशा में आये, तब उन्होंने सभी भक्तों के कुशल-समाचार पूछे। जगदानन्द जी सबका कुशल-क्षेम बताकर अन्त में अद्वैताचार्य की वह पहेलीवाली पत्री दी। प्रभु की आज्ञा से वे सुनाने लगे। प्रभु को कोटि-कोटि प्रणाम कर लेने के अनन्तर उसमें यह पहेली थी–
बाउलके कहिह-लोक हइल बाउल।
बाउलके कहिह-बाटेना बिकाय चाउल।।
बाउलके कहिह-काजे नाहिक आउल।
बाउलके कहिह-इहा कहिया छे बाउल
श्रीचैतन्य प्राणियों के जीवन के आधार चावलरूपी हरिनाम के व्यापारी हैं। अद्वैताचार्य उनके प्रधान आढ़तिया हैं। जैसे ही पागल व्यापारी है वैसा ही पागल आढ़तिया भी है और पागलों का सा ही प्रलापपूर्ण पत्र भी पठाया है। पागलों के सिवा इसके इसके मर्म को कोई समझ ही क्या सकता है। पागल आढ़तिया कहता है– उस बावले व्यापारी से कहना।सब लोगों के कोठी-कुठिला हरिनामरूपी चावलों से भर गये। अब इस बाजार में इस सस्ते माल की बिक्री नहीं रही। अब यह व्यापार साधारण हो गया। तुम-जैसे उत्तम श्रेणी के व्यापारी के योग्य अब यह व्यापार नहीं है। इसलिये अब इस हाट को बन्द कर दो। बावले व्यापारी को बावले आढतिया ने यह सन्देश भिजवाया है।’
सभी समीप में बैठे हुए भक्त इस विचित्र पहेली को सुनकर हँसने लगे। महाप्रभु मन ही मन इसका मर्म समझकर कुछ मन्द-मन्द मुसकाये और जैसी उनकी आज्ञा, इतना कहकर चुप हो गये। प्रभु के बाहरी प्राण श्रीस्वरूप गोस्वामी को प्रभु की मुसकराहट में कुछ विचित्रता प्रतीत हुई। इसलिये दीनता के साथ पूछने लगे– ‘प्रभो ! मैं इस विचित्र पहेली का अर्थ समझना चाहता हूँ। आचार्य अद्वैत राय ने यह कैसी अनोखी पहेली भेजी है। आप इस प्रकार इसे सुनकर क्यों मुसकराये?’
क्रमशः
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