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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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पुजारी जल्दी से यह कहता हुआ– ‘प्रभो ! यह आप क्या कर रहे हैं, दयालो ! यह आपकी कैसी लीला है, जल्दी से प्रभु को पकड़ने के लिये दौड़ा किन्तु प्रभु अब वहाँ कहाँ ! वे तो अपने असली स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये। पुजारी मूर्च्छित होकर गिर पड़ा और ‘हा देव ! हे प्रभो ! हे दयालो ! कहकर जोरों से चीत्कार करने लगा। द्वार पर खड़े हुए भक्तों ने पुजारी का करुण क्रन्दन सुनकर जल्दी से किवाड़ खोलने को कहा, किन्तु पुजारी को होश कहाँ ! जैसे-तैसे बहुत कहने सुनने पर पुजारी ने किवाड़ खोले। भक्तों ने मन्दिर में प्रवेश किया और प्रभु को वहाँ न देखकर अधीर होकर वे पूछने लगे– ‘प्रभु कहाँ हैं?’
पुजारी ने लड़खड़ती हुई वाणी में रुक-रुककर सारी कहानी कह सुनायी।सुनते ही भक्तों की जो दशा हुई, उसका वर्णन यह लेखनी भला कैसे कर सकती है ? भक्त पछाड़ खा-खाकर गिरने लगे, कोई दीवार से सिर रगड़ने लगा। कोई पत्थर से माथा फोड़ने लगा। कोई रोते-रोते धूलि में लोटने लगा। स्वरूप गोस्वामी तो प्रभु के बाहरी प्राण ही थी। वे प्रभु के वियोग को कैसे सह सकते थे। वे चुपचाप स्तम्भित भाव से खड़े रहे। उनके पैर लड़खड़ाने लगे। भक्तों ने देखा उनके मुंह से कुछ धुँआ सा निकल रहा है। उसी समय फट से आज हुई। स्वरूप गोस्वामी का हृदय फट गया और उन्होंने भी उसी समय प्रभु के ही पथ का अनुसरण किया।
भक्तों को जगन्नाथ पुरी अब उजड़ी हुई नगरी सी मालूम हुई। किसी ने तो उसी समय समुद्र में कूदकर प्राण गँवा दिये। किसी ने कुछ किया और बहुत-से पुरी को छोड़कर विभिन्न स्थानों में चले गये। पुरी से अब गौराहट उठ गयी। वक्रेश्वर पण्डित ने फिर उसे जमाने की चेष्टा की, किन्तु उसका उल्लेख करना विषयान्तर हो जायगा। किसी के जमाने में हाट थोड़े ही जमती है, लाखों मठ हैं और उनके लाखों ही पैर पुजाने वाले महन्त हैं, उनमें वह चैतन्यता कहाँ। साँप निकल गया, पीछे से लकीर को पीटते रहो। इससे क्या? इस प्रकार अड़तालीस वर्षों तक इस धराधाम पर प्रेमरूपी अमृत की वर्षा करने के पश्चात महाप्रभु अपने सत्वस्वरूप में जाकर अवस्थित हो गये। बोलो प्रेमावतार श्री चैतन्य देव की जय ! बोलो उनके सभी प्रियपार्षदों की जय ! बोलो भगवन्नाम प्रचारक श्री गौरचन्द्र की जय !
नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्।
प्रणामो दु:खशमनस्तं नमामि हरिं परम्।
‘जिनके नाम का सुमधुर संकीर्तन सर्व पापों को नाश करने वाला है और जिनको प्रणाम करना सकल दु:खों को नाश करने वाला है उन सर्वोत्तम श्रीहरि के पादपद्मों में मैं प्रणाम करता हूँ।’
श्रीमती विष्णुप्रिया देवी…..
गौरशक्तिं महामायां नवद्वीपनिवासिनीम्।
विष्णुप्रियां सतीं साध्वीं तां देवीं प्रणतोऽस्म्यहम्।
_नवद्वीप में निवास करने वाली श्रीगौरांग देवी की शक्ति महामाया-स्वरूपिणी सती-साध्वी श्रीविष्णुप्रियादेवी को मैं प्रणाम करता हूँ।
यह विश्व महामाया शक्ति के ही अवलम्ब से अवस्थित है। शक्तिहीन संसार की कल्पना ही नहीं हो सकती। सर्वशक्तिमान शिव भी शक्ति के बिना शव बने पड़े रहते हैं। जब उनके अचेतन शव में शक्ति देवी का संचार होता है, तभी वे शव से शिव बन जाते हैं।शक्ति प्रच्छन्न रहती है और शक्तिमान प्रकट होकर प्रसिद्धि प्राप्त कर लेता है। यथार्थ में तो उस शक्ति की ही साधना कठोर है। वनवासी वीतरागी विरक्त तपस्वियों की अपेक्षा छिपकर साधना करने वाली सती-साध्वी, शक्तिरूपिणी देवी की तपस्या को मैं अधिक श्रेष्ठ मानता हूँ।
हृदय पर हाथ रखकर उस सती की तपश्चर्या की कल्पना तो कीजिये, जो संसार में रहकर भी संसार से एकदम पृथक रहती है। उसका सम्पूर्ण संसार पति की मनोहर मूर्ति में ही सन्निहित हो जाता है। उसकी सभी इन्द्रियों के व्यापार, चित्त और मन की क्रियाएं एकमात्र पति के ही लिये होती हैं।पति के रूप का चिन्तन ही उसके मन का आहार बन जाता है। अहा ! कितनी ऊँची स्थिति होती होगी, क्या कोई शरीर को सुखाकर ही अपने को कृतकृत्य समझने वाला तपस्वी इस भयंकर तपस्या का अनुमान लगा सकता है? भगवान बुद्धदेव के राज्य-त्याग की सभी प्रशंसा करते हैं, किन्तु उस साध्वी गोपा का कोई नाम भी नहीं जानता जो अपने पांच वर्ष के पुत्र राहुल को संन्यासी बनाकर स्वयं भी राजमहल का परित्याग करके अपने पति भगवान बुद्धदेव के साथ भिक्षुणी वेष में द्वार-द्वार भिक्षा माँगती रही। परमहंस रामकृष्णदेव के वैराग्य की बात सभी पर विदित है, किन्तु उस भोली बाला शारदादेवी का नाम बहुत कम लोग जानते हैं जो पांच वर्ष की अबोध बालिका की दशा में अपने पितृगृह को परित्याग करके अपने पगले पति के घर में आकर रहने लगी। परमहंसदेव ने जब प्रेम के पागलपन में संन्यास लिया था, तब वह जगन्माता पूर्ण युवती थी।अपने पति के पागलपन की बातें सुनकर वह लोकलाज की कुछ भी परवा न करके अपने संन्यासी स्वामी के साथ रहने लगी। कल्पना तो कीजिये। युवावस्था, रूपलावण्ययुक्त परम रूपवान पुरुष की सेवा, सो भी एकान्त में और वह भी पादसेवा का गुरुतर कार्य। परम आश्चर्य की बात तो यह है कि वह पुरुष भी परपुरुष नहीं अपना सगा स्वामी ही है जिस पर भी किसी प्रकार का विकार मन में न आना।
‘कामश्चाष्टगुण: स्मृत:।’ [स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा आठगुना कामोद्वेग बताया जाता है।] कहने वाले वे कवि कल्पना करें कि क्या ऐसी घोर तपस्या पंचाग्नि तापने और शीत में सैकड़ों वर्षों तक जल में खड़े रहने वाली तपस्या से कुछ कम है? अहा ! ऐसी सती-साध्वी देवियों के चरणों में हम कोटि-कोटि प्रणाम करते हैं।
महाप्रभु के त्याग-वैराग्य का वृत्तान्त तो सर्वज्ञ ज्ञात है किन्तु उनसे भी बढ़कर त्याग संसार और श्री विष्णुप्रिया जी की साधना घर के भीतर एक गहरे कोने में नर-नारियों की दृष्टि से एकदम अलग हुई, इसलिये वह उतनी अधिक प्रसिद्धि प्राप्त न कर सकी।उनकी साधना का जो भी कुछ थोड़ा-बहुत समाचार मिलता है, उसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। क्या कोई भी व्यक्ति इस प्रकार की कठोरता कर सकता है? अबला कही जाने वाली नारी-जाति के द्वारा क्या इतनी तीव्रतम तपस्या सम्भव हो सकती है? किन्तु इसमें अविश्वासी की तो कोई बात ही नहीं। अद्वैताचार्य जी के प्रिय शिष्य ईशान नागर ने प्रत्यक्ष देखकर अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘अद्वैत-प्रकाश’ में इसका उल्लेख किया है।
क्रमशः
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