श्री श्री चैतन्य चरितावली 201- इसलिये इनके इस समय का यह सुदीप्त सात्त्विक भाव एकदम अलौकिक है। प्रणय के उद्रेक में जो अवस्था श्रीराधिका जी की हो जाती थी और शास्त्रों में जो ‘अधिरूढ़ महाभाव’ के नाम से वर्णित की गयी हैं, ठीक वही दशा इस समय इन संन्यासी युवक की है। भगवान के प्रति इतने प्रगाढ़ प्रणय के भाव तो मैंने आज तक शास्त्रों में केवल पढ़ा ही था, अभी तक उनका किसी पुरुष के शरीर में उदय होते हुए नहीं देखा था। आज प्रत्यक्ष उस महाभाव के दर्शन कर लिये। अवश्य ही ये सन्यासी-वेषधारी युवक कोई अलौकिक दिव्य महापुरुष हैं। देखने से तो ये गौड़देशीय ही मालूम पड़ते हैं।सार्वभौम महाशय खड़े-खड़े इस प्रकार सोच ही रहे थे कि मध्याह्न के भोग का समीप आ पहुँचा। प्रभु की मूर्च्छा अभी तक भंग नहीं हुई थी, इसलिये भट्टाचार्य महाशय मन्दिर के सेवकों की सहायता से प्रभु को उसी बेहोशी की दशा में अपने घर के लिये उठवा ले गये और उन्हें एक स्वच्छ सुन्दर लिपे-पुते स्थान में ले आकर लिटा दिया। सार्वभौम महाशय घर श्रीजगन्नाथ जी के मन्दिर के दक्षिण बालुखण्ड में मार्कण्डेय सर के समीप था। आज कल जो ‘गंगामाता ...
श्री श्री चैतन्य चरितावली 362 उस कठोरता की कथा को सुनकर तो कठोरता का भी हृदय फटने लगेगा। बड़ी ही करुण कहानी है।महाप्रभु संन्यास लेकर गृहत्यागी वैरागी बन गये, उससे उस पतिप्राणा प्रिया जी को कितना अधिक क्लेश हुआ होगा, यह विषय अवर्णनीय है। मनुष्य की शक्ति के बाहर की बात है। एक बार वृन्दावन जाते समय केवल विष्णुप्रिया जी की ही तीव्र विरहवेदना को शान्त करने के निमित्त क्षणभर के लिये प्रभु अपने पुराने घर पर पधारे थे।उस समय विष्णुप्रिया जी ने अपने संन्यासी पति के पादपद्मों में प्रणत होकर उनसे जीवनालम्बन के लिये किसी चिह्न की याचना की थी। दयामय प्रभु ने अपने पादपद्मों की पुनीत पादुकाएं उसी समय प्रिया जी को प्रदान की थीं और उन्हीं के द्वारा जीवन धारण करते रहने का उपदेश किया था। पति की पादुकाओं को पाकर पतिपरायणा प्रिया जी को परम प्रसन्नता हुई और उन्हीं को अपने जीवन का सहारा बनाकर वे इस पाँचभौतिक शरीर को टिकाये रहीं। उनका मन सदा नीलाचल के एक निभृत के स्थान में किन्हीं अरुण रंग वाले दो चरणों के बीच में भ्रमण करता रहता। शरीर यहाँ नवद्वीप में रहता, उसके द्वारा वे अपनी वृद्धा सास क...
श्री श्री चैतन्य चरितावली 90- शिष्य गुरु को ही साक्षात परब्रह्म का साकार स्वरूप मानकर उसकी वन्दना करे, इन सभी का फल अन्त में एक ही होगा, सभी अपने अन्तिम अभीष्ट तक पहुँच सकेंगे। सभी को अपनी-अपनी भावना के अनुसार प्रभु-पद-प्राप्ति अथवा मुक्ति मिलेगी। सभी के दुःखों का अत्यन्ताभाव हो जायगा। यह तो सचेतन साकार वस्तु के प्रति प्रेम करने की पद्धति है, हिंदू-धर्म में तो यहाँ तक माना गया है कि पत्थर, मिट्टी, धातु अथवा किसी भी प्रकार की मूर्ति बनाकर उसी में ईश्वर-बुद्धि से पूजन करोगे तो तुम्हें शुद्ध-विशुद्ध प्रेम की ही प्राप्ति होगी। किंतु इसमें दम्भ या बनावट न होनी चाहिये। अपने हृदय को टटोल लो कि इसके प्रति हमारा पूर्ण अनुराग है या नहीं, यदि किसी के भी प्रति तुम्हारा पूर्ण प्रेम हो चुका तो बस, तुम्हारा कल्याण ही है, तुम्हारा सर्वस्व तो वही है। नित्यानन्द प्रभु बारह-तेरह वर्ष की अल्पवयस में ही घर छोड़कर चले आये थे। लगभग बीस वर्षों तक ये तीर्थों में भ्रमण करते रहे, इनके साथी संन्यासीजी इन्हें छोड़कर कहाँ चले गये, इसका कुछ भी पता नहीं चलता, किंतु इतना अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है कि उन महात्म...
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