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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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वहाँ उन्होंने विरह-वेदना में बेचैन बैठे हुए पण्डित गोस्वामी को देखा। पण्डित गोस्वामी चैतन्य–विरह में विक्षिप्त-से हो गये थे। उनके दोनों नेत्रों से सतत अश्रु प्रवाहित हो रहे थे। श्री निवास जी ‘हा चैतन्य !’ कहते-कहते उनके चरणों में गिर पड़े। आंसुओं के भरे रहने के कारण पण्डित गोस्वामी श्री निवास जी को देख नहीं सके। उन्होंने अत्यन्त ही करुणस्वर में कहा– ‘भैया ! तुम कौन हो ? इस सुमधुर नाम को सुनाकर तुमने मेरे शिथिल अंगों में पुन: शक्ति का संचार-सा कर दिया है। आज मेरे हृदय में तुम्हारे इन सुमधुर वाक्यों से बडी शान्ति-सी प्रतीत हो रही है। तुम श्री निवास तो नहीं हो ? दोनों हाथों की अंजलि बांधे हुए श्री निवास जी ने कहा– ‘प्रभो! इस अधम भाग्यहीन का ही नाम श्री निवास है। स्वामिन ! इस दीन-हीन कंगाल का नाम आपको याद है, प्रभो ! मैं बड़ा हतभागी हूँ कि इस जीवन में श्री चैतन्य-चरणों के साक्षात दर्शन न कर सका। महाप्रभु यदि स्वप्न में मुझे आदेश न देते तो मैं उसी क्षण अपने प्राणों को विसर्जन करने का संकल्प कर चुका था। चैतन्य–चरणों के दर्शन बिना इस जीवन से क्या लाभ ?’
पण्डित गोस्वामी ने उठकर श्री निवास जी का आलिंगन किया और उनके कोमल अंग पर अपना शीतल प्रेममय करकमल धीरे धीरे फिराने लगे। उनके प्रेम-स्पर्श से श्रीनिवास जी का सम्पूर्ण शरीर पुलकित हो उठा। तब अधीरता के साथ पण्डित गोस्वामी ने करुणकण्ठ से कहा– ‘श्रीनिवास ! अब मैं भी अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकता। गौर के विरह में मेरे प्राण तड़प रहे हैं। मैं तो उसी दिन समुद्र में कूदकर इन प्राणों का अन्त कर देता, किन्तु प्रभु की आज्ञा थी कि मैं तुम्हें श्रीमद्भागवत पढ़ाऊँ। मेरी स्थिति अब पढाने योग्य तो रही नहीं, किन्तु महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य है। प्रभु तुम्हें वृन्दावन में जाकर रूप-सनातन के ग्रन्थों का अध्ययन करने के लिये आदेश दे गये हैं। वे तुम्हारे द्वारा गौड़ देश में भक्ति का प्रचार करना चाहते हैं। तुम अब आ गये, लाओ मैं प्रभु की आज्ञा का पालन करूँ। इससे पहले तुम पुरी के सभी प्रसिद्ध-प्रसिद्ध गौर-भक्तों के दर्शन कर आओ।’
पण्डित गोस्वामी ने अपना एक आदमी श्री निवास जी के साथ कर दिया। उसके साथ वे श्री जगन्नाथ जी के दर्शन करते हुए सार्वभौम भट्टाचार्य, राय रामानन्द आदि भक्तों के दर्शनों के लिये गये और उन सबकी चरण-वन्दना करके इन्होंने अपना परिचय दिया। सभी ने इनके ऊपर पुत्र की भाँति स्नेह प्रकट किया। इस सबसे विदा होकर फिर ये भक्त हरिदास जी की समाधि के दर्शनों के लिये गये। वहाँ हरिदास जी की नामनिष्ठा और उनकी सहिष्णुता का स्मरण करके ये मूर्च्छित हो गये और घंटों वहाँ की धूलि में लोटते-लोटते अश्रुविमोचन करते रहे। श्री चैतन्य की सभी लीला स्थलियों के दर्शन करके ये पुन: पण्डित गोस्वामी के समीप लौट आये। तब गदाधर जी ने इन्हें महाप्रसाद का भोजन कराया। भोजन के अनन्तर स्वस्थ होने पर इन्होंने श्रीमद्भागवत के पाठ की जिज्ञासा की।
गदाधर गोस्वामी के नेत्रों से जल निरन्तर बह रहा था। खाते-पीते, पढ़ते-लिखते हर समय उनका अश्रुप्रवाह जारी ही रहता। वे बड़े कष्ट से पोथी को श्री निवास जी को देकर पढ़ने लगे। श्री निवास जी ने देखा पोथी का एक भी अक्षर ठीक-ठीक नहीं पढ़ा जाता। सभी पृष्ठ पण्डित गोस्वामी के नेत्रों के जल से भीगे हुए हैं। निरन्तर के अश्रुप्रवाह से पोथी के सभी अक्षर मिटकर पृष्ठ काले रंग के बन गये हैं। श्री निवास जी ने उसे पढ़ने में अपनी असमर्थता प्रकट की।तब गदाधर गोस्वामी ने कहा– ‘श्री निवास ! अब मेरे जीने की तुम विशेष आशा मत रखो। संसार मुझे सूना-सूना दीखता है। हाय ! जहाँ गौर नहीं, वहाँ मैं कैसे रह सकूँगा। मेरे प्राण गौर-दर्शन के लिये लालायित हो रहे हैं। यदि तुम पढना ही चाहते हो तो आज ही तुम गौड़ चले जाओ। नरहरि सरकार के पास मेरे हाथ की लिखी हुई एक नयी पोथी है, उसे ले आओ। बहुत सम्भव है मैं तुम्हें पढ़ा सकूँ। श्री निवास जी समझ गये कि पण्डित गोस्वामी का शरीर अब अधिक दिन तक नहीं टिक सकता। वे उसी समय सरकार ठाकुर के समीप से पोथी लाने के लिये चल पड़े। श्रीहट्ट में आकर उन्होंने सभी वृत्तान्त सरकार ठाकुर से कहा और वे जल्दी से पोथी लेकर पुरी के लिये चल दिये।अभी वे पुरी के आधे ही मार्ग में पहुँचे थे कि उन्हें यह हृदय को हिला देने वाला दूसरा समाचार मिला कि पण्डित गोस्वामी ने गौर-विरह की अग्नि में अपने शरीर को जला दिया, वे इस संसार को छोड़कर गौर के समीप पहुँच गये। दु:खित श्री निवास के कलेजे में सैकड़ों बर्छियों के लगने से जितना घाव होता है, उससे भी बड़ा घाव हो गया। वे रो-रोकर भूमि पर लोटने लगे। ‘हाय ! उन महापुरुष से मैं श्रीमद्भागवत भी न पढ़ सका। अब पुरी जाना व्यर्थ है।’
यह सोचकर वे फिर गौड़ की ही ओर लौट पड़े। वहाँ पानीहाटी से कुछ दूर पर उन्होंने एक तीसरा हृदय विदारक समाचार सुना। एक मनुष्य ने कहा– ‘महाप्रभु के तिरोभाव के अनन्तर श्रीपाद नित्यानन्द जी की दशा विचित्र ही हो गयी थी। उन्होंने संकीर्तन में जाना एकदम बंद कर दिया था, वे खड़दह के अपने मकान में ही पड़े-पड़े– ‘हा गौर ! हा गौर !’ कहकर सदा रुदन किया करते थे। कभी कभी कीर्तन के लिये उठते तो क्षणभर में ही मूर्च्छित होकर गिर पड़ते और घंटों में जाकर होश में आते। सभी भक्त उनकी मनोव्यथा को समझते थे, इसलिये कोई उनसे संकीर्तन में चलने का आग्रह नहीं करता था। एक दिन वे श्यामसुन्दर के मन्दिर में भक्तों के साथ संकीर्तन कर रहे थे, संकीर्तन करते-करते ही वे अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े। यह उनकी अचेतना अन्तिम ही थी। भक्तों ने भाँति-भाँति के यत्न किये किन्तु फिर वे सचेत नहीं हुए। वे गौरधाम में जाकर अपने भाई निमाई के साथ मिल गये।’
श्री निवास जी के ऊपर मानो वज्र गिर पड़ा हो, वे खिन्न चित्त से क्रन्दन करते-करते सरकार ठाकुर के समीप पहुँचे और रो-रोकर सभी समाचार सुनाने लगे। भक्तिभवन के इन प्रधान स्तम्भों के टूट जाने से भक्तों को अपार दु:ख हुआ।क्रमशः
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