358

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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एक मुर्दा मेरे जाल में फँस आया। उसके अंग में भूत था, वही मेरे अंग में लिपट गया है। इसी भय से मैं भूत उतरवाने के लिये ओझा के पास जा रहा हूँ। आप लोग इधर न जायँ।वह बड़ा ही भयंकर मुर्दा है, ऐसा विचित्र मुर्दा तो मैंने आज तक देखा ही नहीं।’ 
उस समय महाप्रभु का मृत्‍युदशा में प्राप्‍त शरीर बड़ा ही भयानक बन गया था। कविराज गोस्‍वामी ने मल्‍लाह के मुख से प्रभु के शरीर का जो वर्णन कराया है, उसे उन्‍हीं के शब्‍दों में सुनिये –

जालिया कहे–इहाँ एक मनुष्‍य ना देखिल। 
जाल बाहिते एक मृत मोर जाले आइल।।
बड़ मत्‍स्‍य बले, आमि उठाइलूँ यतने। 
मृतक देखिते मोर भय हैल मने।।
जाल खसाइते तार अंग-स्‍पर्श हइल। 
स्‍पर्शमात्रे सेइ भूत हृदये पशिल।।
भये कम्‍प हैल, मोर नेत्रे बहे जल। 
गद्गद वाणी मेार उठिल सकल।।
कि वा ब्रह्मदैत्‍य कि वा भूत कहने ना जाय। 
दर्शनमात्रे मनुष्‍येर पशे सेइ काय।।
शरीर दीघल तार-हाथ पांच सात। 
एक हस्‍त पद तार, तिन तिन हाथ।।
अस्थि-सन्धि छूटि चर्म करे नड-बड़े।
ताहा देखि, प्राण कार नाहि रहे धरे।।
मड़ा रूप धरि, रहे उत्‍तान-नयन। 
कभू गों-गों करे, कभू देखि अचेतन।।

स्‍वरूप गोस्‍वामी के पूछने पर जालिया (मल्‍लाह) कहने लगा– मनुष्‍य तो मैंने यहाँ कोई देखा नहीं है। जाल डालते समय एक मृतक मनुष्‍य मेरे जाल आ गया। मैंने उसे बड़ा मत्‍स्‍य जानकर उठाया। जब मैंने देखा कि यह तो मुर्दा है, तब मेरे मन में भय हुआ। जाल से निकालते समय उसके अंग से मेरे अंग का स्‍पर्श हो गया। स्‍पर्शमात्र से ही वह भूत मेरे शरीर में प्रवेश कर गया।भय के कारण मेरे शरीर में कँपकँपी होने लगी, नेत्रों से जल बहने लगा और मेरी वाणी गद्गद हो गयी। या तो वह ब्रह्मदैत्‍य है या भूत है, इस बात को मैं ठीक-ठीक नहीं कह सकता। वह दर्शनमात्र से ही मनुष्‍य के शरीर में प्रवेश कर जाता है। उसका शरीर पांच-सात हाथ लम्‍बा है। उसके एक एक हाथ पांव तीन तीन हाथ लम्‍बे हैं।उसके हड्डियों की सन्धियाँ खुल गयी हैं। उसके शरीर के ऊपर का चर्म लुजु-बुजुर-सा करता है। उसे देखकर किसी के भी प्राण नही रह सकते। बड़ा ही विचित्र रूप धारण किये है, दोनों नेत्र चढ़े हुए हैं। कभी तो गों-गों शब्‍द करता है और कभी फिर अचेतन हो जाता है।

इस बात को मल्‍लाह के मुख से सुनकर स्‍वरूप गोस्‍वामी सब कुछ समझ गये कि वह महाप्रभु का ही शरीर होगा। उनके अंग-स्‍पर्श से ही इसकी ऐसी दशा हो गयी है। भय के कारण इसे पता नहीं कि यह प्रेम की अवस्‍था है। यह सोचकर वे कहने लगे– ‘तुम ओझा के पास क्‍यों जाते हो, हम बहुत अच्‍छी ओझाई जातने हैं। कैसा भी भूत क्‍यों न हो, हमने जहाँ मंत्र पढ़ा नहीं बस, वहीं उसी क्षण वह भूत भागता हुआ ही दिखायी देता है, फिर वह क्षणभर भी नहीं ठहरता।’ ऐसा कहकर स्‍वरूप गोस्‍वामी ने वैसे ही झूठ-मूँठ कुछ पढ़कर अपने हाथ को उसके मस्‍तक पर छुआया और जोरों से उसके गाल पर तीन तमाचे मारे। उसके ऊपर भूत थोड़े ही था। उसे भूत का भ्रम था, विश्‍वास के कारण वह भय दूर हो गया।

तब स्‍वरूप गोस्‍वामी ने उससे कहा– ‘तू जिन्‍हें भूत समझ रहा है, वे महाप्रभु चैतन्‍यदेव हैं, प्रेम के कारण उनकी ऐसी दशा हो जाती है। तू उन्‍हें हमको बता कहाँ हैं। हम उन्‍हीं की खोज में तो आये हैं।’
इस बात को सुनकर वह मल्‍लाह प्रसन्‍न होकर सभी भक्‍तों को साथ लेकर प्रभु के पास पहुँचा। भक्‍तों ने देखा, सुवर्ण के समान प्रभु का शरीर चांदी के चूरे के समान समुद्र की बालुका में पड़ा हुआ है, आँखे ऊपर को चढ़ी हुई हैं, पेट फूला हुआ है, मुँह में से झाग निकल रहे हैं। बिना किसी प्रकार की चेष्‍टा किये हुए उनका शरीर गीली बालुका से सना हुआ निश्‍चेष्‍ट पड़ा हुआ है। सभी भक्‍त प्रभु को घेरकर बैठ गये।हम संसारी लोग तो मृत्‍यु को ही अन्तिम दशा समझते हैं, इसलिये संसारी दृष्टि से प्रभु के शरीर का यहीं अन्‍त हो गया। फिर उसे चैतन्‍यता प्राप्‍त नहीं हुई किन्‍तु रागानुगामी भक्त तो मृत्‍यु के पश्‍चात भी विरहिणी को चैतन्‍यता लाभ कराते हैं। उनके मत में मृत्‍यु ही अन्तिम दशा नहीं है। इस प्रसंग मे बंगला भाषा के प्रसिद्ध पदकर्ता श्री गोविन्‍ददास जी का एक पद है कि श्री कृष्‍ण नाम श्रवण से मृत्‍युदशा को प्राप्‍त हुई भी राधिका जी फिर चैतन्‍यता प्राप्‍त करके बातें कहने लगीं।

कुंज भवने धीन। तुया गुण गणि गणि।
अतिशय दुरबली भेल। 
दशमीक पहिल, दशा हेरि सहचरी।
घरे संगे बाहिर केल।।
शुन माधव कि बलब तोय।
गोकुल तरुणी, निचय मरण जानि।
राइ राइ करि रोय।।
तहि एक सुचतुरी, ताक श्रवण भरि।
पुन पुन कहे तुया नाम।।
बहु क्षणे सुन्‍दरी, पाइ परान कोरि।
गद्गद कहे श्‍याम नाम।।
नामक आछू गुणे, शुनिले त्रिभुवने।
मृतजने पुन कहे बात।।
गोविन्‍ददास कह, इह सब आन नह।
याइ देखह मझ साथ।

श्रीकृष्‍ण से एक सखी श्री राधिका जी की दशा का वर्णन कर रही है। सखी कहती है– ‘हे श्‍यामसुन्‍दर! राधिका जी कुंजभवन में तुम्‍हारे नामों को दिन-रात रटते-रटते अत्‍यन्‍त ही दुबली हो गयी हैं। जब उनकी मृत्‍यु के समीप की दशा मैंने देखी तब उन्‍हें उस कुंजकुटीर से बाहर कर लिया। प्‍यारे माधव ! अब तुमसे क्‍या कहूँ, बाहर आने पर उसकी मृत्‍यु हो गयी, सभी सखियाँ उसकी मृत्‍युदशा को देखकर रुदन करने लगीं।उनमें एक चतुर सखी थी, वह उसके कान में तुम्‍हारा नाम बार-बार कहने लगी। बहुत देर के अनन्‍तर उस सुन्‍दरी के शरीर में कुछ-कुछ प्राणों का संचार होने लगा। थोडी देर में वह गद्गद-कण्‍ठ से ‘श्‍याम’ ऐसा कहने लगी। तुम्‍हारे नाम का त्रिभुवन में ऐसा गुण सुना गया है कि मृत्‍यु-दशा को प्राप्‍त हुआ प्राणी भी पुन: बात कहने लगता है।
सखी कहती है– ‘तुम इस बात को झूठ मत समझना। यदि तुम्‍हें इस बात का विश्‍वास न हो, तो मेरे साथ चलकर उसे देख आओ।’ 

इसी प्रकार भक्‍तों ने भी प्रभु के कानों में हरिनाम सुनाकर उन्‍हें फिर जागृत किया। वे अर्धबाह्य दशा में आकर कालिन्‍दी में होने वाली जलकेलि का वर्णन करने लगे।
क्रमशः

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