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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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उसके बाद इनकी फिर महाप्रभु से भेंट नहीं हुई। इनके आगमन का समाचार श्री रूपसनातन जी ने प्रभु के पास पठाया था, तब प्रभु ने एक पत्र भेजकर रूप और सनातन इन दोनों भाइयों को लिखा था कि उन्‍हें स्‍नेह से अपने पास रखना और अपना सगा भाई ही समझना। महाप्रभु ने अपने बैठने का आसन और डोरी इनके लिये भेजी थी। इन दोनों प्रभुपसादी अमूल्‍य वस्‍तुओं को पाकर ये परम प्रसन्‍न हुए। ध्‍यान के समय ये प्रभु की प्रसादी डोरी को सिर पर धारण करके भजन किया करते थे। इनके उपास्‍यदेव श्री राधारमण जी थे।

सुनते हैं इनके उपास्‍यदेव पहले शालग्राम के रूप में थे, उन्‍हीं की ये सेवा पूजा किया करते थे, एक बार कोई धनिक वृन्‍दावन में आया। उसने सभी मन्दिरों के ठाकुरों के लिये सुन्‍दर वस्‍त्राभूषण प्रदान किये। इन्‍हें भी लाकर बहुत से सुन्‍दर सुन्‍दर वस्‍त्र और गहने दिये। वस्‍त्र और गहनों को देखकर इनकी इच्‍छा हुई कि यदि हमारे भी ठाकुर जी के हाथ पैर होते तो हम भी उन्‍हें इन वस्‍त्रा भूषणों को धारण कराते। बस, फिर क्‍या था। भगवान तो भक्‍त के अधीन हैं, वे कभी भक्‍त की इच्‍छा को अन्‍यथा नहीं करते। उसी समय शालग्राम की मूर्ति में से हाथ-पैर निकल आये और भगवान श्री राधारमण मुरली धारी श्‍याम बन गये। भट्ट जी की प्रसन्‍नता का ठिकाना नहीं रहा। उन्‍होंने भगवान को वस्‍त्रा भूषण पहनाये और भक्तिभाव से उनकी स्‍तुति की। श्री निवासाचार्य जी इन्‍हीं के शिष्‍य थे। इनके मन्दिर के पुजारी श्री गोपालनाथ दास जी भी इनके शिष्‍य थे। इनके परलोकगमन के अनन्‍तर श्री गोपालनाथदास जी ही उस गद्दी के अधिकारी हुए। श्री गोपालनाथदास के शिष्‍य श्री गोपीनाथदास जी अपने छोटे भाई दामोदरदास जी को शिष्‍य बनाकर उनसे विवाह करने के लिये कह दिया। वर्तमान श्री राधारमण जी के गोस्‍वामिगण इन्‍हीं श्री दामोदर जी के वंशज हैं। वृन्‍दावन में श्री राधारमण जी की वही मनोहर मूर्ति अपने अद्भुत और अलौकिक प्रभाव को धारण किये हुए अपने प्रिय भक्‍त श्री गोपाल भट्ट की शक्ति और एकनिष्‍ठा की घोषणा कर रही है। भक्‍तवत्‍सल भगवान क्‍या नहीं कर सकते।

श्री चैतन्‍य–शिक्षाष्‍टक…..

महाप्रभु गौरांग देव ने संन्‍यास लेने के अनन्‍तर अपने हाथ से किसी भी ग्रन्‍थ की रचना नहीं की। उन्‍हें इतना अवकाश ही कहाँ था, वे तो सदा प्रेमवारुणी पान करके पागल से बने रहते थे। ऐसी दशा में पुस्‍तक प्रणयन करना उनके लिेय अशक्‍य था किन्‍तु उनके भक्‍तों ने उनके उपदेशामृत के आधार पर अनेक ग्रन्‍थों की रचना कर डाली। व्‍यास, वाल्‍मीकि, शंकर, रामानुज आदि बहुत-से महापुरुष अपनी अमर कृति से ही अन्‍धे हुए संसार को दिव्‍यलोक प्रदान करते हैं। दत्‍तात्रेय, जड़भरत, ऋषभदेव, अजगर मुनि आदि बहुत से सिद्ध महापुरुष अपने लोकातीत आचरणों द्वारा ही संसार को त्‍याग, वैराग्‍य और भोगों की अनित्‍यता का पाठ पढ़ाते हैं। बुद्धदेव, कबीरदास और परमहंस रामकृष्‍णदेव-जैसे बहुत-से परोपकारी महापुरुष अपनी अमोघ वाणी के ही द्वारा संसार का कल्‍याण करते हैं। श्री चैतन्‍यदेव ने तो अपने जीवन को ही प्रेम का साकार स्‍वरूप बनाकर मनुष्‍यों के सम्‍मुख रख दिया। चैतन्‍य-चरित्र की मनुष्‍य ज्‍यों-ज्‍यों आलोचना और प्रत्‍यालोचना करेंगे, त्‍यों ही त्‍यों वे शास्‍त्रीय सिद्धान्‍त साम्‍प्रदायिक, संकुचित सीमा से निकलकर संसार के सम्‍मुख सार्वदेशिक बन सकेंगे। चैतन्‍यदेव ने किसी नये धर्म की रचना नहीं की। संन्‍यासधर्म या त्‍यागधर्म जो ऋषियों का सनातन का धर्म है, उसी के ये शरणापन्‍न हुए और संसार के सम्‍मुख महान त्‍याग का एक सर्वोच्‍च आदर्श उपस्थित करके लोगों को त्‍याग का यथार्थ मर्म सिखा दिया। समय के प्रभाव से ज्ञानमार्ग में जो शुष्‍कता आ गयी थी, संसार को असार बताते-बताते जिनका हृदय भी सारहीन और शुष्‍क बन गया था, उसी शुष्‍कता को उन्‍होंने मेटकर त्‍याग के साथ सरलता का भी सम्मिश्रण कर दिया। उस त्‍यागमय प्रेम ने सोने में सुहागे का काम दिया। यही श्री चैतन्‍य का मैंने सार सिद्धान्‍त समझा है। किन्‍तु मैं अपनी मान्‍यता के लिये अन्‍य किसी को बाध्‍य नहीं करता। महाप्रभु ने समय-समय पर आठ श्‍लोक कहे हैं। वे सब महाप्रभुरचित ही बताये जाते हैं। वैष्‍णव मण्‍डली में वे आठ श्‍लोक ‘शिक्षाष्‍टक’ के नाम से अत्‍यन्‍त ही प्रसिद्ध है। उन पर बड़ी टीका-टिप्‍पणियां भी लिखी गयी हैं। ग्रन्‍थ के अन्‍त में उन आठ श्‍लोकों को अर्थसहित देकर हम इस ग्रन्‍थ को समाप्‍त करते हैं। जौ ‘श्री श्री चैतन्‍य–चरितावली’ को आदि से अन्‍त तक पढ़ेंगे वे परम भावगत तथा प्रेमी तो अवश्‍य ही होंगे, यदि न भी होंगे तो इस चारु चरित्र के पठन और चिन्‍तन से अवश्‍य ही वे प्रेमदेव की मनमोहिनी मूर्ति के अनन्‍य उपासक बन जायँगे।

(1)
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणं 
श्रेय: कैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्‍दाम्‍बुधिबर्द्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्‍वादनं 
सर्वात्‍मस्‍नपनं परं विजयते श्रीकृष्‍णसंकीर्तनम्।।

जो चित्‍तरूपी दर्पण के मैल को मार्जन करने वाला है, जो संसाररूपी महादावाग्नि को शान्‍त करने वाला है, प्राणियों के लिये मंगलदायिनी कैरव चन्द्रिका को विरण करने वाला है, जो विद्यारूपी वधू का जीवन-स्‍वरूप है और आनन्‍दरूपी समुद्र को प्रतिदिन बढ़ाने ही वाला है उस श्रीकृष्‍ण संकीर्तन की जय हो, जय हो !

श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे ! 
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

(2)
नाम्‍नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति-
स्‍तत्रार्पिता नियमित:स्‍मरणे न काल:।
एतादृशी तव कृपा भगवन ममापि 
दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुराग:।।

प्राणनाथ ! तुम्‍हारी कृपा में कुछ कसर नहीं और मेरे दुर्भाग्‍य में कुछ संदेह नहीं। भला, देखो तो सही तुमने ‘नन्‍दनन्‍दन’, ‘व्रजचन्‍द‘, ‘मुरलीमनोहर’, ‘राधारमण’– ये कितने सुन्‍दर-सुन्‍दर कानों को प्रिय लगने वाले अपने मनोहारी नाम प्रकट किये हैं, फिर वे नाम रीते ही हों सो बात नहीं, तुमने अपनी सम्‍पूर्ण शक्ति सभी नामों में समानरूप से भर दी है। जिसका भी आश्रय ग्रहण करें, उसी में तुम्‍हारी पूर्ण शक्ति मिल जायगी। सम्‍भव है, वैदिक क्रिया-कलापों की भाँति तुम उनके लेने में कुछ देश, काल और पात्र का नियम रख देते तो इसमें कुछ कठिनता होने का भय भी था, सो तुमने तो इन बातों का कोई भी नियम निर्धारित नहीं किया। स्‍त्री हो, पुरुष हो, द्विज हो, अन्‍त्‍यज हो, शूद्र हो, अनार्य हो, कोई भी क्‍यों न हो, सभी प्राणी शुचि-अशुचि किसी का भी विचार न करते हुए सभी अवस्‍थाओं में, सभी समयों में सर्वत्र उन सुमधुर नामों का संकीर्तन कर सकते हैं। हे भगवन ! तुम्‍हारी तो जीवों के ऊपर इतनी भारी कृपा है।
क्रमशः

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