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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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इन्‍होंने भी भक्तितत्त्व की खूब पर्यालोचना की है, इनके बनाये हुए चार ग्रन्‍थ प्रसद्धि हैं–
(‌1) बृहद्भागवतामृत (दो खण्ड), (2) हरिभक्तिविलास, टीकादिक प्रदर्शिनी, (3) वैष्‍णवतोषिणी (दशम स्‍कन्‍ध की टिप्‍पणी), (4) लीलास्‍तव (दशम चरित्र)।

सत्तर वर्ष की आयु में सं. 1615 (ईस्‍वी सन 1558) की आषाढ सुदी चतुर्दशी के दिन इनका गोलोकगमन बताया जता है। ये परम विनयी, भागवत और भगवत-रस-रसिक वैष्‍णव थे।

3 – श्री जीवगोस्‍वामी जी

श्री अनूप तनय स्‍वामी श्रीजीव जी का वैराग्‍य परमोत्‍कृष्‍ट था। ये आजन्‍म ब्रह्मचारी रहे। स्त्रियों के दर्शन तक नहीं करते थे। पिता के वैकुण्‍ठवास हो जाने पर और दोनों ताऊओं के गृहत्‍यागी विरागी बन जाने पर इन्‍होंने भी उन्‍हीं के पथ का अनुसरण किया और ये भी सब कुछ छोड़कर श्री वृन्दावन में जाकर अपने पितृव्‍यों के चरणों का अनुसरण करते हुए शास्‍त्र-चिन्‍तन और श्रीकृष्‍ण-कीर्तन में अपना समय बिताने लगे। ये अपने समय के एक नामी पण्डित थे। व्रजमण्‍डल में इनकी अत्‍यधिक प्रतिष्‍ठा थी। देवताओं को भी अप्राप्‍य व्रज की पवित्र भूमि को परित्‍याग करके ये कहीं भी किसी के आग्रह से बाहर नहीं जाते थे। सुनते हैं, एक बार अकबर बादशाह ने अत्‍यन्‍त ही आग्रह के साथ इन्‍हें आगरे बुलाया था और इनकी आज्ञानुसार ही उसने इन्‍हें घोड़ा गाड़ी में बैठाकर उसी दिन रात्रि को वृन्‍दावन पहुँचा दिया था। इनके सम्‍बन्‍ध की भी दो-एक घटना सुनिये-

सुनते हैं कि एक बार कोई दिग्विजयी पण्डित दिग्विजयी की इच्‍छा से वृन्‍दावन में आया। श्री रूप तथा सनातन जी ने तो उससे बिना शास्‍त्रार्थ किये ही विजय पत्र लिख दिया किन्‍तु श्री जीगोस्‍वामी उससे भिड़ गये और उसे परास्‍त करके ही छोडा। इस समाचार को सुनकर श्रीरूप गोस्‍वामी ने इन्‍हें डाँटा और यहाँ तक कह दिया– ‘जो वैष्‍णव दूसरों को मान नहीं देना जानता, वह सच्‍चा वैष्‍णव ही नहीं। हमें जय-पराजय से क्‍या ? तुम जय की इच्‍छा से उससे भिड़े पड़े, इसलिये अब हमारे सामने मत आना।’ इससे इन्‍हें अत्‍यन्‍त ही दु:ख हुआ और ये अनशन करके यमुना-किनारे जा बैठे। श्री सनातन जी ने जब यह समाचार सुना तो उन्‍होंने रूप गोस्‍वामी के पास आकर पूछा– ‘वैष्‍णवों को जीव के ऊपर दया करनी चाहिये अथवा अदया।’ श्रीरूप जी ने कहा– यह तो सर्वसम्‍मत सिद्धान्‍त है कि ‘वैष्‍णव को जीवमात्र के प्रति दया के भाव प्रदर्शित करने चाहिये।’ बस, इतना सुनते ही सनातन जी ने जीवगोस्‍वामी जी को उनके पैरों में पड़ने का संकेत किया। जीवगोस्‍वामी अधीर होकर उनके पैरों में गिर पड़े और अपने अपराध को स्‍मरण करके बालकों की भाँति फूट-फूटकर रुदन करने लगे। श्री रूपजी का हृदय भर आया, उन्‍होंने इन्‍हें हृदय से लगाया और इनके अपराध को क्षमा कर दिया।

सुनते हैं परमभक्‍ता मीराबाई भी इनसे मिली थीं। उन दिनों ये एकान्‍त में वास करते थे और स्त्रियों को इनके आश्रम में जाने की मनाही थी। जब मीराबाई ने इनसे मिलने की इच्‍छा प्रकट की और उन्‍हें उत्तर मिला कि वे स्त्रियों से नहीं मिलते, तब मीराबाईजी ने सन्‍देश पठाया– ‘वृन्‍दावन तो बांकेविहारी का अन्‍त:पुर है। इसमें गोपिकाओं के सिवा किसी दूसर को प्रवेश नहीं। ये विहारी जी के नये पट्टीदार पुरुष और कहाँ से आ बसे, इन्‍हें किसी दूसरे स्‍थान की खोज करनी चाहिये।’ इस बात से इन्‍हें परम प्रसन्‍नता हुई और ये मीराबाई जी से बड़े प्रेम से मिले। इन्‍होंने एक योग्‍य आचार्य की भाँति भक्ति-मार्ग का खूब प्रचार किया। अपने पितृव्‍यों की भाँति इन्‍होंने भी बहुत से ग्रन्‍थ बनाये। कृष्‍णदास गोस्‍वामी ने इन तीनों के ही गन्‍थों की संख्‍या चार लाख बतायी है। यहाँ ग्रन्‍थ से तात्‍पर्य अनुष्‍टुप छन्‍द या एक श्‍लोक से है, पुस्‍तक से नहीं। श्रीरूप के बनाये हुए सब एक लक्ष ग्रन्‍थ या श्‍लोक बताये जाते हैं। सब पुस्‍तकों में इतने श्‍लोक हो सकते हैं। श्री जीवगोस्‍वामी के बनाये हुए नीचे लिखे ग्रन्‍थ मिलते हैं– श्रीभागवत षटसन्‍दर्भ, वैष्‍णवतोषिणी, लघुतोषिणी और गोपालचम्‍पू। इनके वैकुण्‍ठवास की ठीक-ठीक तिथि या संवत का पता हमें किसी भी ग्रन्‍थ से नहीं चला।

4 – श्री रघुनाथदास जी गोस्‍वामी

श्री रघुनाथदास जी महाप्रभु तथा श्रीस्‍वरूप गोस्‍वामी के तिरोभाव के अनन्‍तर अत्‍यन्‍त ही दु:खी होकर वृन्दावन चले आये। इनकी इच्‍छा थी कि हम गोवर्धन पर्वत से कूदकर अपने प्राणों को गँवा दें, किन्‍तु श्रीरूप-सनातन आदि के समझाने-बुझाने पर इन्‍होंने शरीर त्‍याग का विचार परित्‍याग कर दिया। ये राधाकुण्‍ड के समीप सदा वास करते थे। कहते हैं, ये चौबीस घंटे में केवल एक बार थोड़ा सा मट्ठा पीकर ही रहते थे। ये सदा प्रेम में विभोर होकर ‘राधे-राधे’ चिल्‍लाते रहते। इनका जन्‍म संवत अनुमान से 1416 शकाब्‍द बताया जाता है, इन्‍होंने अपनी पूर्ण आयु का का उपभोग किया। जय शकाब्‍द 1512 में श्री निवासाचार्य जी गौड देश को आ रहे थे, तब इनका जीवित रहना बताया जाता है। इनका त्‍याग-वैराग्‍य बडा ही अदभुत और अलौकिक था। इन्‍होंने जीवन भर कभी जिह्वा का स्‍वाद नहीं लिया, सुन्‍दर वस्‍त्र नहीं पहने और भी किसी प्रकार के संसारी सुख का भोग नहीं किया। लगभग सौ वर्षों तक ये अपने त्‍याग-वैराग्‍मय श्‍वासों से इस स्‍वार्थपूर्ण संसार के वायुमण्‍डल को पवित्रता प्रदान करते रहे। इनके बनाये हुए (1) स्‍तवमाला, (2) स्‍तवावली और (3) श्रीदानचरित– ये तीन ग्रन्‍थ बताये जाते हैं। इनके समान त्‍यागमय जीवन किसका हो सकता है ? राजपुत्र होकर भी इतना त्‍याग ! दास महाशय ! आपके श्रीचरणों में हमारे कोटि-कोटि प्रणाम हैं। प्रभो ! इस वासनायुक्‍त अधम के हृदय में भी अपनी शक्ति का संचार कीजिये।

5– श्री रघुनाथ भट्ट

तपन मिश्र जी के सुपुत्र श्री रघुनाथ भट्ट अपने माता-पिता के परलोकगमन के अनन्‍तर आठ महीने प्रभु के पादपद्मों में रहकर उन्‍हीं की आज्ञा से वृन्दावन जाकर रहने लगे थे। ये भागवत के बड़े भारी पण्डित थे, इनका स्‍वर बड़ा ही कोमल था। ये रूपगोस्‍वामी की सभा में श्रीमद्भागवत की कथा कहते थे। इनका जन्‍म-संवत अनुमान से 1425 बताया जाता है। ये कितने दिन तक अपने को कोकिल-कूजित कमनीय कण्‍ठ से श्रीमद्भागवत की कूक मचाकर वृन्दावन को बारहों महीने वसन्‍त बनाते रहे, इसका ठीक ठीक वृत्तान्‍त नहीं मिलता।

6–श्रीगोपाल भट्ट

ये श्रीरंग क्षेत्र निवासी वेंकट भट्ट के पुत्र तथा श्री प्रकाशानन्‍द जी सरस्‍वती के भतीजे थे। पिता के परलोकगमन के अनन्‍तर ये वृन्‍दावन वास के निमित्त चले आये। दक्षिण-यात्रा में जब ये छोटे थे तभी प्रभु ने इनके घर पर चौमासे के चार मास बिताये थे।
क्रमशः

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