370

श्री श्री चैतन्य चरितावली 
370

इन्‍होंने अपने अग्रज को देखकर उनको अभिवादन किया और बैठने के लिये सुन्‍दर-सा आसन दिया। श्री रूप जी अपने भाई के लिये भोजन बनाने लगे। उन्‍होंने प्रत्‍यक्ष देखा कि भोजन का सभी सामान प्‍यारी जी ही जुटा रही हैं, सनातन जी को इससे बड़ा क्षोभ हुआ। वे चुपचाप बैठे देखते रहे। जब भोजन बनकर तैयार हो गया तो श्री रूप जी ने उसे भगवान के अर्पण किया, भगवान प्‍यारी जी के साथ प्रत्‍यक्ष होकर भोजन करने लगे। उनका जो उच्छिष्‍ट महाप्रसाद बचा उसका उन्‍होंने श्री सनातन जी को भोजन कराया। उसमें अमृत से भी बढ़कर दिव्‍य स्‍वाद था।

सनातन जी ने कहा– ‘भाई ! तुम बड़े भाग्‍यशाली हो, जो रोज प्‍यारी प्यारे के अधरामृत उच्छिष्‍ट अन्‍न का प्रसाद पाते हो, किन्‍तु सुकुमारी लाड़िली जी को तुम्‍हारे सामान जुटाने में कष्‍ट होता होगा, यही सोचकर मुझे दु:ख होता है।’ इतना कहकर श्री सनातन जी चले गये और उनका जो उच्छिष्‍ट महाप्रसाद शेष रहा उसको बड़ी ही रुचि और स्‍वाद के साथ श्री रूप जी ने पाया।

किसी काव्‍य में श्री रूप जी ने प्‍यारी जी की वेणी की काली नागिन से उपमा दी थी। यह सोचकर सनातन जी को बड़ा दु:ख हुआ कि भला प्‍यारी जी के अमृतपूर्ण आनन के समीप विषवाली काली नागिन का क्‍या काम? वे इसी चिन्‍ता में मग्‍न ही थे कि उन्‍हें सामने के कदम्‍ब के वृक्ष पर प्‍यारे के साथ प्‍यारी जी झूलती हुई दिखाई दीं। उनके सिर पर काले रंग की नागिन-सी लहरा रही थी, उनमें क्रूरता का काम नही, क्रोध और विष का नाम नहीं। वह तो परम सौम्‍या, प्रेमियों के मन को हरने वाली और चंचला-चपला बड़ी ही चित्त को अपनी ओर खींचने वाली नागिन थी। श्री सनातन जी को इससे बड़ी प्रसन्‍नता हुई और उनकी शंका का समाधान प्‍यारी जी ने स्‍वत: ही अपने दुर्लभ दर्शनों को देकर कर दिया। इस प्रकार इनके भक्ति और प्रेम के माहात्‍म्‍य की बहुत-सी कथाएं कही जाती हैं। ये सदा युगल माधुरी के रूप में छके-से रहते थे। अके-से, जके-से, भूले-से, भटके-से ये सदा वृन्‍दाविपिन की वनवीथियों में विचरण किया करते थे। इनका आहार था प्‍यारे-प्‍यारी की रूपसुधा का पान, बस, उसी के मद में ये सदा मस्‍त बने रहते। ये सदा प्रेम में मग्‍न रहकर नामजप करते रहते और शेष समय में भक्तिसम्‍बन्‍धी पुस्‍तकों का प्रणयन करते। इनके बनाये हुए भ‍क्तिभाव पूर्ण सोलह ग्रन्‍थ मिलते हैं-

(1) हंसदूत, (2) उद्धवसन्‍देश, (3) कृष्‍णजन्‍मतिथिविधि, (4) गणोद्देशदीपिका (5) स्‍तवमाला, (6) विदग्‍धमाधव, (7) ललितामाधव, (8) दानलीला, (9) दानकेलिकौमुदी, (10) भक्तिरसामृतसिन्‍धु, (11) उज्‍जवलनीलमणि, (12) मथुरामहात्म्‍य (13) आख्‍यातचन्द्रिका, (14) पद्यावली, (15) नाटकचन्द्रिका और (16) लघुभागवतामृत।

वृन्‍दावन में रहकर इन्‍होंने श्रीकृष्‍ण प्रेम का साकार रूप खड़ा करके दिखला दिया। ये सदा नाम संकीर्तन और पुस्‍तक प्रणयन में ही लगे रहते थे। ‘वृन्‍दावन की यात्रा’ नामक पुस्‍तक में इनके वैकुण्‍ठवास की तिथि संवत 1640 (ईस्‍वी सन 1563) की श्रावण शुक्‍ला द्वादशी लिखी है। इस प्रकार ये लगभग 74 वर्षों तक इस धराधाम पर विराजमान रहकर भक्तितत्‍व का प्रकाश करते रहे।

2- श्री सनातन जी गोस्‍वामी

श्री सनातन जी का जन्‍म संवत 1544 के लगभग अनुमान किया जाता है, इनके कारावास का वृत्तान्‍त, उससे मुक्तिलाभ करके प्रयाग में आगमन, प्रभु के पादपद्मों में रहकर शास्‍त्रीय शिक्षा का श्रवण, वृन्‍दावन-गमन, पुन: लौटकर पुरी में आगमन, शरीर में भयंकर खुजली का हो जाना, श्री जगन्‍नाथ जी के रथ के नीचे प्राण त्‍यागने का निश्‍चय, प्रभु की आज्ञा से वृन्‍दावन में जाकर भजन और पुस्‍तक प्रणयन करते रहने का वृत्तान्‍त तो पाठक पीछे पढ़ ही चुके होंगे, अब इनके सम्‍बन्‍धन की भी वृन्‍दावन की दो चार घटनाएं सुनिये।

एक दिन ये श्री यमुना जी स्‍नान करने के निमित्त जा रहे थे, रास्‍ते में एक पारस पत्‍थर का टुकडा इन्‍हें पड़ा हुआ मिला। इन्‍होंने उसे वहीं धूलि से ढक दिया। दैवात उसी दिन एक ब्राह्मण उनके पास आकर धन की याचना करने लगा। इन्‍होंने बहुत कहा– ‘भाई ! हम भिक्षुक हैं, मांगकर टुकड़े खाते हैं, भला हमारे पास धन कहाँ है, किसी धनी सेठ साहूकार के समीप जाओ।’ किन्‍तु वह मानता ही नहीं था। उसने कहा– ‘श्रीमहाराज ! मैंने धन की कामना से ही अनेकों वर्षों तक शिव की आराधना की, इसलिये शिव जी ने सन्‍तुष्‍ट होकर रात्रि के समय स्‍वप्‍न में मुझसे कहा– ‘हे ब्राह्मण ! तू जिस इच्‍छा से मेरा पूजन करता है, वह इच्‍छा तेरी वृन्‍दावन में सनातन गोस्‍वामी के समीप जाने से पूर्ण होगी। बस, उन्‍हीं के स्‍वप्‍न से मैं आपकी शरण आया हूँ’। इस पर सनातन जी को उस पारस पत्‍थर की याद आ गयी। उन्‍होंने कहा– ‘अच्‍छी बात है, मेरे साथ यमुना जी चलो। यह कहकर ये उसे यमुना किनारे ले गये। दूर से ही अँगुली के इशारे से इन्‍होंने उसे पारस की जगह बता दी। उसने बहुत ढूँढा, किन्‍तु पारस नहीं मिला। तब तो उसने कहा– ‘आप मेरी वंचना न कीजिये, यदि हो तो आप ही ढूँढकर दे दीजिये।’

इन्‍होंने कहा– ‘भाई ! इसमें वंचना की बात ही क्‍या है, मैं तो उसका स्‍पर्श नहीं कर सकता, तुम धैर्य के साथ ढूँढो, यहीं मिल जायगा ! ब्राह्मण ढूँढने लगा, सहसा उसे पारस का टुकड़ा मिल गया। उसी समय उसने एक लोहे के टुकड़े से उसे छुआकर उसकी परीक्षा की, देखते ही देखते लोहे का टुकड़ा सोना बन गया। ब्राह्मण प्रसन्‍न होकर अपने घर को चल दिया।’
वह आधे ही रास्‍ते में पहुँचा होगा कि उसका विचार एकदम बदल गया। उसने सोचा– ‘जो महापुरुष घर घर से टुकड़े मांगकर खाते हैं और संसार में इतनी अमूल्‍य समझी जाने वाली इस मणि को हाथ से स्‍पर्श नहीं करते, अवश्‍य ही उनके पास, इस असाधारण पत्‍थर से बढ़कर भी कोई वस्‍तु है। मैं तो उनसे उसी को प्राप्‍त करूँगा।इस पारस को देकर तो उन्‍होंने मुझे बहका दिया।’ 
यह सोचकर वह लौटकर फिर इनके समीप आया और चरणों में गिरकर रो-रोकर अपनी सभी मनोव्‍यथा सुनायी। उसके सच्‍चे वैराग्‍य को देखकर इन्‍होंने पारस को यमुना जी में फेंकवा दिया और उसे अमूल्‍य हरि नाम का उपदेश किया। जिससे कुछ काल में वह परम संत बन गया। किसी ने ठीक ही कहा है–

पारस में अरु संत में, संत अधिक कर मान।
वह लोहा सोना करै यह करै आपु समान।
क्रमशः

Comments

Popular posts from this blog

cc 201

362

cc 90