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श्री श्री चैतन्य चरितावली 
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यह संसार समुद्र के समान है। मुझे इसमें तुमने क्‍यों फेंक दिया, हे नाथ ! इसकी मुझे कोई शिकायत नहीं। मैं अपने कर्मों के अधीन होकर ही इसमें गोते लगा रहा हूँ, बार-बार डूबता हूँ और फिर तुम्‍हारी करुणा के सहारे ऊपर तैरने लगता हूँ।इस अथाह सागर के सम्‍बन्‍ध में मैं कुछ भी नहीं जानता कि यह कितना गहरा है, किन्‍तु हे मेरे रमण ! मैं इसमें डुबकियाँ मारते-मारते थक गया हूँ। कभी-कभी खारा पानी मुंह में चला जाता है, तो कैसी होने लगती है। कभी कानों में पानी भर जाता है, तो कभी आँखें ही नमकीन जल से चिरचिराने लगती हैं। कभी-कभी नाक में होकर भी जल चला जाता है। हे मेरे मनोहर मल्‍लाह ! हे मेरे कोमल प्रकृति केवट ! मुझे अपना नौकर जानकर, सेवक समझकर कहीं बैठने का स्‍थान दो। तुम तो ग्‍वाले के छोकरे हो न, बड़े चपल हो। पूछ सकते हो, ‘इस अथाह जल में मैं बैठने के लिये तुझे स्‍थान कहाँ दूँ। मेरे पास नाव भी तो नहीं जिसमें तुम्‍हें बिठा लूँ।’ तो हे मेरे रसिकशिरोमणि ! मैं चालाकी नहीं करता, तुम्‍हें भुलाता नहीं सुझाता हूँ। तुम्‍हारे पास एक ऐसा स्‍थान है, जो जल में रहने पर भी नहीं डूबता और उसमें तुमने मुझ-जैसे अनेकों डूबते हुओं को आश्रय दे रखा है। तुम्‍हारे ये अरुण वर्ण के जो कोमल चरण कमल हैं, ये तो जल में ही रहने के आदी हैं। इन कमलों में सैकड़ों धूलि के कण जल में रहते हुए भी निश्चिन्‍तरूप से बिना डूबे ही बैठे हैं। हे नन्‍दजी के लाड़िले लाल ! उन्‍हीं धूलि कणों में मेरी भी गणना कर लो। मुझे भी उन पावन पद्मों में रेणु बनाकर बिठा लो। वहाँ बैठकर मैं तुम्‍हारी धीरे-धीरे पैर हिलाने की क्रीड़ा के साथ थिरक-थिरककर सुन्‍दर स्‍वर से इन नामों का गायन करता रहूँगा–

श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे ! 
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

(6)
नयनं गलदश्रुधारया 
वदनं गद्गदरुद्धया गिरा।
पुलकैर्निचितं वपु: कदा 
तव नामग्रहणे भविष्‍यति।।

प्‍यारे ! मैंने सुना है कि आँसुओं के भीतर जो सफेद-सफेद कांच का सा छोटा सा घर दीखता है, उसी के भीतर तुम्‍हारा घर है। तुम सदा उसी में वास करते हो। यदि यह बात ठीक है, तब तो प्रभो ! मेरा नाम लेना व्‍यर्थ ही है। मेरी आँखें आंसू तो बहाती ही नहीं, तुम तो भीतर ही छिपे बैठे रहते होगे। बोलना-चालना तो वाचालता में होता है, तुम सम्‍भवतया मौनियों से प्‍यार करते होगे, किन्‍तु दयालो ! मौन कैसे रहूँ? यह वाणी तो अपने आप ही फूट पड़ती है। वाणी को रोक दो, गले को रुद्ध कर दो, जिससे स्‍पष्‍ट एक भी शब्‍द न निकल सके। सुस्‍ती में सभी वस्‍तुएं शिथिल हो जाती हैं। तुम कहते हो– ‘तेरे ये शरीर के बाल क्‍यों पड़े हैं?’

प्‍यारे ! इनमें विद्युत का संचार नहीं हुआ है। अपनी विरहरूपी बिजली इनमें भर दो, जिससे ये तुम्‍हारे नाम का शब्‍द सुनते ही चौंककर खड़े हो जायँ। हे मेरे विधाता ! इनकी सुस्‍ती मिटा दो, इनमें ऐसी शक्ति भर दो जिससे फुरहुरी आती रहे। बस, जहाँ तुम्‍हारे नाम की ध्‍वनि सुनी, वहीं दोनों नेत्र लबालब अश्रु से भर आये, वाणी अपने आप ही रुक गयी, शरीर के सभी रोम बिलकुल खड़े हो गये। प्‍यारे तुम्‍हारे इन मधुर नामों को लेते हुए कभी मेरी ऐसी स्थिति हो भी सकेगी क्‍या!

श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे ! 
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

(7)
युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्।
शून्‍यायितं जगत् सर्वं गोविन्‍दविरहेण मे।।

हाय रे प्‍यारे ! लोग कहते हैं आयु अल्‍प है, किन्‍तु प्‍यारे ! मेरी आयु तो तुमने अनन्‍त कर दी है और तुम मुझे अमर बनाकर कहीं छिप गये हो। हे चोर ! जरा आकर मेरी दशा तो देखो। तुम्‍हें बिना देखो मेरी कैसी दशा हो रही है, जिसे लोग ‘निमेष’ कहते हैं, पलक मारते ही जिस समय को व्‍यतीत हुआ बताते हैं, वह समय मेरे लिये एक युग से भी बढ़कर हो गया है। इसका कारण है तुम्‍हारा विरह। लोक कहते हैं, वर्षा चार ही महीने होती है, किन्‍तु मेरा जीवन तो तुमने वर्षामय ही बना दिया है। मेरे नेत्रों से सदा वर्षा की धाराएं ही छूटती रहती हैं, क्‍योंकि तुम दीखते नहीं हो, कहीं दूर जाकर छिप गये हो। नैयायिक चौबीस गुण बताते हैं, सात पदार्थ बताते हैं। इस संसार में विविध प्रकार की वस्‍तुएँ बतायी जाती हैं, किन्‍तु प्‍यारे मोहन! मेरे लिये तो यह सम्‍पूर्ण संसार सूना-सूना सा ही प्रतीत होता है, इसका एकमात्र कारण है तुम्‍हारा अदर्शन। तुम मुझे यहाँ फँसाकर न जाने कहाँ चले गये हो, इसलिये मैं सदा रोता-रोता चिल्‍लाता रहता हूँ –
श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे ! 
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

(8)
आश्लिष्‍य वा पादरतां पिनष्‍टु मा-
मदर्शनान्‍मर्महतां करोतु वा।
यथा तथा वा विदधातु लम्‍पटो 
मत्‍प्राणनाथस्‍तु स एव नापर:।।

हे सखि ! इन व्‍यर्थ बातों में क्‍या रखा है। तू मुझे उसके गुणों को क्‍यों सुनाती है? वह चाहे दयामय हो या धोखेबाज, प्रेमी हो या निष्‍ठुर, रसिक हो या जारशिरोमणि। मैं तो उसकी चेरी बन चुकी हूँ। मैंने तो अपना अंग उसे ही अर्पण कर दिया है। वह चाहे तो इसे हृदय से चिपटकार प्रेम के कारण इसके रोमों को खड़ा कर दे या अपने विरह में जल से निकली हुई मर्माहत मछली की भाँति तड़फाता रहे। मैं उस लम्‍पट के पाले अब तो पड़ ही गयी हूँ। अब सोच करने से हो ही क्‍या सकता है, जो होना था सो हो चुका। मैं तो अपना सर्वस्‍व उस पर वार चुकी। वह इस शरीर का स्‍वामी बन चुका। अब कोई अपर पुरुष इसकी ओर दृष्टि उठाकर भी नहीं देख सकता। उसके अनन्‍त सुन्‍दर और मनोहर नाम हैं, उनमें से मैं तो रोते-रोते इन्‍हीं नामों का उच्‍चारण करती हूँ–

श्रीकृष्‍ण ! गोविन्‍द ! हरे ! मुरारे ! 
हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव !

इति शम् 
श्रीश्री चैतन्य- चरितावली समाप्तोऽयं ग्रंन्थ:।

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