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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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उसी समय स्‍वप्‍न में विष्णु प्रियाजी ने देखा– मानों प्रत्‍यक्ष श्री गौरांग आकर कह रहे हैं– ‘जिस नीम के नीचे मैंने माता के स्‍तन का पान किया था, उसी के नीचे मेरी काष्‍ठ की मूर्ति स्‍थापित करो, मैं उसी में आकर रहूँगा।’ 
विष्‍णुप्रिया देवी उसी समय चौंककर उठ बैठीं, प्रात:काल होने को था, वंशीवदन भी जाग गया और उसने भी उसी क्षण ठीक यही स्‍वप्‍न देखा था। जब दोनों ने परस्‍पर एक-दूसरे को स्‍वप्‍न की बात सुनायी, तब तो शीघ्र ही दारुमयी मूर्ति की स्‍थापना का अयोजन होने लगा। वंशीवदन ने उसी नीम की एक सुन्‍दर लकडी काटकर बढ़ई से एक बहुत ही सुन्‍दर श्री गौरांग की मूर्ति बनवायी। पंद्रह दिन में मूर्ति बनकर तैयार हो गयी, वंशीवदन ने लोहे की सलाका से उस पर अपना नाम खोदा। जब वस्‍त्राभूषण पहनाकर श्रीगौरांग विग्रह को सिंहासन पर पधराया गया, तब सभी को उसमें प्रत्‍यक्ष श्रीगौरांग के दर्शन होने लगे। वंशीवदन ने दूर-दूर से भक्‍तों को बुलाकर खूब धूमधाम से उस मूर्ति की प्रतिष्‍ठा की और एक बड़ा भारी भण्‍डारा किया।

विष्णु प्रिया जी ने श्रीविग्रह की नित्‍य-नैमित्तिक पूजा के निमित्त अपने भाई तथा भाई के पुत्र यादवनन्‍दन को मन्दिर में नियुक्‍त किया। श्री विष्‍णुप्रिया जी नित्‍यप्रति मन्दिर में दर्शन करने के निमित्त जाया करती थीं और वंशीवदन भी उस मनोहर मूर्ति के दर्शनों से परम प्रसन्‍न होता था। वह मूर्ति अब तक श्री नवद्वीप में विराजमान है और उसके गोस्‍वामी पुजारी उन्‍हीं श्री यादवनन्‍दनाचार्य के वंशजों में से होते हैं। आजकल वे सभी श्रीमान और धन सम्‍पन्‍न हैं, भक्‍तों में वे महाप्रभु के स्‍यालकवंश गोस्‍वामी बोले जाते हैं।

कुछ काल के अनन्‍तर वंशीवदन भी इस असार संसार को परित्‍याग करके परलोकवासी बन गये। अब प्रिया जी की सभी सेवा का भार वृद्ध दामोदर पण्डित के ही ऊपर पड़ा। अपने प्रिय शिष्‍य के वियोग से प्रिया जी को अत्‍यधिक क्‍लेश हुआ और अब उन्‍होंने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया। पहले अँधेरे में कांचना के साथ गंगा स्‍नान करने के निमित्त घाट पर चली जाती थीं, अब घर में ही गंगा जल मँगाकर स्‍नान करने लगीं। कोई भी पुरुष उनके दर्शन नहीं कर सकता था। उन्‍होंने वैसे तो पर पुरुष से जीवन भर में कभी बातें नहीं कीं, किन्‍तु अब उन्‍होंने भक्‍तों को भी दर्शन देना बंद कर दिया। शाम के समय पर्दे की आड़ में से भक्‍तों को उनके चरणों के दर्शन होते थे, उन अरुण रंग के कोमल चरणकमलों के दर्शन से ही भक्‍त अपने को कृतकृत्‍य समझते।

श्रीमद् अद्वैताचार्य जी अभी तक जीवित थे। वृद्धावस्‍था के कारण उनका शरीर बहुत ही अधिक जर्जरित हो गया था। उन्‍होंने जब प्रिया जी के ऐसे कठोर तप की बात सुनी, तब तो उन्‍होंने अपने प्रिय शिष्‍य ईशान नागर को प्रिया जी का समाचार लेने के निमित्त नवद्वीप भेजा। शान्तिपुर से नागर महाशय आये। यहाँ दामोदर पण्डित ईशान नागर को प्रिया जी के अन्‍त:पुर में लग गये और वे प्रिया जी के चरण कमलों के दर्शनों से कृतार्थ हुए। उन दिनों प्रिया जी का तप अलौकिक हो रहा था। वे सदा पूजा मन्दिर में ही बैठी रहतीं। एक पात्र में चावल भरकर सामने रख लेतीं और दूसरे पात्र को खाली ही रखतीं। प्रात:काल स्‍नान करके वे महामंत्र का जप करने बैठतीं। एक बार–

हरे राम हरे राम राम राम हरे रहे।
हरे कृष्‍ण हरे कृष्‍ण कृष्‍ण कृष्‍ण हरे हरे।

यह सोलह नामों वाला मंत्र कह लिया और एक चावल उस खाली पात्र में डाल दिया। इस प्रकार तीसरे पहर तक वे निरन्‍तर जप करती रहतीं।जप की संख्‍या के साथ डाले हुए उतने ही चावलों को तीसरे पहर बनातीं। उनमें न तो नमक डालती और न दाल बनातीं। बस, उन्‍हीं में से थोड़े से चावल भोग लगाकर प्रसादरूप में स्‍वयं पा लेतीं, और शेष थोड़े से भक्‍तों को प्रसाद बांटने के निमित्त थाली में छोड़ देतीं, जिसे कांचना भक्‍तों में बांट देती। बत्तीस अक्षर वाले इस मंत्र को जपने से कितने चावल तीसरे पहर तक होते होंगे, उन्‍हें ही बिना दाल-साग के पाना और प्रसाद के लिये शेष भी छोड़ देना। अल्‍पाहार की यहाँ हद हो गयी। शचीमाता के अन्‍तर्धान हो जाने के अनन्‍तर श्री विष्‍णुप्रिया देवी भक्‍तों के द्वारा अपने घर के किवाड़ बंद करा लेती थीं। द्वार खुलवाने न खुलवाने का अधिकार उन्‍होंने स्‍वयं ही अपने अधीन कर रखा था। उनकी आज्ञा के बिना कोई भी उनके दर्शन नहीं कर सकता था। उन्‍होंने अत्‍यन्त ही कठारे व्रत धारण कर रखा था।
प्रात:काल नित्‍य कर्मों से निवृत्‍त होकर वे हरिनाम-जप करने के निमित्त कुछ चावल अपने सम्‍मुख रख लेती थीं और प्रति मंत्र पर एक-एक चावल मिट्टी के पात्र में डालती जाती थीं। इस प्रकार वे तीसरे पहर तक जप करती थीं। फिर तीसरे पहर यत्‍नपूर्वक वस्‍त्र से मुख को बाँधकर उन चावलों को पाक करती थीं। बिना नमक और बिना दाल शाक के उन चावलों का महाप्रभु को भोग लगाती थीं, भाँति-भाँति के स्‍नेह वचन कहतीं, स्‍तुति-प्रार्थना करके विविध भाँति के विलाप करतीं, अन्‍त में आचमनी देकर भोग उतारतीं और उसमें से एक मुट्ठीभर चावल प्रसाद समझकर पा लेतीं। शेष बचा हुआ प्रसाद भक्‍तों में वितरित कर दिया जाता था। इस प्रकार का कठोर व्रत कौन कर सकेगा?’ सचमुच कोई भी इस व्रत को नहीं कर सकता। श्री गौरांग की अर्धांगिनी ! सचमुच तुम्‍हारा यह व्रत तुम जैसी तपस्‍वी की प्रणयिनी के ही अनुरूप है। माता! तुम्‍हारे ही तप से तो गौरभक्‍त तप और व्रत का कठोर नियम सीखे हैं। हमारी माताएँ तुम्‍हें अपना आदर्श बना लें तो यह अशान्ति पूर्ण संसार स्‍वर्ग से भी बड़कर सुखकर और आनन्‍दप्रद बन जाय। श्री ईशान नागर ने प्रिया जी का सभी वृत्तान्‍त अपने प्रभु अद्वैताचार्य से जाकर कहा। आचार्य सुनकर कुछ अन्‍यमनस्‍कभाव से कहा– ‘अच्‍छा, जैसी श्रीकृष्‍ण की इच्‍छा।’

अवधूत नित्‍यानन्‍द जी भी जाह्नवी और वसुमती नाम की अपनी दोनों गृहिणियों को छोड़कर परलोकवासी बन चुके थे। वसुमती की गोद में वीरचन्‍द्र नामक एक पुत्र था, जाह्नवी की गोद खाली थी ! जाह्नवी पढ़ी-लिखी और देश-काल को समझने वाली थीं। पति के पश्‍चात वे ही भक्‍तों को मंत्र दीक्षा देती थीं।
क्रमशः

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