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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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प्रभु ने धीरे-धीरे गम्‍भीरता के स्‍वर में कहा– अद्वैताचार्य कोई साधारण आचार्य तो हैं ही नहीं। वे नाम के ही आचार्य नहीं हैं, किन्‍तु आचार्यपने के सभी कार्य भली-भाँति जानते हैं। उन्‍हें शास्‍त्रीय विधि के अनुसार पूजा-पाठ करने की सभी विधि मालूम है। पूजा में पहले तो बडे सत्‍कार के साथ देवताओं को बुलाया जाता है, फिर उनकी षोडशोपचार रीति से विधिवत् पूजा की जाती है, यथास्‍थान पधराया जाता है, तब देवताओं से हाथ जोड़कर कहते है– ‘गच्‍छ-गच्‍छ परं स्‍थानम्’ अर्थात ‘अब अपने परम स्‍थान को पधारिये।’

सम्‍भवतया यही उनका अभिप्राय हो, वे ज्ञानी पण्डित हैं, उनके अर्थ को ठीक-ठीक समझ ही कौन सकता है। इस बात को सुनकर स्‍वरूप गोस्‍वामी कुछ अन्‍यमनस्‍क से हो गये। सभी को पता चल गया कि महाप्रभु अब शीघ्र ही लीला-संवरण करेंगे। इस बात के स्‍मरण से सभी का हृदय फटने-सा लगा। उसी दिन से प्रभु की उन्‍मादावस्‍था और भी अधिक बढ़ गयी।वे रात-दिन उसी अन्‍तर्दशा में निमग्‍न रहने लगे। प्रतिक्षण उनकी दशा लोक-बाह्य-सी बनी रहती थी। कविराज गोस्‍वामी के शब्‍दों में सुनिये–

स्‍तम्‍भ, कम्‍प, प्रस्‍वेद, वैवर्ण अश्रुस्‍वर-भेद। 
देह हैल पुलके व्‍यापित।।
हासे-कान्‍दे, नाचे, गाय, उठि इति-उति धाय। 
क्षणे, भूमैं पड़िया मूर्च्छिते।

‘शरीर सुन्‍न पड़ जाता है, कँपकँपी छूटने लगती है। शरीर से पसीना बहने लगता है, मुख म्‍लान हो जाता है, आँखों से अश्रुधारा बहने लगती है। गला भर आता है, शब्‍द ठीक-ठीक उच्‍चारण नहीं होते हैं।देह रोमांचित हो जाती है। हँसते हैं, जोरों से रुदन करते हैं, नाचते हैं, गाते हैं, उठ-उठकर इधर-उधर भागने लगते हैं, क्षणभर में मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ते हैं।’ प्‍यारे ! पगले दयालु चैतन्‍य ! क्‍या इस पागलपन में हमारा कुछ भी साझा नहीं है? हे दीनवत्‍सल ! इस पागलपन में से यत्किंचित भी हमें मिल जाय तो यह सार-हीन जीवन सार्थक बन जाय। मेरे गौर ! उस मादक मदिरा का एक प्‍याला मुझको भी क्‍यों नहीं पिला देता? हे मेरे पागलशिरोमणि ! तेरे चरणों में मैं कोटि-कोटि नमस्‍कार करता हूँ।

समुद्रपतन और मृत्‍युदशा….

महाप्रभु को रासपंचाध्‍यायी अत्‍यन्‍त प्रिय थी। वे सदा रासपंचाध्‍यायी के ही श्‍लोकों को सुना करते थे और भावावेश में उन्‍हीं भावों का अनुकरण भी किया करते थे।एक दिन राय रामानन्‍द जी ने श्रीमद्भागवत के तैंतीसवें अध्‍याय में से भगवान् की कालिन्‍दी कूल की जल-क्रीडा की कथा सुनायी। प्रभु के दिनभर वही लीला स्‍फुरण होती रही। दिन बीता, रात्रि आयी, प्रभु की विरह‍वेदना भी बढने लगी। वे आज अपने को संभालने में एकदम असमर्थ हो गये।पता नहीं किस प्रकार वे भक्‍तों की दृष्टि बचाकर समुद्र के किनारे-किनारे आईटोटा की ओर चले गये। वहाँ विशाल सागर की नीली-नीली तरंग उठकर संसार को हृदय की विशालता, संसार की अनित्‍यता और प्रेम की तन्‍मयता की शिक्षा दे रही थीं। प्रेमावतार, गौरांग के हृदय से एक सुमधुर संगीत स्‍वत: ही उठ रहा था।महाप्रभु उस संगीत के स्‍वर को श्रवण करते-करते पागल हुए बिना सोचे-विचारे ही समुद्र की ओर बढ़ रहे थे। अहा ! समुद्र के किनारे सुन्‍दर-सुन्‍दर वृक्ष अपनी शरत्‍कालीन शोभा से सागर की सुषमा को और भी अधिक शक्तिशालनी बना रहे थे। शरत् की सुहावनी शर्वरी थी, अपने प्रिय पुत्र चन्द्रमा की श्रीवृद्धि और पूर्ण ऐश्‍वर्य से प्रसन्‍न होकर पिता सागर आनन्‍द से उमड़ रहे थे। महाप्रभु उसमें कृष्‍णांग-स्‍पर्श से पुलकित और आनन्दित हुई कालिन्‍दी का दर्शन कर रहे थे।उन्‍हें समुद्र की एकदम विस्‍मृति हो गयी, वे कालिन्‍दी में गोपिकाओं के साथ क्रीडा करते हुए श्रीकृष्‍ण के प्रत्‍यक्ष दर्शन करने लगे। बस, फिर क्‍या था, आप उस क्रीडासुख से क्‍यों वंचित रहते, जोरों से हुंकार करते हुए अथाह सागर के जल में कूद पड़े और अपने प्‍यारे के साथ जलविहार का आनन्‍द लेने लगे। इसी प्रकार जल में डूबते और उछलते हुए उनकी सम्‍पूर्ण रात्रि बीत गयी।

इधर प्रभु को स्‍थान पर न देखकर भक्‍तों को सन्‍देह हुआ कि प्रभु कहाँ चले गये। स्‍वरूप गोस्‍वामी, गोविन्‍द, जगदानन्‍द, वक्रेश्‍वर, रघुनाथदास, शंकर आदि सभी भक्‍तों को साथ व्‍याकुलता के साथ प्रभु की खोज में चले।श्रीजगन्‍नाथ जी  के मन्दिर में सिंहद्वार से लेकर उन्‍होंने तिल-तिलभर जगह को खोज डाला। सभी के साथ वे जगन्‍नाथवल्‍लभ नामक उद्यान में गये वहाँ भी प्रभु का कोई पता नहीं। वहाँ से निराश होकर वे गुण्टिचा मन्दिर में गये। सुन्‍दरचल में उन्‍होंने इन्‍द्रद्युम्‍नसरोवर, समीप के सभी बगीचे तथा मन्दिर खोज डाले।सभी को परम आश्‍चर्य हुआ कि प्रभु गये भी तो कहाँ गये। इस प्रकार उन्‍हें जब कहीं भी प्रभु का पता नहीं चला तब वे निराश होकर फिर पुरी में लौट आये। इस प्रकार प्रभु की खोज करते-करते उन्‍हें सम्‍पूर्ण रात्रि बीत गयी। 
प्रात:काल के समय स्‍वरूप गोस्‍वामी ने कहा– ‘अब चलो, समुद्र के किनारे प्रभु की खोज करे, वहाँ प्रभु का अवश्‍य ही पता लग जायगा।’ यह क‍हकर वे भक्‍तों  को साथ लेकर समुद्र के किनारे-किनारे चल पड़े।
इधर महाप्रभु रात्रिभर जल में उछलते और डूबते रहे। उसी समय एक मल्‍लाह वहाँ जाल डालकर मछली मार रहा था, महाप्रभु का मृत्‍यु अवस्‍था को प्राप्‍त वह विकृत शरीर उस मल्‍लाह के जाल में फँस गया। उसने बड़ा भारी मच्‍छ समझकर उसे किनारे पर खींच लिया। उसने जब देखा कि यह मच्‍छ नहीं कोई मुर्दा है, तो उठाकर प्रभु को किनारे पर फेंक दिया। बस, महाप्रभु के अंग का स्‍पर्श करना था कि वह मल्‍लाह आनन्‍द से उन्‍मत्त होकर नृत्‍य करने लगा।प्रभु के श्रीअंग के स्‍पर्शमात्र से ही उसके शरीर में सभी सात्त्विक भाव आप से आप ही उदित हो उठे। वह कभी तो प्रेम में विह्वल होकर हँसने लगता, कभी रोने लगता, कभी गाने लगता और कभी नाचने लगता। वह भयभीत हुआ वहाँ से दौड़ने लगा। उसे भ्रम हो गया कि मेरे शरीर में भूत ने प्रवेश किया है, इसी भय से वह भागता-भागता आ रहा था कि इतने में ये भक्त भी वहाँ पहुँच गये। उसकी ऐसी दशा देखकर स्‍वरूप गोस्‍वामी ने उससे पूछा– ‘क्‍यों भाई ! तुमन यहाँ किसी आदमी को देखा है, तुम इतने डर क्‍यों रहे हो? अपने भय का कारण तो हमें बताओ।’

भय से कांपते हुए उस मल्‍लाह ने कहा– ‘महाराज ! आदमी तों मैंने यहाँ कोई नहीं देखा। मैं सदा की भाँति मछली मार रहा था।
क्रमशः

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