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श्री श्री चैतन्य चरितावली
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सरकार ठाकुर बच्चों की तरह दहाड़े मारकर रुदन करने लगे। श्री निवास जी के दोनों नेत्र रुदन करते-करते फूल गये थे। वे कण्ठ रुंध जाने के कारण कुछ कह भी नहीं सकते थे। सरकार ठाकुर ने इन्हें कई दिनों तक अपने ही यहाँ रखा। इसके अनन्तर वे घर नहीं गये। अब उनकी इच्छा श्री चैतन्य की क्रीड़ा-भूमि के दर्शनों की हुई। वे उसी समय सरकार ठाकुर से विदा होकर नवद्वीप में आये। उन दिनों विष्णुप्रिया देवी जी घोर तपस्यामय जीवन बिता रही थीं। वे किसी से भी बातें नहीं करती थीं, किन्तु उन्हें स्वप्न में श्री गौरांग का आदेश हुआ कि ‘श्री निवास हमारा ही अंश है, इससे मिलने में कोई क्षति नहीं। इसके ऊपर तुम कृपा करो।’ तब उन्होंने श्री निवास जी को स्वयं बुलाया। वे इस छोटे बालक के ऐसे त्याग, वैराग्य, प्रेम और रूप-लावण्य को देखकर बड़ी ही प्रसन्न हुईं। प्रिया जी ने उनके ऊपर परम कृपा प्रदर्शित की। इनसे बातें कीं, इनके मस्तक पर अपना पैर रखा और अपने घर के बाहरी दालान में इन्हें कई दिनों तक रखा।
जगन्माता विष्णुप्रिया जी से विदा होकर ये शान्तिपुर में अद्वैताचार्य की जन्मभूमि को देखने गये। वहाँ से नित्यानन्द जी के घर खड़हद में पहुँचे। वहाँ अवधूत की पत्नी श्रीमती जाह्नवी देवी ने इन पर अपार प्रेम प्रदर्शित किया और कई दिनों तक अपने घर में इन्हें रखा। उन दोनों माताओं की चरण-वन्दना करके ये खानाकुल कृष्णनगर के गोस्वामी अभिरामदास जी के दर्शनों को गये। उन्होंने ही इन्हें वृन्दावन में जाकर भक्ति ग्रन्थों के अध्ययन करने की अनुमति दी। उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके ये अपनी माता से आज्ञा लेकर काशी-प्रयाग होते हुए वृन्दावन पहुँचे। वहाँ जीव गोस्वामी ने इनका बडा सत्कार किया। उन्होंने ही गोपालभट्ट से इन्हें मंत्र-दीक्षा दिलायी। ये वृन्दावन में ही रहकर श्रीरूप और सनातन आदि गोस्वामियों के बनाये हुए भक्ति-शास्त्रों का अध्ययन करने लगे। वहाँ इनकी नरोत्तमदास जी तथा श्यामानन्द जी के साथ भेंट हुई और उन्हीं के साथ ये गोस्वामियों के ग्रन्थों का अध्ययन करने लगे।
श्री जीव गोस्वामी जी ने जब समझ लिया कि ये तीनों ही योग्य बन गये हैं, तीनों ही तेजस्वी, मेधावी और प्रभावशाली हैं, तब इन्हें गौड़देश में भक्तितत्व का प्रचार करने के निमित्त भेजा। नरोत्तमदास जी को ‘ठाकुर’ की उपाधि दी और श्री निवास जी को आचार्य की। भक्ति-ग्रन्थों के बिना भक्ति-मार्ग का यथाविधि प्रचार हो नहीं सकता। अत: जीव गोस्वामी ने बहुत से ग्रन्थें को मोमजामें के कपडों में बंधवा-बंधवाकर तथा कई सुरक्षित संदूकों में बंद कराकर एक बैलगाड़ी में लादकर इनके साथ भेजा। रक्षा के लिये साथ में दस अस्त्रधारी सिपाही भी कर दिये। तीनों ही तेजस्वी युवक अपने आचार्यों तथा भक्तों के चरणों में प्रणाम करके काशी-प्रयाग होते हुए गौड़देश की ओर जाने लगे।रास्ते में बाँकुडा जिले के अन्तर्गत वन विष्णुपुर नाम की एक छोटी-सी राजधानी पडती है, वहाँ पहुँचकर डाकुओं ने इनकी सभी संदूकें छीन लीं और सभी को मार भगाया। इस बात से सभी को अपार कष्ट हुआ। असल में उस राज्य के शासक राजा वीरहम्मीर ही डाकुओं को उत्साहित कर दिया करते थे और उस गाड़ी को भी धन समझकर उन्होंने ही लुटवा लिया था। पुस्तकों के लुट जाने से दु:खी होकर श्री निवास जी ने श्यामानन्द जी से और नरोत्तम ठाकुर से कहा– ‘आप लोग अपने-अपने स्थानों को जाइये और आचार्य चरणों की आज्ञा को शिरोधार्य करके भक्तिमार्ग का प्रचार कीजिये। मैं या तो पुस्तकों को प्राप्त करके लौटूँगा या यहीं कहीं प्राण गँवा दूँगा।’ बहुत कहने-सुनने पर वे दोनों आगे के लिये चले गये। श्रीनिवास जी वनविष्णुपुर में घूम-घूमकर पुस्तकों की खोज करने लगे। दैवसंयोग से उनका राजसभा में प्रवेश हो गया। राजा वीरहम्मीर श्रीमद्भागवत के बड़े प्रेमी थे, उनकी सभा में रोज कथा होती थी।
एक दिन कथावाचक राज-पण्डित को अशुद्ध अर्थ करते देखकर इन्होंने उसे टोका, तब राजा ने कुतूहल के साथ इनके मैले-कुचैले वस्त्रों को देखकर इन्हीं से अर्थ करने को कहा। बस, फिर क्या था, वे धारा प्रवाहरूप से एक ही श्लोक के नाना भाँति से युक्ति और शास्त्र प्रमाण द्वारा विलक्षण-विलक्षण अर्थ करने लगे। इनके ऐसे प्रकाण्ड पाण्डित्य को देखकर सभी श्रोता मंत्रमुग्ध से बन गये। राजा ने इनके चरणों में प्रणाम किया। पूछने पर इन्होंने अपना सभी वृत्तान्त सुनाया। तब डबडबाई आँखों से राजा इन्हें भीतर ले गया और इनके पैरों में पड़कर कहने लगा– ‘आपका वह पुस्तकों को लूटने वाला डाकू मैं ही हूँ। ये आपकी पुस्तकें ज्यों की त्यों ही रखी हैं।’
श्री जीव गोस्वामी की दी हुई सभी वस्तुओं को सुरक्षित पाकर ये प्रेम में गद्गद होकर अश्रुविमोचन करने लगे। इन्होंने श्रद्धा-भक्ति के साथ उन पुस्तकों को प्रणाम किया और अपने परिश्रम को सफल हुआ समझकर अत्यन्त ही प्रसन्न हो गये। उसी दिन से राजा ने वह कुत्सित कर्म एकदम त्याग दिया और वह इनका मंत्र शिष्य बन गया।वन विष्णुपुर के राजा का उद्धार करके फिर ये जाजिग्राम में अपनी माता के दर्शनों के लिये आये। बहुत दिनों पश्चात अपने प्यारे पुत्र को पाकर स्नेहमयी माता की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा, वह प्रेम में गद्गद कण्ठ से रुदन करने लगी। आचार्य श्री निवास अब वहीं रहकर भक्तिमार्ग का प्रचार करने लगे। उनकी वाणी में आकर्षण था, चेहरे पर तेज था, सभी वैष्णव इनका अत्यधिक आदर करते थे। वैष्णवसमाज के ये सम्माननीय अग्रणी समझे जाते थे। उनचास वर्ष की अवस्था में इन्होंने अपना पहला विवाह किया और कुछ दिनों बाद दूसरा विवाह भी कर लिया। इस प्रकार दो विवाह करने पर भी ये विरक्तों की ही भाँति जीवन बिताने लगे। बीच में ये एक बार पुन: अपने गुरुदेव के दर्शनों के निमित्त वृन्दावन पधारे थे, तब तक इनके गुरु श्री गोपाल भट्ट का वैकुण्ठवास हो चुका था। कुद दिन वृन्दावन रहकर ये पुन: गौड़देश में आकर प्रचार कार्य करने लगे।वन विष्णुपुर के राजा ने इनके रहने के लिये अपने यहाँ एक पृथक भवन बनवा दिया था। ये कभी-कभी जाकर वहाँ भी रहते थे। अन्त में आप अपनी अवस्था का अन्त समझकर श्री वृन्दावनधाम को चले गये और वहाँ से लौटकर फिर गौड़देश में नहीं आये।
क्रमशः
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