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श्री श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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उन्‍होंने इन्‍हीं के आदेशानुसार श्री गौरांग महाप्रभु का एक बड़ा भारी मन्दिर बनवाया और उसमें श्री गौरांग और श्री विष्‍णुप्रिया जी की युगल मूर्तियों की स्‍थापना की गयी। इसके उपलक्ष्‍य में एक बड़ा भारी महामहोत्‍सव किया और बहुत दिनों तक निरन्‍तर कीर्तन-सत्‍संग होता रहा।नरोत्तम ठाकुर का प्रभाव उन दिनों बहुत ही अधिक था, बड़े-बड़े राजे-महाराजे इनके मंत्र-शिष्‍य थे। बड़े पण्डित इन्‍हें नि:संकोच भाव से साष्‍टांग प्रणाम करते। ये बँगला भाषा के सुकवि भी थे। इन्‍होंने गौरप्रेम में उन्‍मत्त होकर हजारों पदों की रचना की है। इनकी पदावलियों का वैष्‍णवसमाज में बड़ा आदर है। इन्‍होंने परमायु प्राप्‍त की थी। अन्‍त समय ये गंगा जी के किनारे गम्‍भीरा नामक ग्राम में अपने एक शिष्‍य गंगा नारायण पण्डित के यहाँ चले गये।

कार्तिक की कृष्‍णा पंचमी का दिन था। प्रात:काल ठाकुर महाशय अपने प्रिय शिष्‍य गंगानारायण पण्डित तथा रामकृष्‍ण के साथ गंगा-स्‍नान के निमित्‍त गये। वे कमर तक जल में चले गये और अपने शिष्‍यों से कहा– ‘हमारे शरीर को तो थोड़ा मलो।’ शिष्‍यों ने गुरुदेव की आज्ञा का पालन किया। देखते ही देखते ठाकुर महाशय का निर्जीव शरीर गंगामाता के सुशीतल जल में गिरकर अठखेलियां करने लगा। नरोत्‍तम ठाकुर इस असार संसार को त्‍यागकर अपने सत्‍य और नित्‍य लोक को चले गये। वैष्‍णवों के हाहाकार से गंगा का किनारा गूँजने लगा। गंगामाता का हृदय भी अपने लाडले पुत्र के शोक में उमड़ने लगा और वह भी अपनी मर्यादा को छोड़कर बढ़ने लगीं।

महाप्रभु के वृन्‍दावनस्‍थ छ: गोस्‍वामिगण….

महाप्रभु चैतन्य देव के छ: गोस्‍वामी अत्‍यन्‍त ही प्रसिद्ध हैं। उनके नाम (1) श्रीरूप, (2) श्रीसनातन, (3) श्री जीव, (4) श्री गोपालभट्ट, (5) श्री रघुनाथ भट्ट और (6) श्रीरघुनाथदास जी हैं। श्रीरूप और सनातन तो प्रभु की आज्ञा लेकर ही पुरी से वृन्‍दावन को गये थे, बस, तब से वे फिर गौड़देश में नहीं लौटे। श्रीजीव इनके छोटे भाई अनूप के प्रिय पुत्र थे। पूरा परिवार का परिवार ही विरक्‍त बन गया। दैवी परिवार था। जीव गोस्‍वामी या तो महाप्रभु के तिरोभाव होने के अनन्‍तर वृन्‍दावन पधारे होंगे या प्रभु के अप्रकट होने के कुद ही काल पहले। इनका प्रभु के साथ भेंट होने का वृत्तान्‍त कहीं नहीं मिलता। ये नित्‍यानन्‍द जी की आज्ञा लेकर ही वृन्‍दावन गये थे, इससे महाप्रभु का अभाव ही लक्षित होता है। रघुनाथ भट्ट को प्रभु ने स्‍वयं ही पुरी से भेजा था। गोपाल भट्ट जब छोटे थे, तभी प्रभु ने उनके घर दक्षिण की यात्रा में चातुर्मास बिताया था, इसके अनन्‍तर पुन: इनको प्रभु के दर्शन नहीं हुए। रघुनाथदास जी प्रभु के लीला संवरण करने के अनन्‍तर और स्‍वरूप गोस्‍वामी के परलोक-गमन के पश्‍चात वृन्‍दावन पधारे और फिर उन्‍होंने वृन्‍दावन की पावन भूमि छोड़कर कहीं एक पैर भी नहीं रखा। व्रज में ही वास करके उन्‍होंने अपनी शेष आयु व्‍यतीत की। इन सबका अत्‍यन्‍त ही संक्षेप में पृथक्-पृथक् वर्णन आगे करते हैं।

1– श्रीरूप जी गोस्‍वामी

श्री रूप जी और सनातन जी का परिचय पाठक पीछे प्राप्‍त कर चुके हैं। अनुमान से श्री रूप जी का जन्‍म संवत 1545 के लगभग बताया जाता है। ये अपने अग्रज श्री सनातन जी से साल-दो-साल छोटे ही थे किन्‍तु प्रभु के प्रथम कृपापात्र होने से ये वैष्‍णव-समाज में सनातन जी के बड़े भाई ही माने जाते हैं। रामकेलि में इन दोनों भाइयों की प्रभु से भेंट, रूप जी का प्रयाग में प्रभु से मिलन, पुरी में पुन: प्रभु के दर्शन नाटकों की रचना, प्रभु की आज्ञा से गौड़ देश होते हुए पुन: वृन्‍दावन में आकर निरन्‍तर निवास करते रहे। इनके वृन्‍दावन वास की दो चार घटनाएं सुनिये।

आप ब्रह्मकुण्‍ड के समीप निवास करते थे। एक दिन आप निराहार रहकर ही भजन कर रहे थे, भूख लग रही थी, किन्‍तु ये भजन को छोड़कर भिक्षा के लिये जाना नहीं चाहते थे, इतने ही में एक काले रंग का ग्‍वाले का छोकरा एक मिट्टी के पात्र में दुग्‍ध लेकर इनके पास आया और बोला– ‘लो बाबा ! इसे पी लो। भूखे भजन क्‍यों कर रहे हो, गांवों में जाकर भिक्षा क्‍यों नहीं कर आते।’ तुम्‍हें पता नहीं– भूखे भजन न होई, यह जानहिं सब कोई।

रूप जी ने वह दुग्‍ध पीया। उसमें अमृत से भी बढ़कर स्‍वाद निकला। तब तो वे समझ गये कि ‘सांवरे रंग का छोकरा वही छलिया वृन्‍दावन वासी है, वह अपने राज्‍य में किसी को भूख नहीं देख सकता।’ आश्‍चर्य की बात तो यह थी, जिस पात्र में वह छोकरा दुग्‍ध दे गया था, वह दिव्‍य पात्र पता नहीं अपने-आप ही कहाँ चला गया। इस समाचार को सुनकर श्रीसनातन जी दौड़े आये और उन्‍हें आलिंगन करके कहने लगे– ‘भैया ! यह मनमोहन बडा सुकुमार है, इसे कष्‍ट मत दिया करो। तुम स्‍वयं ही व्रजवासियों के घरों से टुकड़े माँग लाया करो।’ उस दिन से श्रीरूपजी मधुकरी भिक्षा नित्‍यप्रति करने जाने लगे।
एक दिन श्रीगोविन्‍ददेव जी ने इन्‍हें स्‍वप्‍न में आज्ञा दी कि ‘भैया ! मैं अमुक स्‍थान में जमीन के नीचे दबा हुआ पड़ा हूँ। एक गौ रोज मुझे अपने स्‍तनों से दूध पिला जाती है, तु उस गौ को ही लक्ष्‍य करके मुझे बाहर निकालो और मेरी पूजा प्रकट करो।’

प्रात:काल ये उठकर उसी स्‍थान पर पहुँचे। वहाँ उन्‍होंने देखा– ‘एक गौ वहाँ खड़ी है और उसके स्‍तनों में आप से आप ही दूध बहकर एक छिद्र में होकर नीचे जा रहा है।’ तब तो उनके आनन्‍द का ठिकाना नहीं रहा। ये उसी समय उस स्‍थान को खुदवाने लगे। उसमें से गोविन्‍द देव जी की मनमोहिनी मूर्ति निकली, उसे लेकर ये पूजा करने लगे। कालान्‍तर में जयपुर के महाराज मानसिंह जी ने गोविन्‍ददेव जी का लाल पत्‍थरों का एक बड़ा ही भव्‍य और विशाल मन्दिर बनवा दिया जो अद्यावधि श्रीवृन्‍दावन की शोभा बढ़ा रहा है। औरंगजेब के आक्रमण के भय से जयपुर के महाराज पीछे से यहाँ की श्रीमूर्ति को अपने यहाँ ले गये थे। पीछे फिर ‘नये गोविन्‍ददेव जी’ का नया मन्दिर बना, जिसमें गोविन्‍ददेव जी के साथ ही अगल-बगल में श्री चैतन्‍य देव और श्रीनित्‍यानन्‍द जी के विग्रह भी पीछे से स्‍थापित किये गये, जो अब भी विद्यमान हैं।
जब श्री रूप जी नन्‍द ग्राम में निवास करते थे, तब श्री सनातन जी एक दिन उनके स्‍थान पर उनसे मिलने गये।
क्रमशः

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