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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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श्री श्री निवासाचार्य जी….

आचार्य श्री निवास जी के पूजनीय पितृदेव श्री चैतन्‍यदास बर्दवान जिले के अन्‍तर्गत चाकन्‍दी नामक ग्राम में रहते थे। वे श्री चैतन्‍यदेव के अनन्‍य भक्‍तों में से थे। असल में उनका नाम तो था गंगाधर भट्टाचार्य, किन्‍तु श्री चैतन्‍य के प्रेम-बाहुल्‍य के कारण लोग इन्‍हें ‘चैतन्‍यदास’ कहने लगे थे।महाप्रभु जब गृह त्‍यागकर कटवा में केशव भारती के स्‍थान पर संन्‍यास-दीक्षा लेने आये, तब वहाँ उनके दर्शनों के लिये बहुत से आदमी आये हुए थे। उन आगत मनुष्‍यों में से भट्टाचार्य गंगाधरजी भी थे। उन्‍होंने यह हृदयविदारक दृश्‍य अपनी आँखों से देखा था। बस, उसी शोक में ये पागलों की तरह हा चैतन्‍य ! हा चैतन्‍य ! कहकर फिरने लगे, तभी से वे चैतन्‍यदास के नाम से पुकारे जाने लगे !

ईश्‍वर की इच्‍छा बडी ही प्रबल होती है। वृद्धावस्‍था में चैतन्‍यदास जी को सन्‍तान का मुख देखने की इच्‍छा हुई। विवाह तो इनका बहुत पहले ही हो चुका था, इनकी धर्म पत्‍नी श्री लक्ष्‍मीप्रिया जी बड़ी ही पतिपरायणा सती-साध्‍वी नारी थीं। वे अपने पति को संसारी विषयों से विरक्‍त देखकर खिन्‍न नहीं होती थीं। पति की प्रसन्‍नता में ही ये अपनी प्रसन्‍नता समझतीं। इस वृद्धावस्‍था में दम्‍पत्ति को पुत्र-दर्शन की लालसा हुई। दोनों ही पति-पत्‍नी पुरी में महाप्रभु के दर्शनों के लिये गये। महाप्रभु ने आशीर्वाद दिया कि ‘तुम्‍हारे जो पुत्र होगा, उसमें हमारी शक्ति का अंश रहेगा, वह हमारा ही दूसरा विग्रह होगा।’ महाप्रभु का वरदान अन्‍यथा थोड़ी ही हो सकता था। इसके दूसरे वर्ष लक्ष्‍मीप्रिया जी ने चाकन्‍दी में एक पुत्ररत्‍न प्रसव किया। माता-पिता ने उसका नाम रखा श्रीनिवास। वे ही श्रीनिवास आगे चलकर श्रीनिवासाचार्य के नाम से भक्‍तों में अत्‍यधिक प्रसिद्ध हुए।

श्री निवास बाल्‍यकाल से ही बुद्धिमान, सुशील, सौम्‍य और मेधावी प्रतीत होते थे। सत्रह-अठारह वर्ष की अल्‍पावस्‍था में ही ये व्‍याकरण, काव्‍य तथा अलंकार-शास्‍त्रों में पारंगत हो गये थे। इनकी ननसाल जाजिग्राम में थी, इनके नाना श्री बलरामाचार्य भी परम भक्‍त और सच्‍चे वैष्णव थे। इनकी माता तो बड़ी पतिपरायणा और चैतन्‍य-चरणों में श्रद्धा रखने वाली थीं। बाल्‍यकाल से ही उसने अपने प्रिय पुत्र श्री निवास को चैतन्‍य लीलाएं कण्‍ठस्‍थ करा दी थीं। बच्‍चे के हृदय में बाल्‍यकाल की जमी हुई छाप सदा के लिये अमिट-सी हो जाती है। श्री निवास के हृदय में भी चैतन्‍य की मनमोहिनी मूर्ति समा गयी। वे चैतन्‍य–चरणों के दर्शनों के लिये छटपटाने लगे।

एक दिन ये अपनी ननसाल जाजि ग्राम को जा रहे थे, रास्‍ते में श्रीहट्ट-निवासी श्री नरहरि सरकार से इनकी भेंट हो गयी। सरकार महाशय महाप्रभु के अनन्‍य भक्त थे और गौर-भक्‍तों में वे ‘सरकार ठाकुर’ के नाम से प्रसिद्ध थे। पण्डित गोस्‍वामी के ये अत्‍यन्‍त ही कृपापात्र थे। वे इनके ऊपर बहुत प्‍यार करते थे। श्री निवास जी ने सरकार ठाकुर की ख्‍याति तो सुन रखी थी, किन्‍तु उनके दर्शन का सौभाग्‍य उन्‍हें आज तक कभी प्राप्‍त नहीं हुआ था। इधर ठाकुर सरकार ने भी बालक श्री निवास की असाधारण प्रतिभा और प्रभु परायणता की प्रशंसा सुन रखी थी और वे उस होनहार बालक को देखने के लिये लालायित भी थे। सहसा दोनों की रास्‍ते में भेंट हो गयी। श्री निवास जी ने श्रद्धा-भक्ति के सहित सरकार ठाकुर के चरणों में प्रणाम किया और सरकार ठाकुर ने इन्‍हें प्रेमालिंगन प्रदान करके प्रभु-प्रेमप्राप्ति का आशीर्वाद दिया। उन महापुरुष का आशीर्वाद पाकर श्रीनिवास अपनी ननसाल होकर लौट आये और अपने पिता से महाप्रभु की लीलाओं को बड़े ही चाव से सुनन लगे। उन्‍होंने एक-एक करके प्रभु के सभी अन्‍तरंग भक्‍तों के संक्षिप्‍त चरित्र जान लिये।
काल की गति विचित्र होती है, चैतन्‍यदास जी को ज्‍वर आने लगा और उसी ज्‍वर में वे इस असार संसार को त्‍यागकर वैकुण्‍ठवासी बन गये।श्रीनिवास अब पितृहीन हो गये। लक्ष्‍मीप्रिया पति के शोक में दिन-रात रोने लगी।

श्री निवास जी के नाना श्री बलरामाचार्य के कोई सन्‍तान नहीं थी, ये ही उनकी सम्‍पूर्ण सम्‍पत्ति के एकमात्र उत्‍तराधिकारी थे, अत: ये अपनी माता को लेकर जाजि ग्राम में जाकर रहने लगे। इनकी बार-बार इच्‍छा होती थी कि सब कुछ छोड़-छाड़कर श्री चैतन्‍य-चरणों की ही शरण लें, किन्‍तु स्‍नेहमयी माता के बन्‍धन के कारण वे ऐसा कर नहीं सकते थे, किन्‍तु एक बार पुरी चलकर उनके दर्शनों से तो इन नेत्रों को कृतार्थ कर लें यह उनकी प्रबल वासना थी। जाजि ग्राम की भक्‍त-मण्‍डली में इनका अत्‍यधिक आदर था। इस अल्‍पावस्‍था में ही इनकी ख्‍याति दूर-दूर तक फैल गयी थी। अत: इन्‍होंने अपनी इच्‍छा सरकार ठाकुर पर प्रकट की। सरकार ठाकुर ने प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- ‘तुम पुरी जाकर श्रीचैतन्‍य-चरणों के दर्शन अवश्‍य करो। मैं तुम्‍हारे साथ एक आदमी किये देता हूँ।’ यह कहकर उन्‍होंने एक आदमी इनके साथ कर दिया और ये उसके साथ पुरी की ओर चल पड़े।
श्री चैतन्य देव के प्रेम में विभोर हुए ये अनेक बातें सोचते जाते थे कि ‘श्री चैतन्‍यचरणों में जाकर यों प्रणत हूँगा, यों उनके प्रति अपना भक्ति-भाव प्रकट करूँगा। एक दिन स्‍वयं उन्‍हें अपने हाथों से बनाकर भिक्षा कराऊँगा।’ श्री चैतन्‍य–चरणों के दर्शनों की उत्‍कट उत्‍कण्‍ठा के कारण ही उनके मन में ऐसे भाव उठ रहे थे कि रास्‍ते में उन्‍होंने एक बडा ही हृदयविदारक समाचार सुना। ‘जिनके दर्शनों की लालसा से हम पुरी जा रहे हैं, वे तो अपनी लीला को संवरण कर चुके। चैतन्‍यदेव इस नश्‍वर शरीर को छोड़कर अपने नित्‍य–धाम को चले गये। इस समाचार को सुनते ही इनका हृदय फट गया, वे मूर्च्छित होकर पृथ्‍वी पर गिर पड़े। बड़ी देर के पश्‍चात इन्‍हें होश आया तब दु:खित मन से श्री चैतन्‍य की लीला स्‍थली के दर्शनों के ही निमित्त वे रोते-रोते आगे बढ़े।पुरी में जाकर उन्‍होंने देखा वह भरी-पूरी नगरी गौरांग के बिना श्री हीन तथा विधवा स्‍त्री की भाँति निरानन्‍दपूर्ण बनी हुई है। सभी गौर-भक्‍त गौर‍-विरह में तप्‍त मछली की भाँति तड़प रहे हैं। गौर ने स्‍वप्‍न में ही इन्‍हें गदाधार पण्डित के पास जाने का आदेश दे दिया था।पण्डित गोस्‍वामी की ख्‍याति ये पहले से ही सुनते रहते थे। पुरी में ये गदाधर गोस्‍वामी का पता पूछते-पूछते उनके आश्रम में पहुँचे।
क्रमशः

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