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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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जाह्नवी जी आज तक कभी श्रीविष्‍णुप्रिया जी से साक्षात्‍कार नहीं हुआ था। अपने पति अवधूत नित्‍यानन्‍द द्वारा वे विष्‍णुप्रिया जी के गुणों को सुनती रहती थीं। अब जब उन दोनों ने विष्‍णुप्रिया जी के ऐसे कठारे तप की बात सुनी तब तो श्री विष्‍णुप्रिया जी के दर्शनों की उनकी इच्‍छा प्रबल हो उठी। वे दोनों शान्तिपुर से श्री अद्वैताचार्य के घर आयीं और वहाँ से अद्वैताचार्य की गृहिणी श्री सीता देवी को साथ लेकर विष्‍णुप्रिया जी के दर्शनों को चलीं। नवद्वीप में वे वंशीवदन के घर आकर उतरीं। इस बात को हम पहले ही बता चुके हैं कि वंशीवदन इस असार संसार को सदा के लिये त्‍याग गये थे, उनके चैतन्‍यदास और निताई दास ये दो पुत्र थे। बड़े पुत्र के उन दिनों एक पुत्र हुआ था, जिसका नाम घर वालों ने रामचन्‍द्र रखा था। आग चलकर ये ही रमाई पण्डित के नाम से प्रसिद्ध हुए। इनमें वंशीवदन का अंश माना जाता है।

विष्णु प्रिया जी ने अवधूत की धर्मपत्नियों के आगमन का समाचार सुना। उन्‍होंने उन बेचारियों को पहले कभी नहीं देखा था। हां, वे सुना करती थीं कि अवधूत अब गृहस्‍थी बनकर रहते हैं। प्रिया जी बाहर तो निकलती ही नहीं थीं। किन्‍तु जब उन्‍होंने अवधूत की गृहिणियों का और सीता देवी का समाचार सुना, तब तो अपने प्रिय शिष्‍य वंशीवदन के घर जाने में कोई आपत्ति न समझीं। वंशीवदन उनके पुत्र के समान था, वंशीवदन का पुत्र चैतन्‍यदास भी प्रिया जी के चरणों में अत्‍यधिक भक्ति रखता था, उसके घर को कृतार्थ करने और उसके पुत्र रामचन्‍द्र को देखने तथा सीता देवी आदि से मिलने के निमित्त प्रिया जी चैतन्‍यदास के घर पधारीं। चैतन्‍यदास का घर प्रिया जी के घर के अत्‍यन्‍त ही समीप था। प्रिया जी के पधारने से परिवार के सभी लोगों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। नित्‍यानन्‍द जी की गृहिणी जाह्नवी देवी ने उठकर विष्‍णुप्रिया जी का स्‍वागत किया। दोनों ही महापुरुषों की अर्धांगिनी सगी दो बहिनों के समान परस्‍पर हृदय से हृदय मिलाकर मिलीं। तब जाह्नवी देवी एकान्‍त में प्रिया जी को लेकर उनसे स्‍नेह की बातें करने लगीं। जाह्नवी ने स्‍नेह से प्रिया जी के कोमल कर को अपने हाथ में लेते हुए कहा– ‘बहिन ! तुम इतना कठोर तप क्‍यों कर रही हो ? इस शरीर को सुखाने से क्‍या लाभ ? इसी शरीर से तो तुम हरि नाम ले सकती हो। बहिन ! तुम्‍हारी ऐसी दयनीय दशा देखकर मेरी छाती फटी जाती है। मेरे पति महाप्रभु की आज्ञा से अवधूतवेष छोड़कर गृहस्‍थी बन गये। उन्‍हें इतनी कठोरता अभीष्‍ट नहीं थी। मेरे पति मुझसे अन्तिम समय में कह गये थे, शरीर को कष्‍ट देना ठीक नहीं है। बहुत कठोरता काम की नहीं होती।’

धीरे-धीरे आँखों में आंसू भरकर प्रिया जी ने कहा– ‘बहिन ! तुम अपने पति की आज्ञा का पालन करो। मेरे पति तो भिक्षुक बनकर, भिक्षा पर निर्वाह करके, स्त्रियों के स्‍पर्श से दूर रहकर घोर तपस्‍वी की तरह जीवन भर रहे। उन्‍होंने अपने शरीर को कभी सुख नहीं पहुँचाया। मैं तो जितना बन सकेगा, शरीर को सुखाऊँगी’। 
इतना कहते-कहते प्रिया जी रुदन करने लगीं।इसके अनन्तर उन्‍होंने जाकर सीता देवी के पैर छुए। सीता माता ने उनके हाथ पकड़ते हुए कहा– ‘तुम गौरांग की गृहिणी हो, जगन्‍माता हो, तुम मेरे पैर मत छुआ।’ 
विष्‍णुप्रिया जी अधीर होकर वृद्धा सीता माता की गोद में लुढ़क गयीं। सीता माता ने उनके सिर को गोदी में रखते हुए कहा– ‘इस कमलवदन को देखकर ही मैं गौरांग के दु:ख को भूल जाती हूँ। विष्‍णुप्रिये ! तुम इतनी कठोरता मत करो। मेरे वृद्ध पति तुम्‍हारे इस कठोर व्रत से सदा खिन्‍न-से रहते हैं।’ विष्‍णुप्रिया जी के दोनों कमल के समान बड़े-बड़े नेत्रों से निरन्‍तर अश्रु निकल रहे थे। सीता माता उन्‍हें अपने अंचल से पोंछ देतीं और उसी क्षण वे फिर भर आते। सीता देवी के वस्‍त्र भीग गये, किन्‍तु विष्‍णुप्रिया जी के नेत्रों का जल न रुका। रोते-रोते उन्‍होंने सबसे विदा ली। जाह्नवी देवी ने पूछा– ‘बहिन ! अब कब भेंट होगी?’
अपने आंसुओं से जाह्नवी देवी के वक्ष:स्‍थल को भिगोती हुई विष्‍णुप्रिया जी ने कहा– ‘अब मिलना क्‍या? जब दैव की इच्‍छा होगी।’ इतना कहते-कहते प्रिया जी ने रोते-रोते जाह्नवी देवी का और वसुमती देवी का आलिंगन किया, सीतामाता के पैर छुए और वे घर को चली आयीं। अब विष्‍णुप्रिया जी का वियोग दिनों दिन अधिकाधिक बढ़ने लगा। अब वे दिन रात रोती ही रहती थीं। कांचना उन्‍हें श्री चैतन्‍य लीलाएँ सुना-सुनाकर सान्‍त्‍वना प्रदान करती रहती, किन्‍तु विष्‍णुप्रिया जी का हृदय अपने पति के पास पतिलोक में जाने के लिये तड़प रहा था। इसलिये रात-दिन उनके नेत्रों से अश्रुधारा ही प्रवाहित होती रहती।

फाल्‍गुनी पूर्णिमा थी, चैतन्‍यदेव के जन्‍म का दिवस था। विष्‍णुप्रिया जी की अधीरता आज अन्‍य दिनों की अपेक्षा अत्‍यधिक बढ़ गयी थी। वे पगली की तरह हा प्राणनाथ ! हा हृदयरमण ! हा जीवनसर्वस्‍व कहकर लम्‍बी-लम्‍बी सांसें छोड़ती थीं। कांचना उनकी दशा देखकर चैतन्‍य–चरित्र सुना-सुनाकर सान्‍त्‍वना देने लगी किन्‍तु आज वे शान्‍त होती ही नहीं थीं, थोड़ी देर के पश्‍चात् उन्‍होंने कहा– ‘कांचने ! तू यादव को तो बुला ला, आज मैं उनकी मूर्ति के भीतर से दर्शन करना चाहती हूँ।’ कांचना ने उसी समय आज्ञा का पालन किया। वह जल्‍दी से यादवाचार्य गोस्‍वामी को बुला लायी। आचार्य ने मन्दिर के कपाट खोले। लंबी-लंबी सांस लेती हुई वस्‍त्र से शरीर ढककर विष्‍णुप्रिया जी ने मन्दिर में प्रवेश किया और थोड़ी देर एकान्‍त में रहने की इच्‍छा से किवाड़ बंद करा दिये। यादवाचार्य ने किवाड़ बंद कर दिये। कांचाना द्वार पर खड़ी रही। जब बहुत देर हो गयी तब कांचना ने व्‍यग्रता के साथ आचार्य से किवाड़ खोलने को कहा। आचार्य ने डरते डरते किवाड़ खोले। बस, अब वहाँ क्‍या था, श्री विष्‍णुप्रिया जी तो अपने पति के साथ एकीभूत हो गयीं। उसके पश्‍चात फिर किसी को श्री विष्‍णुप्रिया जी के इस भौतिक शरीर के दर्शन नहीं हुए। मन्दिर को शून्‍य देखकर कांचना चीत्‍कार मारकर बेहोश होकर गिर पड़ी, सभी भक्‍त हाहाकार करने लगे। हा गौर ! हा विष्‍णुप्रिये ! की करुणा भरी ध्‍वनि से दिशा-विदिशाएं भर गयीं। भक्‍तों के करुणाक्रन्‍दन से आकाश मण्‍डल गूँजने लगा।
क्रमशः

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