371
श्री श्री चैतन्य चरितावली
371-
ये मथुरा जी में मधुकरी करने के लिये एक चौबे के घर जाया करते थे। उस चौबे की स्त्री परम भक्ता और श्रीमदन मोहन भगवान की उपासिका थी। उसके घर बालभाव से श्री मदनमोहन भगवान विराजते थे। सनातन जी उनकी मूर्ति के दर्शनों से अत्यन्त ही प्रसन्न होते, असल में तो वे मदनमोहन जी के दर्शनों के ही लिये वहाँ जाते थे। उस चौबिन का एक छोटा सा बालक था। मदनमोहन भी बालक ही ठहरे। दोनों में खूब दोस्ती थी। मदन मोहन तो गँवार ग्वाले ही ठहरे। ये आचार विचार क्या जानें। उस चौबिन के लड़के के साथ ही एक पात्र में भोजन करते। सनातन जी को देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये मदनमोहन सरकार बड़े विचित्र हैं।
एक दिन ये मधुकरी लेने गये। चौबिन इन्हें भिक्षा देने लगी। इन्होंने आग्रह पूर्वक कहा– ‘माता ! यदि तुम मुझे कुछ देना चाहती हो तो इस बच्चे को उच्छिष्ट अन्न मुझे दे दो।’ चौबिन ने इनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और इन्हें वही मदन मोहन का उच्छिष्ट प्रसाद दे दिया। बस, फिर क्या था, इन्हें तो उस माखन चोर की लपलपाती जीभ से लगे हुए अन्न का चस्का लग गया, ये नित्यप्रति उसी उच्छिष्ट अन्न को लेने जाने लगे।
एक दिन स्वप्न में मदन मोहन जी ने कहा– ‘भाई ! शहर में तो हमें ऊब सी मालूम पडती है, तुम उस चौबिन से मुझे ले आओ, मैं तो जंगल में ही रहूँगा।’ ठीक उसी रात्रि को चौबिन को भी यही स्वप्न हुआ कि तू मुझे सनातन साधु को दे दे। दूसरे दिन ये गये और इन्होंने कहा– ‘माता जी ! मदन मोहन अब वन में रहना चाहते हैं, तुम्हारी क्या इच्छा है?’
कुछ प्रेम युक्त रोष के स्वर में चौबिन ने कहा– ‘साधु बाबा ! इसकी यह सब करतूत मुझे पहले से ही मालूम है। एक जगह रहना तो यह जानता ही नहीं, यह बड़ा निर्मोही है, कोई इसका सगा नहीं !’ भला, जिस यशोदा ने इसका लालन-पालन किया, खिला-पिलाकर इतना बड़ा किया, उसे भी बटाऊ की तरह छोड़कर चला गया।मुझसे भी कहता था– ‘मेरा यहाँ मन नहीं लगता।’ मैंने भी सोच लिया– ‘मन नहीं लगता तो मेरी बला से। जब तुझे ही मेरा मोह नहीं, तो मुझे भी तेरा मोह नहीं। भले ही तू साधू के साथ चला जा।’
ऐसा कहते-कहते आँखों में आंसू भरकर उसने मदन मोहन को सनातन जी के साथ कर दिया। ऊपर से तो वह ऐसी बातें कह रही थी, किन्तु उसका हृदय अपने मदन मोहन के विरह से तड़प रहा था। सनातन जी मदन मोहन को साथ लेकर यमुना के किनारे आये। अब मदन मोहन के रहने के लिये उन्होंने सूर्यघाट के समीप एक सुरम्य टीले पर फूँस की झोपड़ी बना ली और उसी में वे मदन मोहन जी की पूजा करने लगे। अब वे घर-घर से आटे की चुटकी मांग लाते और उसी की बिना नमक की मधुकरी बनाकर मदन मोहन को भोजन कराते।
एक दिन मदन मोहन ने मुँह बनाकर कहा– ‘साधु बाबा ! ये बिना नमक की बाटियाँ हमसे तो खायी नहीं जातीं। थोड़ा नमक भी किसी से मांग लाया करो।’
सनातन जी ने झुँझलाकर कहा– ‘यह इल्लत मुझसे मत लगाओ, खानी हो तो ऐसी ही खाओ, नहीं अपने घर का रास्ता पकड़ो।’
मदनमोहन सरकार ने कुछ हँसकर कहा– ‘एक कंकड़ी नमक को कौन मना करेगा, कहीं से ले आना मांगकर।’
दूसरे दिन ये आटे के साथ थोड़ा नमक भी लाने लगे। चटोरे मदन मोहन को तो मीठे माखन और मिश्री की चाट पड़ी हुई थी इसलिये एक दिन बड़ी ही दीनता से बोले– ‘साधु बाबा ! ये रूखे टिक्कड़ तो हमारे गले के नीचे नहीं उतरते। थोड़ा घी भी कहीं से लाया करो तो अच्छा है।’
अब सनातन जी मदन मोहन जी को खरी-खरी सुनाने लगे ! उन्होंने कहा– ‘देखो जी ! सुनो मेरी सच्ची बात।मेरे पास तो ये ही सूखे टिक्कड़ हैं, तुम्हें घी-चीनी की चाट थी तो किसी धनिक के यहाँ जाते, मुझ भिक्षुक के यहाँ तो ये ही सूखे टिक्कड़ मिलेंगे। तुम्हारे गले के नीचे उतरे चाहे न उतरे, मैं किसी धनिक के पास घी-बूरा मांगने नहीं जाऊँगा। थोड़े यमुना-जल के साथ सटक लिया करो। मिट्टी भी तो सटक जाते थे।’ बेचारे मदनमोहन अपना सा मुंह बनाये चुप हो गये। उस लँगोटीबंद साधु से वे और कह ही क्या सकते थे।
दूसरे दिन उन्होंने देखा, एक बड़ा भारी धनिक व्यापारी उनके समीप आ रहा है। ये बैठे भजन कर रहे थे, उसने दूर से ही इनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और बड़े ही करुणस्वर से कहने लगा– ‘महात्मा जी ! मेरा जहाज यमुना जी में अड़ गया है, ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि वह निकल जाय, मैं आपकी शरण में आया हूँ।’
इन्होंने कहा– ‘भाई ! मैं कुछ नहीं जानता, इस झोपड़ी में जो बैठा है, उससे कहो।’
व्यापारी ने भगवान मदनमोहन से प्रार्थना की– ‘हे भगवन ! यदि मेरा जहाज निकल जाय तो बिक्री के आधे द्रव्य से मैं आपकी सेवा करूँ।’ बस, फिर क्या था, जहाज उसी समय निकल गया। उन दिनों नादियों के द्वारा नाव से ही व्यापार होता था। रेल, तार और मोटर आदि यंत्र तो तब थे ही नहीं। महाजन का माल दुगुने दामों में बिका। उसी समय उसने हजारों रुपये लगाकर बड़ी उदारता के साथ मदनमोहन जी का मन्दिर बनवा दिया। और भगवान की सेवा के लिये पुजारी, रसोइया, नौकर-चाकर तथा और भी बहुत-से काम वाले रख दिये। वह वृन्दावन मन्दिर में अभी तक विद्यमान है।
इनकी ख्याति सुनने पर अकबर बादशाह इनके दर्शनों के लिये आया और इनसे कुछ सेवा के लिये प्रार्थना करने लगा। जब बहुत मना करने पर भी वह न माना तब इन्होंने अपने कुटिया के समीप के यमुना जी के फूटे हुए घाट के कोने को सुधरवाने की आज्ञा दी। उसी समय अकबर को वहाँ की सभी भूमि अमूल्य रत्नों से जटित दिखायी देने लगी। तब तो वह इनके पैरों में गिरकर कहने लगा– ‘प्रभो ! मेरे अपराध को क्षमा कीजिये, मेरा सम्पूर्ण राज्य भी यहाँ के एक रत्न के मूल्य के बराबर नहीं।’ यही घटना श्री हरिदास स्वामी जी के सम्बन्ध में भी कही जाती है, दोनों ही ठीक हैं। भक्तों की लीला अपरम्पार है, उन्हें श्रद्धापूर्वक सुन लेना चाहिये।
क्रमशः
Comments
Post a Comment