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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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‘वह साँवला सभी सखियों को साथ लेकर यमुना जी के सुन्‍दर शीतल जल में घुसा। सखियों के साथ वह नाना भाँति की जलक्रीड़ा करने लगा।कभी किसी के शरीर को भिगोता, कभी दस-बीसों को साथ लेकर उनके साथ दिव्‍य-दिव्‍य लीलाओं का अभिनय करता। मैं भी उस प्‍यारे की क्रीड़ा में सम्मिलित हुई। वह क्रीड़ा बड़ी ही सुखकर थी।’ इस प्रकार कहते-कहते प्रभु चारों ओर देखकर स्‍वरूप गोस्‍वामी से पूछने लगे– ‘मैं यहाँ कहाँ आ गया? वृन्‍दावन से मुझे यहाँ कौन ले आया?’ तब स्‍वरूप गोस्‍वामी ने सभी समाचार सुनाये और वे उन्‍हें स्‍नान कराकर भक्‍तों के साथ वास स्‍थान पर ले गये।

महाप्रभु का अदर्शन अथवा लीलासंवरण…

सचमुच लीलासंवरण के वर्णन के अधिकारी तो व्‍यास, वाल्‍मीकि ही हैं। इनके अतिरिक्‍त जो नित्‍य महापुरुषों की लीलासंवरण का उल्‍लेख करते हैं, वह उनकी अनधिकार चेष्‍टा ही है। महाभारत में जब अर्जुन की त्रिभुवन विख्‍यात शूरता, वीरता और युद्ध चातुर्य की बातें पढ़ते हैं तो पढ़ते पढ़तें रोंगटे खड़े हो जाते हैं।हमारी आँखों के सामने लम्‍बी-लम्‍बी भुजाओं वाले गाण्‍डीवधारी अर्जुन की वह विशाल और भव्‍य मूर्ति प्रत्‍यक्ष होकर नृत्‍य करने लगती है। उसी को जब श्रीकृष्‍ण के अदर्शन के अनन्‍तर आभीर और भीलों द्वारा लुटते देखते हैं, तो यह सब दृश्‍य-प्रपंच स्‍वप्‍नवत प्रतीत होने लगता है। तब यह प्रत्‍यक्ष अनुभव होने लगता है कि यह सब उस खिलाडी श्रीकृष्‍ण की खिलवाड़ है, लीला-प्रिय श्‍याम की ललित लीला के सिवा कुछ नहीं है।पाण्‍डवों की सच्‍चरित्रता, कष्‍टसहिष्‍णुता, शूरता, कार्यदक्षता, पटुता, श्रीकृष्‍णप्रियता आदि गुणों को पढ़ते हैं तब रोंगटे खड़े हो जाते हैं, हृदय उनके लिये भर आता है, किन्‍तु उन्‍हें ही जब हिमालय  में गलते हुए देखते हैं तो छाती फटने लगती है। सबसे पहले द्रौपदी बर्फ में गिर जाती है। उस कौमलांगी अबला को बर्फ में ही बिलबिलाती छोड़कर धर्मराज आगे बढ़ते हैं। वे मुड़कर भी उसकी ओर नहीं देखते। फिर प्‍यारे नकुल सहदेव गिर पड़ते हैं। धर्मराज उसी प्रकार दृढ़तापूर्वक बर्फ पर चढ़ रहे हैं।जिस भीम के पराक्रम से यह सप्‍तद्वीपा वसुमती प्राप्‍त हुई थी। वह भी बर्फ में पैर फिसलने से गिर पड़ा और तड़पने लगा किन्‍तु युधिष्ठिर किसकी सुनते हैं, वे आगे बढ़े ही जा रहे हैं। अब वह हृदयविदारक दृश्‍य आया। जिसके नाम से मनुष्‍य तो क्‍या स्‍वर्ग के देवता थर-थर कांपते थे, वह गाण्‍डीव धुनषधारी अर्जुन मूर्च्छित होकर गिर पड़ा और हा तात ! कहकर चीत्‍कार मारने लगा, किन्‍तु धर्मराज ने मुड़कर भी उनकी ओर नहीं देखा।सचमुच स्‍वर्गारोहण पर्व को पढ़ते-पढ़ते रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कैसा भी वज्रहृदय क्‍यों न हो बिना रोये न रहेगा।
इसी प्रकार जब वाल्‍मीकीय रामायण में, श्री राम की सुकुमारता, ब्राह्मणप्रियता, गुरुभक्ति, शूरता और पितृभक्ति की बातें पढ़ते तो हृदय भर आता है। सीता जी के प्रति उनका कैसा प्रगाढ़ प्रेम था। हाय ! जिस समय कामान्‍ध रावण जनकनन्दिनी को चुरा ले गया, तब उन मर्यादापुरुषोत्तम की भी मर्यादा टूट गयी।वे अकेली जानकी के पीछे विश्‍वब्रह्माण्‍ड को अपने अमोघ बाण के द्वारा भस्‍म करने को उद्यत हो गये। उस समय उनका प्रचण्‍ड क्रोध, दुर्धर्ष तेज और असहनीय रोष देखते ही बनता था। दूसरे ही क्षण वे साधारण कामियों की भाँति रो-रोकर लक्ष्‍मण से पूछने लगते– ‘भैया ! मैं कौन हूँ? तुम कौन हो, हम यहाँ क्‍यों फिर रहे हैं? सीता कौन है, हा सीते ! हा प्राणवल्‍लभे ! तू कहाँ चली गयी ?’ 
ऐसा कहते-कहते बेहोश होकर गिर पड़ते हैं। उनके अनुज ब्रह्मचारी लक्षमण जी बिना खाये पीये और भूख नींद का परित्‍याग किये छाया की तरह उनके पीछे पीछे फिरते हैं और जहाँ श्रीराम का एक बूँद पसीना गिरता है, वहीं वे अपने कलेजे को काटकर उसका एक प्‍याला खून निकालकर उससे उसे स्‍वेद-विन्‍दु को धोते हैं।उन्‍हीं लक्ष्मण का जब श्री रामचन्‍द्र जी ने छद्मवेषधारी यमराज के कहने से परित्‍याग कर दिया और वे श्री राम के प्‍यारे भाई सुमित्रानन्‍दन महाराज दशरथ के प्रिय पुत्र सरयू नदी में निमग्‍न कर अपने प्राणों को खोते हैं तो हृदय फटने लगता है। उससे भी अधिक करुणापूर्ण तो यह दृश्य है कि जब श्री रामचन्‍द्र जी भी अपने भाइयों के साथ उसी प्रकार सरयू में शरीर को निमग्‍न कर अपने नित्‍यधाम को पधारते हैं।सचमुच इन दोनों म‍हाकवियों ने इन करुणापूर्ण प्रसंग को लिखकर करुणा की एक अविच्छिन्‍न धारा बहा दी है, जो इन ग्रन्‍थों के पठन करने वालों के नेत्र-जल से सदा बढ़ती ही रहती है।जिनके हृदय कोमल हैं, जो सरस हैं, भावुक है, प्रेमी हैं और श्रीराम-कृष्‍ण के अनन्‍य उपासक हैं, उन सबके लिये तो ये प्रकरण अत्‍यन्‍त ही असह्य हैं। उनके मत में तो श्रीराम-कृष्‍ण का कभी अदर्शन हुआ ही नहीं, वे नित्‍य हैं, शाश्‍वत हैं। आत्मा से नहीं, वे शरीर से भी अभी ज्‍यों-के-त्‍यों ही विराजमान हैं।इसीलिये श्रीमद्वाल्‍मीकीय के पारायण में उत्तरकाण्‍ड छोड़ दिया जाता है। वैष्णवगण राजगद्दी होने पर ही रामायण की समाप्ति समझते हैं और वही रामायण का नवाह समाप्त हो जाता है। गोस्‍वामी तुलसीदास जी ने तो इस प्रकरण को एकदम छोड़ ही दिया है। भला, वे अपनी कोमल और भक्तिभरी लेखनी से सीता माता का परित्‍याग, उनका पृथ्‍वी में समा जाना और गुप्‍तारघाट पर रामानुज लक्ष्मण का अन्‍तर्धान हो जाना इन हृदयविदारक प्रकरणों को कैसे लिख सकते थे।

इसी प्रकार श्री चैतन्‍य चरित्र-लेखकों ने श्री श्रीचैतन्‍य की अन्तिम अदर्शन लीला का वर्णन नहीं किया है। सभी इस विषय में मौन ही रहे हैं। हाँ, ‘चैतन्‍य मंगल’ कार ने कुछ थोड़ा सा वर्णन अवश्‍य किया है, सो अदर्शन की दृष्टि से नहीं। उसमें श्री चैतन्‍य देव के सम्‍बन्‍ध की सब करामाती, अलौकिक चमत्‍कारपूर्ण घटनाओं का ही वर्णन किया गया है। इसीलिये उनका शरीर साधारण लोगों की भाँति शान्‍त नहीं हुआ, इसी दृष्टि से अलौकिक घटना ही समझकर उसका वर्णन किया गया है।नहीं तो सभी वैष्‍णव इस दु:खदायी प्रसंग को सुनना नहीं चाहते। कोमल प्रकृति के वैष्‍णव भला इसे सुन ही कैसे सकते हैं? इसीलिये एक भौतिक घटनाओं को ही सत्‍य और इतिहास मानने वाले महानुभाव ने लिखा है कि ‘श्रीचैतन्‍यदेव के भक्‍तों की अन्‍धभक्ति ने श्री चैतन्‍य देव की मृत्‍यु के सम्‍बन्‍ध में एकदम पर्दा डाल दिया है।’

उन भोले भाई को यह पता नहीं कि चैतन्‍य तो नित्‍य हैं। भला चैतन्‍य की भी कभी मृत्‍यु हो सकती है।क्रमशः

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