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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जिस प्रकार अग्नि कभी नहीं बुझती उसी प्रकार चैतन्‍य भी कभी नहीं मरते। अज्ञानी पुरुष ही इन्‍हें बुझा और मरा हुआ समझते हैं।अग्नि तो सर्वव्‍यापक है, विश्‍व उसी के ऊपर अवलम्बित है। संसार से अग्नितत्त्व निकाल दीजिये। उसी क्षण प्रलय हो जाय। शरीर के पेट की अग्नि को शान्‍त कर दीजिये उसी क्षण शरीर ठंडा हो जाय। सर्वव्‍यापक अग्नि के ही सहारे यह विश्‍व खड़ा है। वह हमें इन चर्म-चक्षुओं से सर्वत्र प्रत्‍यक्ष नहीं दीखती। दो लकड़ियों को घिसिये, अग्नि प्रत्‍यक्ष हो जायेगी। इसी प्रकार चैतन्‍य सर्वत्र व्‍यापक हैं। त्‍याग, वैराग्‍य और प्रेम का अवलम्‍बन कीजिये, चैतन्‍य प्रत्‍यक्ष होकर ऊपर को हाथ उठा उठाकर नृत्‍य करने लगेंगे।जिसका जीवन अग्निमय हो, जो श्रीकृष्‍ण प्रेम में छटपटाता सा दृष्टिगोचर होता हो, जिसके शरीर में त्‍याग, वैराग्‍य और प्रेम ने घर बना लिया हो, जो दूसरों की निन्‍दा और दोष-दर्शन से दूर रहता हो वहाँ समझ लो कि श्री चैतन्‍य यहाँ प्रत्‍यक्ष प्रकट हो गये हैं। यदि सचमुच चैतन्‍य के दर्शन करने के तुम उत्‍सुक हो तो इन्‍हीं स्‍थानों में चैतन्‍य के दर्शन हो सकेंगे किन्‍तु ये सब बातें तो ज्ञान की हैं। भक्त को इतना अवकाश कहाँ कि वह इन ज्ञानगाथाओं को श्रवण करे। वह तो श्री चैतन्‍य चरित्र ही सुनना चाहता है। उसमें इतना पुरुषार्थ कहाँ ? उसका पुरुषार्थ तो इतना ही है कि भक्‍तरूप में या भगवान रूप में श्रीकृष्‍ण ने जो जो लीलाएं की हैं उन्‍हीं को बार बार सुनना चाहता है। उसकी इच्‍छा नहीं कि सभी लीलाओं को सुन ले। श्रीकृष्‍ण की सभी लीलाओं का पार तो वे स्‍वयं ही नहीं जानते फिर दूसरा कोई तो जान ही क्‍या सकता है? भक्‍त तो चाहता है, चाहे कूप से ला दो या घड़े से हमारी तो एक लोटे की प्‍यास है, नदी से लाओगे तो भी एक ही लोटा पीवेंगे और घड़े से दोगे तो भी उतना ही। समुद्र में से लाओ तो सम्‍भव है, हमसे पिया भी न जाय क्‍योंकि उसका पान तो कोई अगस्‍त्‍य-जैसे महापुरुष ही कर सकते हैं। इसलिये भावुक भक्‍त सद श्रीकृष्‍ण और उनके दूसरे स्‍वरूप श्रीकृष्‍ण भक्‍तों की ही लीलाओं का श्रवण करते रहते हैं। उनका कोमल हृदय इन अप्रकट और अदर्शन लीलाओं का श्रवण नहीं कर सकता, क्‍योंकि शिरीषकुसुम के समान, छुई-मुई के पत्तों के समान उनका शीघ्र ही द्रवित हो जाने वाला हृदय होता है। यह बात भी परम भावुक भक्‍तों की है; किन्‍तु हम-जैसे वज्र के समान हृदय रखने वाले पुरुष क्‍या करें?

भक्‍त का तो लक्षण ही यह है कि भगवन्‍नाम के श्रवणमात्र से चन्‍द्रकान्‍तमणि के समान उसके दोनों नेत्र बहने लगें।आँसू ही भक्त का आभूषण है, आँसू में ही श्रीकृष्‍ण छिपे रहते हैं। जिस आँख में आँसू नहीं वहाँ श्रीकृष्‍ण नहीं। तब हम कैसे करें, हमारी आँखों में तो आँसू आते ही नहीं। हां, ऐसे ऐसे हृदयविदारक प्रकरणों को कभी पढ़ते हैं तो दो चार बूँदें आप से आप ही निकल पड़ती हैं, इसलिये भक्‍तों को कष्‍ट देने के निमित्त नहीं, अपनी आँखों को पवित्र करने के निमित्त, अपने वज्र के समान हृदय को पिघलाने के निमित्त हम यहाँ अति संक्षेप में श्री चैतन्‍यदेव के अदर्शन का यत्किंचित वृत्तान्‍त लिखते हैं। चौबीस वर्ष नवद्वीप  में रहकर गृहस्‍थाश्रम में और चौबीस वर्ष संन्‍यास लेकर पुरी आदि तीर्थों में प्रभु ने बिताये।संन्‍यास लेकर छ: वर्षों तक आप तीर्थों में भ्रमण करते रहे और अन्‍त में अठारह वर्षों तक अचल जगन्‍नाथजी के रूप में पुरी में रहे। बारह वर्षों तक निरन्‍तर दिव्‍योन्‍माद की दशा में रहे। जिन्‍होंने प्रार्थना करके प्रभु को बुलाया था उन्‍होंने ही अब पहेली भेजकर गौरहाट उठाने की अनुमति दे दी। इधर स्‍नेहमयी शचीमाता  भी इस संसार को त्‍यागकर परलोक वासिनी बन गयीं। चैतन्य महाप्रभु जिस कार्य के लिये अवतरित हुए थे, वह कार्य भी सुचारुरीति से सम्‍पन्‍न हो गया। अब उन्‍होंने लीलासंवरण करने का निश्‍चय कर लिया। उनके अन्‍तरंग भक्त तो प्रभु के रंग ढंग को ही देखकर अनुमान लगा रहे थे कि प्रभु अब हमसे ओझल होना चाहते हैं। इसलिये वे सदा सचेष्‍ट ही बने रहते थे।

शाके 1455 [संवत 1590, ई. सन 1533] का आषाढ़ महीना था। रथ यात्रा का उत्‍सव देखने के निमित्‍त गौड़ देश से कुछ भक्‍त आ गये थे। महाप्रभु आज अन्‍य दिनों की अपेक्षा अत्‍यधिक गम्‍भीर थे। भक्‍तों ने इतनी अधिक गम्‍भीरता उनके जीवन में कभी नहीं देखी। उनके ललाट से एक अद्भुत तेज-सा निकल रहा था, अत्‍यन्‍त ही दत्‍तचित्‍त होकर प्रभु स्‍वरूप गोस्‍वामी के मुख से श्रीकृष्‍ण कथा श्रवण कर रहे थे। सहसा वे वैसे ही जल्‍दी से उठकर खडे हो गये और जल्‍दी से अकेले ही श्रीजगन्‍नाथजी के मन्दिर की ओर दौडने लगे। भक्‍तों को परम आश्‍चर्य हुआ।महाप्रभु इस प्रकार अकेले मन्दिर की ओर कभी नहीं जाते थे, इसलिये भक्‍त भी पीछे-पीछे प्रभु के पादपद्मों का अनुसण करते हुए दौड़ने लगे। आज महाप्रभु अपने नित्‍य के नियमित स्‍थान पर गरुडस्‍तम्‍भ के समीप नहीं रुके, वे सीधे मन्दिर के दरवाजे के समीप चले गये। सभी परम विस्मित से हो गये।महाप्रभु ने एक बार द्वार पर से ही उछककर श्रीजगन्‍नाथ जी की ओर देखा और फिर जल्‍दी से आप मन्दिर में घुस गये। 

महान आश्‍चर्य ! अघटित घटना ! ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। मन्दिर के सभी कपाट अपने आप बंद हो गये, महाप्रभु अकेले ही मन्दिर के भीतर थे। सभी भक्‍तगण चुपचाप दरवाजे पर खड़े इस अलौकिक दृश्‍य को उत्‍सुकता के साथ देख रहे थे। गुंजाभवन में एक पूजा करने वाले भाग्‍यवान पुजारी प्रभु की इस अन्तिम लीला को प्रत्‍यक्ष देख रहे थे। उन्‍होंने देखा, महाप्रभु जगन्‍नाथ जी के सम्‍मुख हाथ जोड़े खड़े हैं और गद्गदकण्‍ठ से प्रार्थना कर रहे हैं– ‘हे दीनवत्‍सल प्रभो! हे दयामय देव ! हे जगत्‍पिता जगन्‍नाथ देव ! सत्‍य, त्रेता, द्वापर और कलि–इन चारों युगों में कलियुग का एकमात्र धर्म श्रीकृष्‍ण संकीर्तन ही है। हे नाथ! आप अब जीवों पर ऐसी दया कीजिये कि वे निरन्‍तर आपके सुमधुर नामों का सदा कीर्तन करते रहें। प्रभो ! अब घोर कलियुग आ गया है, इसमें जीवों को आपके चरणों के सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं। इन अनाश्रित जीवों पर कृपा करके अपने चरण कमलों का आश्रय प्रदान कीजिये।’ 
बस, इतना कहते-कहते प्रभु ने श्री जगन्‍नाथ जी के श्री विग्रह को आलिंगन किया और उसी क्षण आप उसमें लीन हो गये।
क्रमशः

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